वैचारिक योद्धा डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल – डा. सुभाष चंद्र

डा ओमप्रकाश ग्रेवाल बदलाव के लिए प्रयासरत सक्रिय बुद्धिजीवी थे। हरियाणा के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश को उन्होंने गहरे से प्रभावित किया। रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों से हमेशा विमर्श में रहे। उनकी उपस्थिति किसी भी साहित्यिक संगोष्ठी-सेमिनार को बौद्धिक शिखर पर पहुंचा देती थी। डा. ग्रेवाल मार्गदर्शक, दोस्त व गंभीर पाठक-आलोचक के रूप में हमेशा ही उपलब्ध रहते थे। उनकी प्रखर बौद्धिकता, गहरे सामाजिक सरोकार, उदार दृष्टि, संवेदनशीलता, सदाश्यता, आदर्श-भावना, विनम्रता, सादगी और मिलनसारिता के समावेश से निर्मित व्यक्तित्व ने बहुतों को गहरे से प्रभावित किया।

मेरा जुड़ाव उनसे 1990 में हुआ और वह निरंतर बढ़ता गया। व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने मेरी मदद भी बहुत की। वैचारिक तौर पर जो दिशा पकड़ी उसमें डा. ग्रेवाल का मुख्य योगदान है। छोटी छोटी संगोष्ठियों में उनसे सुनी हुई बातें पता नहीं कब दृष्टि का आकार लेने लगी। जब तक वे रहे उनका वैचारिक सानिध्य एवं स्नेह निरंतर मिलता रहा। उनके पास बैठकर कोई भी अपने को छोटा महसूस नहीं करता था।

यद्यपि वे व्यक्तिगत जीवन के संबंध में बहुत कम बातें करते थे, लेकिन गाहे-बगाहे कोई-न-कोई प्रसंग बता जाते। हरियाणा के गांवों में औपचारिक शिक्षा को हमेशा से ही शक की निगाह से देखा जाता है और स्कूल-कालेज में पढ़ रहे छात्र की बुद्धि व व्यवहारिकता को जांचने के लिए उसके समक्ष कठिन पहेलियों को सुलझाने की चुनौती रख देते हैं। डा. ग्रेवाल उनको हमेशा ही सुलझा देते। अपनी इस हाजिर-जबाबी और तर्क-क्षमता के कारण उन्होंने काफी शाबासी बटोर ली थी और लोगों को उनसे उम्मीद हो गई थी कि वे कुछ-न-कुछ बड़ा जरूर करेंगे। यह हाजिर जबाबी और मुश्किल परिस्थिति के हल खोजने की प्रवृति उनके जीवन का ही अंग बन गई थी। जिसके दर्शन उनके पूरे आलोचना कर्म में स्पष्ट होते हैं।

अध्ययन ही उनका शौक था। वे अध्ययन-अध्यापन में डूब जाते थे। डा. ग्रेवाल पीएचडी के दौरान अमेरिका में रहे। उनसे वहां के अनुभव पूछते और वहां के बारे में जानना चाहते तो वे कहते कि वो कहीं घूमने गए ही नहीं अपने कक्ष में अध्ययन ही करते रहे।

कमजोर पहलुओं को चिह्नित करने में उनको महारत हासिल थी। जब वे अमेरिका में पीएचडी कर रहे थे तो वियतनाम युद्ध चल रहा था। वियतनाम युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध का प्रतीक बन गया था। विश्वविद्यालय के छात्र इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंट गए थे। डा. ग्रेवाल वियतनाम युद्ध में अमेरिकी नीतियों के विरोध में थे। बदल रही परिस्थितियों पर छात्रों के बीच हर रोज ही गर्मागर्म बहसें होती। अपने पक्ष की नीतियों और कार्यवाहियों पर रणनीतिक चर्चा होती। मित्र लोग बहुत आशाजनक व सकारात्मक बातें करते तो डा. ग्रेवाल की पैनी नजर प्रतिपक्ष की कारर्वाइयों का पूर्वानुमान लगा लेती और वे उसे बेबाकी से जाहिर करते। बार-बार इस तरह के विचारों के रखने से दोस्त हमेशा उनको मजाक में कहते कि तुम हमारी तरफ हो या अमेरिका की तरफ। वे कोई ज्योतिषी तो नहीं थे लेकिन द्वंद्वात्मक चिंतन पद्धति पर गहरी पकड़ से भविष्य के कुछ सूत्र उनके हाथ लग जाते थे।

