चार कविताएं – वेंडी बार्कर

वेंडी बार्कर (जन्म 1942 ) अनुवाद  दिनेश दधीचि

(1)

याद है हव्वा को

मैंने तो बस उसका झुकना भर
देखा पथ पर
देखा—वह कुछ सोच-समझ कर झुका
और फैलायी लंबी बाँह.
दृष्टिहीन हम नहीं जान पाए
आगे की राह.
उसने कहा — हटा देता हूँ
टूटी हुई टहनियाँ / पथ
काँटों से घिर जाए ना.
कहीं हमारे पीछे आने वाला
गिर जाए ना !

Eve Remembers

It was his bending to the path I noticed.
A deliberate dip, a sweep of his long arm.
Blind, we couldn’t know what lay ahead.
He said he was picking up twigs, branches,
trying to clear the path. He didn’t want
anyone who had to follow us to fall.

(2)

पहलेपहले

पहले-पहले वह बोला
यह कोई भावावेश न था
जो पथ पर हम ख़ामोश रहे
गहराते उस सूनेपन में
बस खड़े रहे गीले पत्तों के बीच घिरे .
फ़ासले जो थे हमारे बीच
सारे खो गये थे
अब उजाला हो गये थे
या पवन थे स्तन मेरे
और हाथ उसके .
बस हमारी साँस थी इक
साँस जो टूटी नहीं, टूटी नहीं .

At First, He Insisted

it wasn’t passion
the way we fell
silent, alongside
silences deepening
the spaces among
damp leaves around us
till there was no
space anywhere
between us, light and
air my breasts, his hands,
our breath, our breath, our
unbroken breathing.

(3)

सरोवर

तोड़ती हैं सतह को बस मछलियाँ छोटी
जबकि मुझको है प्रतीक्षा सदा
केवल कुमुदिनी की
हैं जड़ें गहरी
खिलेगी फिर
उगेगी खूब गहरे पंक में से.
पंक जो मेरे तले में है.

The Pool

 Small fish break the surface
but always I am waiting
for the deep-rooted lily
to bloom again, planted
so down in my silt.

(4)

पाँचवाँ दिन

आख़िर मैंने खोज निकाले
लाल-लाल फल जिन पर भूरे बने चकत्ते
छोटे-छोटे, जिन्हें छिपाए ढेरों पत्ते.
मिले मुझे यह भी अच्छा संयोग रहा.
यही चाह थी तुम्हें दिखाऊँ.
तुम खाओ तो खुद भी देखूँ
खाते हुए तुम्हारा चेहरा.
छोटे-छोटे फल भी मीठे
खाने के ये पल भी मीठे.

The Fifth Day

I found fruit, red, and
Freckled. Small, under their pleated
Leaves. I almost missed them,
wanted to show you. The pleasure
of watching your face
eat them too — little sweetnesses. 

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