विभाजन की यादें

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अंशु मालवीय की गोपाल राम अरोड़ा से बातचीत

श्री गोपाल राम अरोड़ा, हिसार, हरियाणा में रहते है। सरकारी नौकरी से रिटायर हुए कई बरस बीत गए। पत्नी और बच्चों के साथ रहते हैं। हिसार में एक ख़ामोश-सी सुबह उनसे बात हुई। जब वक्त रुक गया था और पुरानी यादों के स्याह-सफेद साये रूबरू हुए थे। ये यादें थीं मुल्क की तक़्सीम की। सुनते-सुनते यह महसूस हुआ कि किस तरह विभाजन ने एक मिले-जुले समुदाय को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। जब हम बांटने पर आते हें तो बंटवारा कभी रूकता ही नहीं। वह नए-नए आधार तालाश लेता है। मुल्क का बंटवारा किसी न किसी रूप में आज भी हमारी ज़ेहनियत और समाज पर भारी है। भूलना मुमकिन नहीं और याद करना तकलीफ देता है लेकिन, याद करना जरूरी है ताकि बंटवारे से उबर कर सांझे को याद किया जा सके। वे बोलते रहे मैं नोट करता रहा। जब बातें खत्म हुई तो मैंने पूछा कभी झंग (पाकिस्तान) जाने का दिल करता है? नतीजा-पासपोर्ट की तैयारी चल रही है। पेश है उनकी यादें, उन्हीं की ज़बानी।

1947 में चौथी क्लास में पढ़ता था। जुलाई-अगस्त में दो महीने की छुट्टियां हुई थी। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान कैसे बना? मेरे पिताजी तीन भाई थे। मेरे पिताजी की किरयाने की दुकान थी। ताऊजी हिन्दू बिरादरी में चौधरी माने जाते थे। उनकी मुसलमानों में भी अच्छी पैठ थी। दो महीने की छुट्टी हुई तो ये बताया गया कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बन रहा है। पहले की तरह सब सोच रहे थे कि दंगा होगा और सब शांत हो जाएगा, सब अपने-अपने घरों में चले जाएंगे। हमारे घर के सामने एक किलेनूमा घर था। एक दिन सभी हिन्दू बिरादरी उस घर में इकट्ठे हुए। हमारे गांव-हवेली बहादुरशाह के मुसलमान मुखिया के ताऊजी से बहुत अच्छे संबंध थे। उन्होंने ताऊजी से बताया कि हो सकता है आज दंगाई आएं। हम जहां रह रहे थे, वहां कढ़ाहों में पानी गर्म किया, ईंटें इकट्ठी कर ली। छत की दीवार पर ईंटें जमा दी गई, परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांव के मुसलमानों ने दंगाई भीड़ को गांव के बाहर से ही भगा दिया।

एक दिन ऐसा आया कि हमने यहां से जाना है। घर में जिसके पास जो कुछ था, खाने-पीने का, इकट्ठा किया-हलवा बन रहा था हमारे घरों में वहीं पर रोटियां बनाई गईं-भौज जैसा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ कि हमें भी जाना है। दो-चार दिन बाद फिर उसी तरह हमला करने की कोशिश हुई। कुछ लोगों ने कहा कि अगर आप मुसलमान बन जाएं तो आप पर हमला नहीं होगा। गांव के मुसलमान भी आए। एक हिन्दू भाई ने मुसलमान होना स्वीकार कर लिया। वो अपनी बीवी को लेकर किले से नीचे उतरने लगा। उसके बड़े लड़के को इस बात की भनक पड़ी। वो उनके आगे आकर खड़ा हो गया। उसकी बाप के सामने तो कुछ नहीं चली, लेकिन कहा ‘मां को नहीं जाने दूंगा।’ लड़का 13-14 साल का था, नाम था अमरनाथ। उसका बाप मस्जिद में गया अकेला मुसलमान बनने।

