नूरू की थाली – रामकिशन राठी 

घोड़े दौड़ रहे थे…क्यड़पड़-क्यड़पड़, नगाड़े बज रहे थे…पडग़ड़ाम…पडग़ड़ाम-पडग़ड़ाम…

लड़ाई के मैदान के नजारे को बयान करते हुए वह मुंह से ऐसी आवाजें निकालता था जो हूबहू घोड़े की टापों से मिलती-जुलती थी और नगाड़े पर डंके की चोट की आवाज भी मुंह से निकालता था, जैसे वास्तव में नगाड़ा ही बज रहा हो। फिर वह जोश भरे स्वर में युद्ध का वर्णन करता था।

एक लड़ैये मोहबे वाले जिनकी मार सही न जा
एक को मारै दूजा मरज्या तीजा पड़ै सनाका खाय

इतने जोशीले स्वर में वह आल्हा गाता था कि सुनने वालों को भी जोश आ जाता था। सिंहासन बतीसी के किस्से, बेताल कथाएं, मीरा के भजन, लोककथाएं, सीता के दोबारा वनवास की व्यथा-कथा और लव-कुश की बहादुरी की घटनाएं…इन सब का सजीव वर्णन बच्चों को ऐसा लुभाता था कि बच्चे उसे देर रात का सोने नहीं देते थे।

पशुओं में जब कोई बीमारी हो जाती, तो रांझा गाने के लिए गवैये बुलाए जाते थे। उनके साथ बैठकर वह हारमोनियम की ताल पर उनसे ताल मिलाकर इतना आनंदमयी समां बांधता था कि पौ फटने तक लोग सोने का नाम नहीं लेते थे। सारंगी और हारमोनियम के साथ रामदीन की ढोलकी, ये सारे गजल का समां बांध देते थे।

इतने सामाजिक संस्कारों का धनी था नूरदीन लुहार। वह गांव भर में नूरू के नाम से मशहूर था। शाम चार बजे वह ऐरन गरम करता था और कस्सी, खुरपा, दरांती, कुहाडिय़ां उसके ऐरन पर देने लिए जाते थे। देर शाम तक हाली अपनी फालियों की नोक पैनी कराते थे। नौ बजे तक उसकी धौंकनी कोयलों को गरम रखती थी। फिर मौहल्ले भर के बच्चे उसे कहानियां सुनाने के लिए घेर लेते थे। उसकी मां लालमिर्च  व लहसुन मिश्रित कचरियों की चटनी के साथ रोटियां उसे बच्चों के बीच में ही थमा जाती थी। मां जानती थी कि बच्चे उसका पीछा नहीं छोड़ेंगे। बच्चे भी उसके साथ खाना खाने लग जाते। कहानियोंं की फरमाईश नूरू को ठीक से खाना भी नहीं खाने देती थी। चटनी और कहानियों के रसास्वादन के बीच बच्चे सो जाते और माताएं और बहनें कंधे से लगाकर उन्हेंं घर ले जाती थी।

पूरा सामाजिक ताना-बाना एकदम दुरुस्त था। गांव में किसी को भी किसी प्रकार की चिंता नहीं थी। रबी की फसल पक जाने के बाद पूरा गांव उमंग के साथ होली मनाता था। ईद और दीवाली पूरे समाज के सांझा त्यौहार थे।

साल 1947 की त्रासदी ने पूरे के पूरे सामाजिक प्रेम में फूट के बीज बो दिए। सुख-दुख के साक्षी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। आजादी की लड़ाई पूरे समाज ने मिलकर लड़ी थी। बंटवारे की तलवार ऐसी लटकी कि जमीन के टुकड़े के साथ ही दिलोंं का बंटवारा भी हो गया।

गांव के समझदार लोगों को चिंता हुई। मामदीन तांगे वाले ने सबसे पहले जाने की इच्छा जाहिर की। गांव समाज ने बहुत समझाया था। सब तरह की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली, लेकिन अज्ञात भय के कारण समझ भी पलायन कर गई थी।

गांव के नौजवान प्रत्येक परिवार को जींद तक सुरक्षित ले जाते थे। आगे फौज-पुलिस का इंतजाम था। नूरू का परिवार आखिर तक जाने को तैयार नहीं हुआ। मेद ने उसे समझाने की कोशिश की।

‘नूरू’

‘जी चाचा’

‘तू क्या समझता है हम तुझे भेजकर खुश हैं। अरे पगले तेेरे बिना हमारा काम कैसे चलेगा। कौन हमारे फाली-खुरपे ठीक करेगा। बच्चों को कहानियां कौन सुनाएगा।’

‘चाचा जिस मिट्टी में पैदा हुए, खेल कूदकर बड़े हुए, इतना प्रेम आपसे मिला। आगे तो अंधा कुआं है ना! वहां न जाने हमारे साथ क्या होगा? इसी मिट्टी में दफन होने की इच्छा है चाचा।’

‘अरे पगले! अभी तेरी लंबी उम्र है। आगे भी मिलते रहेंगे। समय के आगे किसी की कोई तरकीब चली है क्या? जा…! खुश रहना….।’

और मेद की बोलती बंद हो गई। वह फफक कर रो पड़ा। उसने नूरू को गले लगाया। उसके और अपने आंसू पोंछे। साफे का पल्लू आंसुओं से तर हो गया।

