डी.आर.चौधरी – डॉ. ओम प्रकाश ग्रेवाल- हरियाणा में नवचेतना के अग्रदूत

संस्मरण


प्रो. ओम प्रकाश ग्रेवाल अपनी जीवन यात्रा में हरियाणा के जिन अग्रणी लोगों के सम्पर्क में आए और जो उन से प्रभावित हुए बिना न रह पाए, उन में जाने-माने शिक्षाविद्, लेखक, पत्रकार तथा दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली में अँग्रेजी के प्राध्यापक, हरियाणा के लोक सेवा आयोग के चेयरमैन और समाचार पत्र पींग के संस्थापक-सम्पादक रहे श्री डी.आर. चौधरी  भी एक हैं। श्री डी.आर. चौधरी का प्रो. ग्रेवाल  से लम्बे समय तक नज़दीकी सम्पर्क रहा। प्रस्तुत है प्रो. ग्रेवाल के साथ बीते उन के समय की दास्तान, उन्हीं की कलम से।  – सम्पादक।

डॉ. ओम प्रकाश ग्रेवाल एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। वह हिन्दी साहित्य में एक स्थापित आलोचक, संवेदनशील चिन्तक, जनवादी लेखक संघ के आन्दोलन से जुड़े एक महत्वपूर्ण सिपाही, एक प्रेरणादायक शिक्षक और मित्रों के मित्र थे। उन के जीवन से जुड़े विभिन्न आयामों पर लिखने वाले बहुत लोग हैं। मेरा जुड़ाव उन से एक मित्र के तौर पर अधिक था और उन से जुड़ी कुछ यादों को ताजा करना चाहूँगा।

            जहाँ तक मुझे याद पड़ता है मेरी उन से पहली मुलाकात 1974  में हुई। उन दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ से जुड़ा हुआ था। 1973 में हरियाणा में तत्कालीन बंसीलाल सरकार के विरुद्ध स्कूल अध्यापकों का एक सशक्त आन्दोलन उभरा। हरियाणा सरकार ने क्रूरतापूर्ण ढंग से इस आन्दोलन को दबाने की चेष्टा की। अध्यापकों ने हरियाणा से कूच कर के दिल्ली को अपना संघर्ष का केन्द्र बनाया। वे वहाँ गिरफ्तारियां देने लगे। इस आन्दोलन के तत्कालीन नेता मास्टर सोहनलाल चण्डीगढ़ में आमरण अनशन पर बैठ गये थे और काफी दिनों बाद उन की हालत नाजुक होने लगी थी। मेरे आग्रह पर दिल्ली विश्वविद्यालय अध्यापक संघ ने हरियाणा के स्कूल अध्यापकों के समर्थन में गिरफ्तारी देने का निर्णय लिया। पहले दिन लगभग 20 प्राध्यापकों ने गिरफ्तारी दी। मुझे पहली बार तिहाड़ जेल में हरियाणा के अनेक अध्यापकों से मिलने का अवसर मिला। केन्द्र सरकार के दबाव में बंसीलाल सरकार को हरियाणा स्कूल अध्यापक संघ से मन्त्रणा कर के फैसला लेना पड़ा और संघर्ष की समाप्ति हुई।

            1974 के ग्रीष्म अवकाश में मैंने और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ अन्य साथियों ने हरियाणा में विभिन्न स्थानों पर स्कूल अध्यापकों की गोष्ठियां कर के ग्रुप बनाने की योजना बनाई। हम कुछ साथियों ने हरियाणा प्रदेश का दौरा किया और अध्यापकों से सम्पर्क साधा। डॉ. ग्रेवाल उन कई गोष्ठिïयों में हमारे साथ थे। उस समय मेरी उन से पहली बार मुलाकात हुई और मैं उन से बहुत प्रभावित हुआ। उस के बाद हमारी मित्रता और घनिष्ठ होती गयी।

            दिसम्बर 1977 में मेरी हरियाणा लोक सेवा आयोग में नियुक्ति हुई और डॉ. ग्रेवाल से मुलाकातों का सिलसिला आगे बढऩे लगा। उस समय हरियाणा में जनता पार्टी की सरकार थी और देवीलाल मुख्यमन्त्री थे। मुख्यमंत्री शैक्षणिक संस्थानों के बारे में मेरी राय को महत्व देते थे। मैंने डॉ. ग्रेवाल को हरियाणा के किसी विश्वविद्यालय, विशेष कर रोहतक विश्वविद्यालय में उपकुलपति पद ग्रहण करने का आग्रह किया। मुझे बड़ी हैरानी हुई जब उन्होंने साफ मना कर दिया। आश्चर्य स्वाभाविक था। विश्वविद्यालय में कोई प्रशासनिक पद पाने के लिये बहुत पढ़े-लिखे लोग टुच्चे किस्म के राजनेताओं की चाटुकारी करते हैं। दूसरी तरफ, आलम यह था कि डॉ. ग्रेवाल के घर जा कर मैंने उन्हें एक उच्चतम पद ग्रहण करने का आग्रह किया और उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई।