आसपास के गांव की भी सूचनाएं आती रहती थीं, जहां-जहां भी हमले होते थे। उन सबकी सूचना मिलती रहती थी। जिस गांव में हमारी मौसी रहती थी उस गांव पर भी हमले होने का अंदेशा था तो हिन्दुओं ने अपनी पत्नियों, बच्चियों को मार दिया और सिर पर कफन बांध कर निकले। मौसी की सास ने अपने किसी पोती या बहू का सिर कलम करने से इन्कार कर दिया, लेकिन उन सबको ज़्ाहर पिला दिया। सबको उल्टी आ गई और सारी बहुएं और बेटियां बच गई। इतने में पता चला कि हिन्दू मिलिट्री आ गई, इसके साथ-साथ हमारे गांव में भी मिलिट्री आ गई। हम सब अपने-आपको सुरक्षित महसूस करने लगे।

मिलिट्री ने आदेश दिया कि आप लोगों को यहां से चलना है। आप जो कुछ उठा सकते हो उठा लीजिए। हमारे ताऊजी चौधरी बिशन दास वहां पर गुरुद्वारे में गए। ग्रंथ साहिब की एक बीड़ छोड़कर बाकी सभी बीड़ों को पास ही एक नहर हवेली प्रोजेक्ट में प्रवाहित कर दिया।

वो दिन आ गया। हमारे लिए ट्रक तैयार हुए रामलीला ग्राऊंड में। सभी लोग जमा होने लगे। उनको ट्रकों में भरकर भुंग मिधयाना इंडस्ट्रियल एरिया भेजा जाने लगा। हमारे परिवार वाले भी ट्रकों पर चढऩे लगे, लेकिन किसी भी ट्रक में हम सारे नहीं बैठ सके। जिस ट्रक में मैं था, अपने परिवार से अकेला था। ट्रक मिधयाना पहुंचे। मां-बाप ने बच्चों को संभाला। वहां कारखानों में जिसको जगह मिली, वहीं उसनेे डेरा डाल दिया। एक दिन घूमते हुए हमें एक बड़ी दरी मिली। हम उसको  दिन में बिछाते थे और रात को तंबू बना लेते थे। वहां रोजाना दरबार साहब का प्रकाश होता था। मिलिट्री की तरफ से आटा-दाल मिल जाता था। हम तकरीबन एक महीना रहे। एक दिन पता चला कि आज गाड़ी बाहर जा रही है। जो सामान हमारे पास था, उसे लेकर कूच किया।

दुनिया मेले की तरह जा रही थी। मेरे पिता के सर पर सामान था। मुझे मेरी बहन जो केवल ढाई साल की थी सौंप कर मेरे मम्मी-पापा आगे बढ़ गए। मम्मी-पापा आंखों से ओझल हो गए। हम दोनों रोते-रोते आगे बढ़ रहे थे। इतने में पिताजी वापिस आए, उन्होंने  मेरी बहन को उठाया, मुझे उंगली से लगाकर मां के पास वापिस आ गए। इतने में मेरे ताऊजी और चाचा का परिवार दादी समेत मिधियाना स्टेशन पर इकट्ठा हो गए। गाड़ी आई। मम्मी, पापा, चाचा, चाची सबने गाड़ी में सामान रखना शुरू कर दिया। गनीमत यह रही कि हमारे तीनों परिवार एक ही डिब्बे में चढ़ गए। कैंप से चलने से पहले काफी सारी रोटियां पकाकर जमा कर रखी थीं।

इतने में मुस्लिम मिलिट्री आई। उसने हमारी गाड़ी का चार्ज संभाला। साथ में चार गोरखे थे। गाड़ी चल पड़ी। स्टेशनों पर रूकती चलती, एक जगह जंगल बियाबान में खड़ी हो गई। सवेरे का टाइम था। दोपहर होने को आ गई, गाड़ी नहीं चली। लोगों के पास पीने को पानी नहीं था। पास में एक छोटा नाला बह रहा था। उसमें से पानी भरकर इकट्ठा कर रहे थे। दोपहर बाद उन चारों गोरखों ने गाड़ी चलाने के लिए स्कीम बनाई। एक गोरखा इंजन में, दूसरा गार्ड के पास, बाकी दोनों गाड़ी की छत पर चढ़ गए। असल में गाड़ी को इसलिए रोका गया था, ताकि उस पर हमला हो सके। दूर से लोग आते हुए दिखे। गार्ड और इंजन वाले गोरखों ने…गार्ड और इंजन ड्राइवर को गाड़ी चलाने का आदेश दिया। पहले उन्होंने इंकार किया, लेकिन जब मिलिट्री ने बंदूकें तान ली तो गाड़ी सरपट दौडऩे लगी। यह सितम्बर-अक्तूबर का कोई समय रहा होगा।