डा. ग्रेवाल साहित्यिक समीक्षक थे। एक कविता सुनकर वे उस पर घंटों बातचीत कर सकते थे। रचना की ताकत को तो रेखांकित करते ही थे लेकिन उनकी वास्तविक प्रतिभा के दर्शन होते रचना की कमजोरियों को उद्घाटित करने में। कमजोरियों पर उंगली टिकाने में शायद उनको महारत हासिल हो गई थी। वे स्वयं भी इसके प्रति सचेत थे। वे अक्सर कहते थे कि मुझे हरियाणा में सौ कमियां गिनाने के लिए कहो तो मैं झट गिनवा दूंगा लेकिन यहां के समाज की ताकत दिखाई नहीं देती। असल में यह हरियाणा के पूरे जनवादी आंदोलन की ही कमजोरी थी कि वे अपने समाज के सकारात्मक व प्रगतिशील पहलुओं को पहचानने में नाकामयाब रहा और नकार के स्वर की प्रमुखता के कारण समाज से कटकर अपने ही खोल में सिमटकर रह गया।

वे बहुत सोच समझकर कोई काम करते थे, स्वाभाविक है कि नफे-नुक्सान का आकलन करके किए गए काम में जोखिम की मात्रा न्यूनतम हो जाती थी। वे तमाम संभावित खतरों को भांप लेते थे। डा ग्रेवाल थे तो किसानी से, लेकिन मध्यवर्गीय भले आदमी की विशेषताएं लिए हुए थे। वे सचेत तौर पर किसी को नाराज तो करते ही नहीं थे। यह भलमनसाहत उनको अपने प्रतिपक्ष में भी लोकप्रियता दिलाती थी। वे एक अच्छे मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। सिर फुटौव्वल तक पहुंचे विवाद में भी अपने भाषाई कमाल और अपने भलमनसाहत के बल पर उसे तात्कालिक तौर पर निपटा देते थे। इस भलमनसाहत से वे स्वयं बहुत दुखी थे और कई बार कहते थे कि मैं तो अपनी बात जो कहना चाहता हूं और जिन शब्दों में कहना चाहता हूं वो कह ही नहीं पाता। श्रोता के मद्देनजर शब्द-चयन की पीड़ा से निरंतर गुजरते थे।

डा. ग्रेवाल हरियाणा में बौद्धिक-जगत की चर्चाओं में भी थे और ग्रास-रूट पर भी छोटे-बड़े सेमिनारों में जाते थे। जहां बौद्धिक लोग उनके भाषण को एंजवाय करते कुछ लोग उनके अतिरिक्त बौद्धिक भाषण से ऊब जाते। असल में डा. ग्रेवाल बेशक हिंदी-आलोचक थे, हिंदी साहित्य से गहरे से जुड़े थे और उसकी व्याख्या-समीक्षा भी करते थे, लेकिन असल में वे अंग्रेजी में ही सोचते थे। अंग्रेजी भाषा में सोचकर आम आदमी को समझाने की सरलता उनकी भाषा में नहीं थी। असल में वो दार्शनिक दुनिया में आनंद लेने वाले व्यक्ति थे। लोक के ढेरों चुटकले और कहावतें उनकी जुबान पर थे, लेकिन सिर्फ अनौपचारिक बैठकों और दोस्तों में ही उनकी यह प्रतिभा निखरती थी। भाषणों में और सेमिनारों में यह भाषा पता नहीं कहां गुम हो जाती थी।

