मोरनी: एक ऐतिहासिक झलक – सुरेन्द्रपाल सिंह

इतिहास के पन्नों से…


मोरनी: एक ऐतिहासिक झलक

            शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित मोरनी नामक एक छोटे से कस्बे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर एक किले की इमारत है, जिसके दरवाजे पर लगे हुए परिचय पत्थर पर लिखी हुई इबारत एक ऐसे झरोखे का काम करती है, जो हमें इतिहास की कुछ भूली-बिसरी पगडंडियों की ओर ले जाता है। इस पर लिखा है

            ‘दिनांक 26-10-1816 को भारत के गवर्नर जनरल ने एक सनद के द्वारा मीर जाफर अली को उसके पुश्तैनी अधिकारों  व गुरखाओं के विरुद्ध लड़ाई में अंग्रेजी फौज की सहायता करने के एवज में इन पहाड़ों पर हक सौंपा था ….।’ इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए इसमें कई दिलचस्प संकेत हैं।

             मोरनी शिवालिक की पहाड़ियों की श्रृखंला का हिस्सा है। ऐतिहासिक, भौगोलिक व सांस्कृतिक दृष्टि से मोरनी का जुड़ाव  हिमाचल प्रदेश के सिरमोर जिले से है। हरियाणा में इसके होने का भी इतिहास है। इसका संक्षिप्त ब्यौरा निम्न प्रकार है। सन् 1948 में 28 रियासतों को मिलाकर एक चीफ कमीश्नर के अधीन एक प्रांत बना जिसे सन् 1950 में लैफ्टिनैंट गवर्नर के अधीन पार्ट-सी राज्य बना दिया गया और कालांतर में सन् 1956 में यूनियन टैरिटरी बन गया। सन् 1965 में भाषाई राज्य की बारम्बार मांग की वजह से सरदार हुक्मसिंह की अध्यक्षता में 22 सदस्यों का संसदीय कमीशन बना, जिसने सिफारिश की कि शिमला, लाहौल स्पीती, कुल्लू और कांगड़ा में पहाड़ी जिले और पठानकोट तहसील का डल्होजी इलाका, ऊना तहसील का अधिकांश इलाका व अम्बाला जिला की नालागढ़ तहसील हि.प्र. में मिलाई जाए। जब मोरनी का मुद्दा सामने आया तो हि.प्र. ने 93 वर्ग मील के इस इलाके पर जो नारायणगढ़ तहसील का 20 प्रतिशत हिस्सा था और भाषा, संस्कृति, भूगोल, इतिहास और परम्परा आदि के सभी पहलुओं के आधार पर इसे जोरदार ढंग से मांगा, लेकिन शाह कमीशन (बाऊंडरी कमीशन) ने नारायणगढ़ तहसील के टुकड़े न करने का फैसला लिया और इस प्रकार हरियाणा को मोरनी के रूप में एकमात्र हिल स्टेशन मिल गया।

            मोरनी का किला-मोरनी की पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर करीब 1200 मीटर की ऊंचाई पर 17वीं शताब्दी में बनाया गया यह किला पत्थरों से बनाई गई एक साधारण इमारत है। इसके चार बुर्ज हैं और मुख्य दरवाजा पूर्व दिशा में है। कभी इसके केंद्र में एक कुआं भी था। सन् 1814 में जब गुरखाओं ने नाहन पर कब्जा कर लिया था तो सिरमोर के राजा ने यहां शरण ली थी और आवश्यकतानुसार किले के अंदर रिहायशी इन्तजाम किए गए थे।

             मोरनी के किले को केंद्र बनाकर रत्न प्रकाश ने शिमला की निचली पहाड़ियों के 12 ठकुराई को जो पहले गुरखा कमांडर अमर सिंह थापा का साथ दे रहे थे, अब गुरखाओं के विरुद्ध अपने साथ मिलाया। गुरखाओं ने बीरभद्र के नेतृत्व में मोरनी के किले पर घेरा डाल कर तोपों, बंदूकों, खुखरियों से जबरदस्त आक्रमण किया और रत्नप्रकाश को परिवार सहित किला छोड़ कर भागने पर मजबूर किया। अब किला गौरी शाह जो गुरखा साम्राज्य का मजबूत पक्षधर था के हवाले कर दिया गया। उस वक्त रायपुर रानी के बगल में स्थित कोताहा का किला मीर जाफर अलीखान के अधीन था, जिसने अपने सिपाहियों के साथ सर डेविड ऑक्टरलनी के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज का साथ दिया और मलौन किले में बड़ा काजी अमर सिंह थापा के नेतृत्व वाले गुरखा फौज की घेराबंदी कर ली। हारकर अमर सिंह थापा को डेविड आक्टरलनी के साथ 15-05-1815 को संधि करते हुए मलौन, जैतक और मोरनी के किले खाली करने पड़े। इससे पहले गौरी शाह ने नाहन से 7 किलोमीटर दूर जैतक किले पर कब्जा किए हुए गुरखा कमांडर काजी रणजोर सिंह को पत्र लिखकर मैदान न छोड़ने की सलाह देते हुए अंग्रेजों को हराने के लिए तंत्र-मंत्र की सहायता लेने और भीम की पूजा करने की ताकीद की थी।