रात में हम बच्चे सो गए। इधर सूरज निकला तो हमारी जाग खुली। अटारी से पहले कहीं गाड़ी रूकी थी। देखा कि चारों तरफ लाशें ही लाशें पड़ी हैं। इतने में हमने भारत की धरती पर प्रवेश किया। हिन्दुस्तान में रेलवे के किनारे-किनारे लाशों के ढेर पड़े थे। ऐसा मालूम होता था कि हमारे आने से पहले भारत और पाकिस्तान में कत्लेआम हुआ था। भारत में प्रवेश करते ही भारत माता की जय के नारे लगे। और हम यह सोच रहे थे कि अब हम बिल्कुल सुरक्षित हैं। गाड़ी अटारी स्टेशन पहुंची और इसके बाद अमृतसर स्टेशन पहुुंची। हमारे तीनों परिवार अमृतसर स्टेशन पर उतरे। हमें पता चला कि हमारे गुरुजी भी यहीं हैं। अमृतसर में उनकी एक धर्मशाला थी। उसी धर्मशाला में हम भी चले गए। मेरे नानाजी (हमारे नाना पटवारी थे) भी वहीं पर आए, क्योंकि मेरी नानी और मेरे दो मामा भी हमारे साथ थे। जब हमारे नाना आए उससे पहले हमारी नानी को कोई घातक बीमारी थी। वहीं पर रहते हुए हमारी नानी की मौत हुई।

भारत के विभाजन से पहले सभी सरकारी नौकरी वालों से ऑप्शन मांगा गया था कि वो भारत में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में। नाना ने भारत सरकार का ऑप्शन दिया था और उन्हें भिवानी तहसील में पटवारी लगा दिया गया। अमृतसर से हमें वो भिवानी ले आए, जहां हमें मकान अलाट था। हमारे नाना जी मेरी मम्मी, पिताजी समेत हमें भिवानी ले आए। हमारे ताऊजी और चाचाजी  कुरुक्षेत्र कैंप में चले गए। भिवानी आने पर मेरे छोटे मामा को माता निकली और उसकी मौत हो गई। एक दिन मास्टर जी हमारे घर आए वो सर्वे कर रहे थे कि किस बच्चे ने किस कक्षा तक पढ़ाई की है। बच्चों के नाम लिखकर उन्हें स्कूल में भेजा जाए। हमारी जमीन और मकान की टेम्परेरी अलाटमेंट भिवानी तहसील में ही चांग में हो गई। वहां हमारे चाचा-ताई को भी मकान अलाट हो गया। चाचा-ताऊ भी वहीं आ गए। हमने चौथी पास की और पांचवीं में हमारा दाखिला चांग में हो गया। ये अप्रैल 1948 की बात होगी। भारत आकर पिताजी काम तलाश कर रहे थे। उसी बीच एक जंगल की नीलामी निकली थी। पिताजी ने जंगलात में काम करना शुरू कर दिया। काम चल निकला।

आने के बाद झंग से कोई सम्पर्क नहीं रहा। 15-20 साल पहले कोई व्यक्ति आया था हमारे गुरु जी के पास तभी उसके पास रशीदपुर गुरुद्वारे के मेन गेट की फोटो देखी थी। एक बार जाने का तो मन करता है। हमारा गांव हवेली बहादुरशाह-बड़ा गांव था। वहां हाईस्कूल था, अस्पताल था। पचास-पचास फीसदी हिन्दू-मुसलमान की आबादी थी। वो वहां पर भाईचारे में रह रहे थे। वहां कोई ऐसी भेदभाव की बात नहीं थी। मुझे अब भी गांव याद है। वहां हमारी 13वीं पीढ़ी वाले पूर्वजों की समाधि है चौगिदा में। हमारे गांव में आनंद परिवार के अलावा कोई वहां की मिट्टी छू नहीं सकता था। सब याद है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2017, अंक-10), पेज – 77-78

 

 

 

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