और फिर नूरू की विदाई का समय आ गया। उसने अपने बरतन, कपड़े, घन, हथोड़े गांव के घरों में जाकर बांट दिए। गांव के लोगों ने औरतों ने यथायोग्य नकदी व बच्चों के कपड़े नूरू को दिए। दिल्ली से जींद जाने वाली रेलगाड़ी का समय हो गया था। आदमी और औरतें स्टेशन पर गाड़ी में बिठाने गए। सब की आंखें नम थी। कहने-सुनने को कुछ भी नहीं था।

रेलगाड़ी आई। गांव के नौजवानों की टोली नूरू के साथ रेल में बैठ गई। एक बार फिर दोनों तरफ से आंसुओं की बाढ़ आ गई। जिनकी आंखों में अपने सगों की मौत पर भी आंसू नहीं आए थे उनकी आंखों से सावन-भादों बरस रहे थे। गाड़ी चल दी। हाथ हिलाकर दोनों तरफ से अभिवादन के साथ विदाई हुई।

एक अजीब इत्तिफाक हुआ। नूरू की विदाई के समय बच्चे स्कूल में गए हुए थे। वरना आंसुओं का एक सैलाब और झेलना पड़ता। स्कूल से छुट्टी हुई तो नूरू के घर के सामने बच्चों की भीड़ लग गई। ऐरन ठंडा पड़ा था। घर सूना पड़ा था। बच्चे अंदर गए तो घर में कोई नहीं मिला। उनका दिल बैठ गया। बड़े बच्चे तो कई दिन से पलायन देख रहे थे। उनकी समझ में बात जल्दी आ गई थी। छोटे बच्चे अवाक् थे। समय जैसे ठहर गया हो। किशना घर पहुंचा

‘मां’

‘……’

‘नूरू कहां गया?’ किशना सहमा हुआ था।

‘नूरू चला गया।’

‘कहां’

मां किशना को कुछ नहीं समझा पाई। वह रो पड़ी। किशना भी मां से लिपटकर रो पड़ा। नूरू किशना के लिए एक थाली दे गया था।

धीरे-धीरे बिना समझाए ही मामला सब की समझ में आ गया। और फिर आ गया 15 अगस्त। देश का पहला स्वतंत्रता दिवस।  पहले दिन स्कूल में फरमान जारी हुआ कि सब बच्चे खाकी कमीज और खाकी निक्कर पहनकर आएंगे और हाथ में तिरंगा झंडा लेकर आएंगे।

किशना के पास चौसी (खद्दर) की निक्कर और सफेद कमीज थी। मां ने उनको खाकी रंग में रंग दिया। साथ ही मां ने बड़े सफेद कागज पर तिरंगा झंडा बना दिया। गेरू पीसकर ऊपर का हिस्सा केसरिया रंग का बना दिया। कोंधरे के पत्तों को पीसकर नीचे हरा रंग बना दिया और बीच में काली पेंसिल से अशोक चक्र बना दिया। गेहूं के आटे की लिहाई बनाकर लंबे सरकंडे में लिहाई से चिपका दिया।

दुआ के मैदान में लंबे पोल पर स्कूल के तिरंगे में बच्चे फूल बरसने के लिए बेताब थे।

हैडमास्टर जी ने तिरंगे की रस्सी खींची। फूल बरसे। भाषण भी दिया। देश के दो टुकड़े हुए, यह भी बताया। साथ ही बताया गया कि अब देश आजाद है। हमारा शासन होगा। अब अंगे्रेज चले गए हैं।

हवा बंद थी। तिरंगा शांत था। शायद तिरंगा उदास था। किशना भी उदास था। वह सोच रहा था। अंग्रेज चले गए। नूरू भी तो चला  गया। उसका बाल मन आहत था।

नूरू की दी हुई थाली में ही किशना खाना खाता था। थाली की कलई उतर चुकी थी। दादा ने उसे बताया था कि थाली में उर्दू भाषा में नूरू लिखा हुआ था। यह नूरू का नाम लिखा हुआ था। मां ने थाली की कलई करा दी थी। थाली चमक रही थी। कलई करने के बाद थाली में नूरू का नाम धुंधला पड़ गया था। सुए से खुरच कर किशना ने नूरू का नाम फिर से उजागर कर दिया था। आठवीं कक्षा के बाद किशना जिला मुख्यालय के स्कूल में पढऩे चला गया था। वहीं छात्रावास में रहने लगा। नूरू की थाली पुरानी पड़ चुकी थी। एक किनारे में तरेड़ आने से मांजते समय मां का हाथ कट गया था।

दूसरे बरतनों के साथ मां ने वह थाली भी फूट में बेच दी थी। किशना घर आया तो मां से पूछने लगा :

‘मां…’

‘बोलो बेटा’

‘नूरू की थाली कहां है?’

‘बेटा उसमें  तरेड़ आ गई थी। उसे मैंने फूट में बेच दिया। किशना उदास हो गया। वह सोच रहा था….’

‘नूरू की थाली भी चली गई। अब उसके पास नूरू की यादें, उसकी कहानियां और उसकी मुस्कुराहट रह गई, जिसे कोई नहीं मिटा सकता।’

उसे कबीर का दोहा याद आ रहा था

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय

राजा प्रजा जेहि रूचै शीश देय ले जाए

सीस में प्रक्षेपित अहंकार को त्याग दो, तभी प्रेम का अहसास हो सकता है। प्रेम का कोई विकल्प नहीं है।

1407/21, प्रेम नगर, रोहतक (हरियाणा)

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2017, अंक-10), पेज – 41-42

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