            अंग्रजों ने नाहन का राज्य रानी गुलेर को देते हुए मोरनी का तालुका कोताहा के मीर जाफर अलीखान को एक सनद द्वारा दे दिया गया। इस प्रकार मोरनी का इलाका मीर जाफर अली और उसकी पुश्तों की मल्कियत बन गया। मोरनी के इलाके की खेती योग्य जमीन अभी भी मीर की जमीन कहलाती है। जिस पर पुराने मुजारे और उनकी पीढ़ियां खेती कर रही हैं। बेशक मोरनी का किला सन् 1977 में हरियाणा के वन विभाग ने मीर के उत्तराधिकारियों से अपने अधिकार में ले लिया और सन् 2009 में इसका पुनः उद्धार करवाया गया।

            अब आइए इतिहास की पगडंडियों पर कुछ और दूर तक चलते हैं मोरनी की पुरानी झलक पाने के लिए।

            लंबे समय तक मोरनी का इलाका ठाकुर राजपूतों के अधीन 14 टुकड़ों में बंटा हुआ था, जिन्हें भोज कहा जाता था और आज भी ये इकाई कायम है। जैसे भोज जबयाल, भोज कोटि आदि। सिरमोर के राजा के अधीन ये इलाका कोटाहो, परगना का हिस्सा था। कहा जाता है कि सिरमौर के राजा भगत प्रकाश (1583-1605) ने कोताहा के मुखिया मानचंद (या दूपचंद या दीपचंद) की बेटी स्वाती का हाथ मांगा और मना करने पर राजा ने कोताहा पर चढ़ाई करके उसे सपरिवार दिल्ली भागने को मजबूर किया। वहां मानचंद इस्लाम ग्र्रहण करके मोमन मुराद कहलाने लगा। उसने अपनी बेटी की शादी शहजादा जहांगीर से सन् 1605 से पहले की थी।

            जब जहांगीर बादशाह बना तो उसने दरबार की तरफ से एक एजेंट हकीम कासिमखान के साथ मोमन मुराद को कोताहा वापिस भेज दिया। मोमन मुराद ने कोताहा और शिवालिक पहाड़ों को भूरसिंह देव श्रृंखला तक अपने कब्जे में लिया। एक पहाड़ी का नाम उसने अपनी पत्नी के नाम पर ‘मोरनी’ रखा। मोमन मुराद के बेटे फिल मुराद को कोई औलाद न होने पर अब असली हाकिम हकीम कासिम खान हो गया, जिसे मुगल बादशाह ने ‘मीर’ का खिताब दिया था। 21-03-1655 को शाहजहां ने कोताहा का इलाका एक फरमान के द्वारा सिरमौर के राजा सुभाग सिंह को दे दिया था, क्योंकि उसने श्रीनगर (गढ़वाल) पर चढ़ाई करने में जम्मू और कांगड़ा के फौजदारों की सहायता की थी। ये सिरमौर और कोताहा का सिलसिला किसी न किसी रूप में लगातार चलता रहा।

            अहमदशाह अब्दाली के हमलों के दौरान 1260 में कोताहा, नारायणगढ़ और भिरोम की कमान, मीर मुहम्मद बक के हाथ में थी। वाल्टर हैमिल्टन (1820) ने लिखा है कि 1775 में मोरनी पर सिरमौर के राजा का कब्जा हो गया था। गुरखा युद्ध के दौरान सिरमोर के राजा रत्नप्रकाश को भाग कर मोरनी के किले में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद का घटनाक्रम पहले ही लिखा जा चुका है।

