Swan, Robert John; William Cowper (1731-1800), Poet; The Cowper and Newton Museum; http://www.artuk.org/artworks/william-cowper-17311800-poet-26841

घायल हिरण

विलियम काउपर (1731-1800)  अनुवाद दिनेश दधीचि

चोट खाया हिरण था मैं,
अरसा पहले झुण्ड पुराना छूट गया था,
साँस जिधर से लेता हूँ मैं, उधर बहुत-से तीर गड़े थे
तन में, गहरे,
जब मैं दूर दरख्तों की छाया में,
शांत, देह का त्याग करूं, यह इच्छा लेकर
अलग हो गया था अपने प्यारे समूह से.
वहाँ मुझे एक और मिला अपने जैसा,
तीरंदाज़ों ने जिसको घायल कर डाला था.
उसके हाथ-पैर में और देह पर,
उनकी निर्दयता के दाग़ अभी तक बने हुए थे.
स्नेहिल, पर मज़बूत ढंग से उसने मेरे तन में से
सब तीर निकाले; मुझे संभाला औ’ जीने का दिया आसरा.
तब से दूर-दराज़ के इन ख़ामोश जंगलों में एकाकी घूम रहा हूँ.
भीड़भाड़ के सभी पुराने संगी साथी छूट गये हैं दूर कहीं अब,
साथ नहीं अब मुझे किसी भी सहयोगी का,
और ऐसी कुछ चाह भी नहीं मन में बाक़ी.
बस, चिंतन करता रहता हूँ, जितना चाहूँ
इंसानों और उनके तौर-तरीकों के कुछ और विचारों को ले कर
अब पहले से भी ज़्यादा
आने वाले जीवन को ले कर.
समझ रहा हूँ सभी लोग बस भटक रहे हैं
हर कोई बस अपनी किन्हीं वंचनाओं के साथ घूमता
सुख के दिवा-स्वप्न जो कभी नहीं सच होने वाले
उनका पीछा करते-करते गुम हैं सारे.
सपनों पर सपने आते हैं
फिर भी और खोखले सपने
अब की बार सफल होंगे—यह लगता है, पर
हाथ निराशा ही लगती है.
इसी खोखली हलचल में संसार पड़ा है.
आधे तो इन्सान हैं ऐसे
शेष बचे आधों में से यदि
एक-तिहाई छोड़ भी दें, तो
मिल जाएगा मानव-मन की
आशाओं-आशंकाओं का योग अभी.
सपने, केवल स्वप्न खोखले
इनमें खोये लाखों ही इन्सान इस तरह
उड़ते फिरते हैं जैसे वे बने हुए हों
मक्खी की मानिंद, दुपहरी की आँखों में
अपने-अपने विविध वर्ण के पंख पसारे
अपना ‘सीज़न’ पूरा करके
कभी नहीं दोबारा वे दिखलाई देतीं।
 

William Cowper (1731-1800)

I Was a Stricken Deer

I was a stricken deer that left the herd
Long since; with many an arrow deep infixt
My panting side was charged when I withdrew
To seek a tranquil death in distant shades.
There was I found by one who had himself
Been hurt by th’ archers. In his side he bore
And in his hands and feet the cruel scars.
With gentle force soliciting the darts
He drew them forth, and heal’d and bade me live.
Since then, with few associates, in remote
And silent woods I wander, far from those
My former partners of the peopled scene,
With few associates, and not wishing more.
Here much I ruminate, as much I may,
With other views of men and manners now
Than once, and others of a life to come.
I see that all are wand’rers, gone astray
Each in his own delusions; they are lost
In chace of fancied happiness, still wooed
And never won. Dream after dream ensues,
And still they dream that they shall still succeed,
And still are disappointed; rings the world
With the vain stir. I sum up half mankind,
And add two-thirds of the remainder half,
And find the total of their hopes and fears
Dreams, empty dreams. The million flit as gay
As if created only like the fly
That spreads his motley wings in th’ eye of noon
To sport their season and be seen no more.
 
 
 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *