तस्वीर – स्टैनले कुनिट्ज

स्टैनले कुनिट्ज (1905-2006) अनुवाद – डा. दिनेश दधीचि

मेरी मां ने मेरे पिता को इस बात के लिए
कभी माफ़ नहीं किया
कि उसने आत्महत्या कर ली थी
उस वसंत ऋतु में
एक सार्वजनिक पार्क में जा कर
ऐसे नाज़ुक समय में
जब मैं पैदा होने वाला था।
मां ने उसका नाम
अपने सबसे गहरे बक्से में
ताले में बंद कर के रख दिया
और उसे कभी बाहर नहीं आने दिया
हालांकि बक्से को थपथपाने की आवाज़
मुझे भीतर से सुनाई देती थी।
एक दिन जब मैं परछत्ती से नीचे आया
हाथ में एक अजनबी की तस्वीर ले कर
जिसके लम्बे होंठ थे,
रौबदार मूंछें थीं
और थीं गहरी, भूरी, सतर आंखें
मां ने बिना एक शब्द बोले
उस तस्वीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
और एक ज़ोरदार थप्पड़ मुझे मारा।
आज अपनी उम्र के चौंसठवें साल में भी
मुझे अपने गाल पर
वह जलन महसूस होती है!

Stanley Kunitz (1905-2006) 

The Portrait

My mother never forgave my father
for killing himself,
especially at such an awkward time
and in a public park,
that spring
when I was waiting to be born.
She locked his name
in her deepest cabinet
and would not let him out,
though I could hear him thumping.
When I came down from the attic
with the pastel portrait in my hand
of a long-lipped stranger
with a brave moustache
and deep brown level eyes,
she ripped it into shreds
without a single word
and slapped me hard.
In my sixty-fourth year
I can feel my cheek
still burning.

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