जॉन कीट्स (1795-1821) – अनुवाद – दिनेश दधीचि

एक वर्ष में जैसे चारों मौसम आते
ऐसे ही मानव के मन में भी देखो परिवर्तन आते।
पहले आता है ऊर्जस्वी
वह वसंत का मौसम जिसमें
सारी सुंदरता अंतर्मानस में बिल्कुल
साफ़ साफ़ बिंबित होती है।
गरमी के मौसम में मानव-मन यूं ख़ुद को बहलाता है
उसको तो वसंत के हर मधुरिम
अनुभव की नित्य जुगाली करना
ही केवल भाता है
और इसी से स्वर्गिक सा आनंद ही
मानो मिल जाता है।
पतझड़ में ऐसा लगता ज्यों
शांत झील का ठहरा जल हो।
पंख समेटे बैठा पाखी,
कोहरे को तकता, अलसाया और अघाया
ध्यान नहीं उसका जाता सुंदर चीज़ों पर।
यूं लगतीं हैं सारी जैसे
अपनी ही दहलीज़ के आगे
बहने वाला कोई झरना।
बस फिर आता शीत पीत चेहरा और
विकृत सूरत ले कर।
मानव की क्षणभंगुरता ही
आख़िर उसकी नियति बनी है।  

John Keats (1795-1821) 

The  Human Seasons

Four Seasons fill the measure of the year;
There are four seasons in the mind of man:
He has his lusty Spring, when fancy clear
Takes in all beauty with an easy span:
He has his Summer, when luxuriously
Spring’s honied cud of youthful thought he loves
To ruminate, and by such dreaming high
Is nearest unto heaven: quiet coves
His soul has in its Autumn, when his wings
He furleth close; contented so to look
On mists in idleness—to let fair things
Pass by unheeded as a threshold brook.
He has his Winter too of pale misfeature,
Or else he would forego his mortal nature.

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