            अब हम मुगल काल से जुड़े हुए इतिहास की दूसरी  कहानी पर जाते हैं। कोताहा के मीर की वर्तमान पीढ़ी का कहना है कि चार भाई हुमांयू के साथ ईरान से आए थे। सबसे बड़ा भाई मीर बर्खुरदार मुगल फौज में शामिल हो गया और सबसे छोटा भाई सूफी फकीर हो गया और कद ज्यादा लंबा होने की वजह से 9 गजा पीर कहलाया। मीर बर्खुरदार का वंशज औरंगजेब के साथ गोलकुण्डा की चढ़ाई में शामिल था और उसक पोते कासिम अलीखान को मुगल बादशाह फरूखशियार ने कोताहा की जागीर दी। मोरनी के राजपूत मुखिया दीपचंद की मृत्यु के बाद बादशाह मोहम्मद शाह गाजी ने मोरनी का इलाका भी कासिम खान को दे दिया। उसका बेटा मुहम्मद बकरअली खां-1 सन् 1760 में सिक्खों से लड़ते हुए सढौरा में मारा गया था।

            अब पाठक दो तरह की ऐतिहासिक कहानी पढ़कर असमंजस में होंगे कि वास्तविकता क्या है।

            रॉयल सोसायटी आफ आर्टस के जर्नल के जून 1902  के अंक में एक श्रद्धांजलि संदेश के अनुसार मीर परिवार का वंशज राजा सैयद मुहम्मद बकर अली खान सीआईई की मृत्यु  20-01-1902 को हुई थी, जिसके पूर्वजों को सुल्तान बहलोल लोदी  (1452-1489़) ने पूंडरी और अन्य गांवों की जागीर दी थी। बाद में फरूखशियार ने कोताहा की जमींदारी कासिम अलीखान को दी व मुहम्मद शाह गाजी ने दीपचंद की मृत्यु के बाद उसका इलाका भी कासिम अली खान को दे दिया गया था।

            अब हम इस ऐतिहासिक झलक के अंतिम पड़ाव की ओर चलते हैं। सन् 1857 के विद्रोह के दौरान तत्कालीन मीर अकबर अली खां अंग्रेजों की शक की निगाह में आ गया। उसके इलाके से जमुना की तरफ जाने वाले बागियों को पकड़वाने में कोताही के आरोप में अम्बाला के डिप्टी कमीशनर टीडी फोर्सिथ ने उस पर एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया। शक की गुंजाइश और बढ़ गई जब सितम्बर 1857 में मुज्जफरनगर से उसके दामाद का पत्र पकड़ा गया। कोताहा के किले की तलाशी के दौरान आपत्तिजनक युद्ध सामग्री पाने पर पंजाब के चीफ कमीशनर के हुक्म से कोताहा और मोरनी के किले तोड़ डाले गए। बाद में 1864 में अंग्रेज सरकार ने षड्यंत्र के आरोप में कोताहा के किले को धूल धूसरित करवा दिया, जिसके लिए एक सिविल इंजीनियर को दो महीने लगे। बाद में मीर पर मोरनी और कोताहा में रहने पर पाबंदी लगा दी। हालांकि सन् 1880 में तत्कालीन मीर के रुतबे को बहाल कर दिया।

            अंत में हम चंडीगढ़ में स्थित म्यूजियम और आर्ट गैलरी में प्रदर्शित कुछ प्राचीन मूर्तियों पर एक नजर डालें जो सन् 1970 मोरनी के ताल की खुदाई के दौरान पाई गई हैं। पत्थर से तराशी गई इन मूर्तियों में 10वीं से 13वीं शताब्दी तक की धार्मिक-सांस्कृतिक  झलक मिलती है। महिषासुर मर्दिनी शिव कामांतका, सकुलिशा (शिव का आखिरी अवतार) की मूर्तियां इस बात का संकेत देती हैं कि इस इलाके में शैव परम्परा का प्रचलन था। मोरनी-बडयाल सड़क पर (नाहन की ओर जाते हुए) मोरनी से 16 किलोमीटर दूर बनी गांव में  स्थित भद्रकाली का प्राचीन मंदिर के अवशेष भी इसी बात की ओर इशारा करते हैं। मीर जाफर अली को भेंट की गई सनद में भी भवानी देवी के दो मन्दिरों का जिक्र आता है।

            भवानी देवी के ऐतिहासिक मंदिर और खुदाई में मिली मूर्तियां शैव-शाक्त परम्पराओं के अस्तित्व का उदाहरण है। पिजौर में भीमा देवी मंदिर के अवशेष, चण्डी-मंदिर, त्रिलोकपुर मंदिर आदि से स्पष्ट है कि पूरा इलाका वैष्णववाद के प्रभाव से दूर रहा है। यहां के लोगों के रहन-सहन, खान-पान व धार्मिक रीति रिवाजों पर इसकी छाप देखी जा सकती है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा, (नवम्बर-दिसम्बर 2015) पृ.- 75 से 76

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