            डॉ. ग्रेवाल में कोई पद प्राप्त करने की कोई आकांक्षा नहीं थी। आज के गला काट होड़ के युग में यह बहुत बड़ी बात है। उन की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो गया था और वह इस से सन्तुष्टï थे। वह किसी पद के पीछे भागने की बजाय अपना समय समाज के उत्थान के लिये लगाना चाहते थे। एक सरल-सादा जीवन और दाल-रोटी से गुज़र करना। इस से आगे की होड़ उन्हें बेमानी लगती थी।

            डॉ. ग्रेवाल की एक अन्य खूबी जिस ने मुझे बहुत प्रभावित किया वह उन की कर्तव्यपरायणता थी। वे जब भी रोहतक आते थे तो प्राय: रात को मेरे यहाँ रुकते थे। हम खाना खा कर रात को देर तक विभिन्न मुद्दों पर मन्त्रणा और चर्चा करते रहते थे। प्राय: रात के दो-ढाई बज जाते थे। वह मुझे सोता छोड़ कर प्राय: सुबह जल्दी उठ कर पांच-सवा पांच बजे की एकता ट्रेन पकड़ कर कुरुक्षेत्र जा पहुँचते थे ताकि कोई क्लास  न छूटे।

            मैं उन्हें अक्सर कहता रहता था कि जीवन में इतनी हड़बड़ी की कोई आवश्यकता नहीं। अगर कोई क्लास मिस भी हो जाती है तो अलग से क्लास भी ली जा सकती है। परन्तु उन्होंने इस तर्क को कभी नहीं माना। यहाँ  तक कि सेवा मुक्त होने के बाद भी उन की यह आदत जारी रही।

            डॉ. ग्रेवाल की अन्य खूबी यह थी कि वह फूँक-फूँक कर कदम रखते थे। वह कभी भी किसी चीज़ के बारे में अति उत्साहित नहीं होते थे। किसी भी कार्य में सम्भावित अड़चनों की तरफ उन का ध्यान ज़रूर जाता था। मेरी मनोदशा उन से विपरीत रही है। आशा की एक छोटी सी किरण भी नयी सुबह का पैगाम लगती है। इसी कारण गलतियाँ भी हुईं और नुकसान भी उठाया। डॉ. ग्रेवाल इस बारे में बहुत सचेत थे और किसी समस्या के बारे में उन का आकलन प्राय: सही निकलता था।

            हरियाणा की सांस्कृतिक ऊबड-खाबड़ धरती को हमवार करने के लिये क्या रणनीति हो, इस विषय पर डॉ. ग्रेेवाल से प्राय: चर्चा होती रहती थी। हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि हरियाणा समाज की जड़ता और पिछड़ेपन से निपटने के लिए एक लम्बे वैचारिक संघर्ष की आवश्यकता है। हरियाणा में एक नवचेतना, एक नवजागरण दरकार है और इस प्रक्रिया में कुछ लोगों को नींव का पत्थर बनना पड़ेगा। डॉ. ग्रेवाल उन गिने-चुने व्यक्तियों में से एक हैं जिन्हें हरियाणा की नवचेतना का अग्रदूत कहा जा सकता है।

            डॉ. ग्रेवाल की मृत्यु एक बहुत ही दर्दनाक हादसा रही। उन्हें एक खतरनाक बीमारी ने ग्रस्त कर लिया और उन्हें गहरी पीड़ा से गुज़रना पड़ा। डॉ. ग्रेवाल जैसे एक सज्जन पुरुष के साथ प्रकृति का यह क्रूर व्यवहार क्यों? यह विचार मुझे बार-बार कचोटता है। प्रकृति का यह विधान साधारण समझ से बाहर है।

            डॉ. ग्रेवाल के निधन से हरियाणा प्रदेश और हिन्दी जगत को एक गहरा आघात पहुँचा है। मेरे निजी जीवन में वह एक शून्य छोड़ गए हैं जिसे भरना आसान नहीं, एक ऐसा घाव जो हमेशा रिस्ता रहेगा। परन्तु उन की विरासत बहुत समृद्ध है और उन की यादें बहुत प्रेरणादायक। ये जीवन को सार्थक बनाने में सहायक सिद्ध होंगी।

साभारः हरकारा

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