डा. ग्रेवाल की भाषाई जादूगरी के दर्शन तब होते थे जब वे समझदार को इशारा काफी के सिद्धांत से सामने वाले की आलोचना करते। सामने वाला नाराज न हो, इसलिए प्याज की झिल्ली की तरह अपने मंतव्य पर भाषा की परतें चढ़ाते। यह प्रयास इतना सचेत होता कि सामने वाला व्यक्ति उनका मंतव्य व भलमनसाहत दोनों समझ जाता। इसके विपरीत उनके लेखों की भाषा देखो तो वे उग्रता से प्रतिपक्ष के विचार पर हमला बोलते हैं। वे यहां कोई रियायत नहीं देते और एक खास बिंदू पर जाकर उनकी भाषा में व्यंग्य का पुट आने लगता है।

उनकी आलोचना-पद्धति की एक खास विशेषता है। अपनी सैद्धांतिक स्थापनाओं से पहले प्रतिपक्ष की मान्यताओं को ईमानदारी से रखना। पूर्व-पक्ष का परिचय देना पूरे जनवादी चिंतन में उनकी अनूठी शैली है। असल में डा. ग्रेवाल का लेखन एक पक्ष निर्माण के कर्तव्य बोध से उपजे एक वैचारिक योद्धा का लेखन है। हिंदी समीक्षा में उन्होंने विशेष योजना के तहत कुछ नहीं लिखा, बल्कि जनवादी आंदोलन और साहित्य दायरों में जो सवाल चर्चा में रहते उन पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कलम चलाते और प्रतिपक्ष की खुदाई करते। इसी प्रक्रिया में वे अपनी मान्यताओं और सिद्धांतों का निर्माण करते।

वे अपने समय की वैचारिक बहसों में शामिल थे। उनकी विशेष बात ये थी कि वो पाश्चात्य ज्ञान की परंपराओं से जुड़े थे। जो भी नया विचार वहां बहस में आता तो वे उसके बारे में मौलिक स्रोतों से अध्ययन करते और भारत के संदर्भ में उस पर विचार करते। लुकाच संबंधी उनका चिंतन हो या फिर उत्तर आधुनिकतावाद संबंधी। उनके चिंतन की विश्वसनीयता, प्रामाणिकता उनके अध्ययन की विशदता व नवीनता में व्याप्त थी।

नब्बे के बाद विचारधाराओं की स्थितियां बदल चुकी थी। अकादमिक दायरों में और विचार-विमर्श के केंद्र कहे जाने वाले विश्वविद्यालयों में विचारशून्यता और दृष्टिविहीन अध्ययन-अध्यापन का दौर शुरु हो गया था। बुद्धिजीवियों में वैचारिक जद्दोजहद की घोर कमी दिखाई दे रही थी। इस माहौल में डा. ग्रेवाल असहज महसूस करते थे।

डा. ग्रेवाल नए संदर्भों में अपने चिंतन और सोच का आत्म-मूल्यांकन करते थे। अपने अंतिम समय में वे अपने चिंतन में दोहराव-ठहराव महसूस कर रहे थे और चिंतन के नए सूत्रों को पकड़ने की जद्दोजहद कर रहे थे। लेकिन जानलेवा बीमारी की वजह से ये कार्य अधूरा ही रह गया।

डा. ग्रेवाल की मृत्यु के बाद उनके चाहने वालों ने कुरुक्षेत्र में डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान बनाया। इसमें कई तरह की साहित्यिक गतिविधियां होती रही हैं। डा. ग्रेवाल के लेखन से नई पीढ़ी परिचित नहीं है। डा. ग्रेवाल की समस्त रचनाओं को प्रकाशित करने की योजना है, उसकी पहली किस्त आपके हाथों में है। इसमें उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाले आलेख हैं, साहित्य के सैद्धांतिक प्रश्नों पर लेख हैं और जातिवाद व आरक्षण पर लेख हैं। यद्यपि ये लेख काफी पहले लिखे गए थे, लेकिन अभी भी इनकी प्रासंगिकता बनी हुई है। डा. ग्रेवाल के शेष लेख चाहे वे साहित्य के सैद्धांतिक पहलुओं पर हों, व्यावहारिक समीक्षा हो अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर हों। उनके समस्त रचना कर्म को प्रकाशित करने की योजना है।

आशा है कि इस प्रयास से साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश को नई ऊर्जा मिलेगी। आपके सुझाव व प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

डा. सुभाष चन्द्र,  प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र,                                                  संपादक, देस हरियाणा

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