ओम प्रकाश ग्रेवाल के न रहने का मतलब -रमेश उपाध्याय

संस्मरण


            मेरे दोस्तो में सभी उम्रों के लोग हैं-कई मेरे हम उम्र, कई उम्र में मुझसे बड़े, तो कई उम्र में मुझसे छोटे। ओम प्रकाश ग्रेवाल मुझसे पांच साल बड़े थे। मेरे कुछ दोस्त मुझसे पांच-सात साल बड़े हैं और फिर भी मैं उन्हें तुम या तू कहकर संबोधित कर लेता हूं। इसी तरह मेरे कुछ दोस्त पांच-सात साल छोटे हैं और फिर भी वे मुझे तुम या तू कहकर संबोधित करते हैं और ओम प्रकाश ग्रेवाल मेरे ऐसे दोस्त थे, जो उम्र में सिर्फ  पांच साल बड़े होने पर भी मुझे इतने बड़े लगते थे कि मैं उन्हें कभी ‘तुम’, ‘तू’ ‘यार ओम प्रकाश’ या ‘यार ग्रेवाल’ नहीं कह सका।

            उनसे मेरी मित्रता तब शुरू हुई, जब मैं एक ‘नवोदित कहानीकार’ था और मेरी कहानियों का पहला ही संग्रह ‘जमी हुई झील’ प्रकाशित हुआ था। उसके बाद एक पत्रिका में मेरी कहानी ‘घोंसले’ छपी और उस पर मुझे उनकी बड़ी प्रशंसात्मक तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली। मैं तब तक उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता था, इसलिए मुझे लगा कि ये निश्चय ही कोई बुजुर्गवार होंगे, जो इस तरह मेरी पीठ ठोककर शाबाशी दे रहे हैं। जवाब में मैंने उनका आभार व्यक्त किया और तभी से वे मेरे ‘आदरणीय ग्रेवाल साहब’ हो गए। बाद में जब मेरे मित्र आनंद प्रकाश के माध्यम से उनसे परिचय हुआ और बातचीत हुई, तो उनसे हंसी-मजाक वाली दोस्ती तो तुरंत कायम हो गई, लेकिन मेरे लिए वे बातचीत में ‘ग्रेवाल साहब’ और पत्र लिखते समय ‘आदरणीय ग्रेवाल साहब’ ही रहे। अंत तक।

            ‘अंत तक’ लिखते हुए तकलीफ  होती है, क्योंंकि उन्हें कैंसर न होता तो अभी उनका अंत होना नहीं था। वे बड़े जीवट वाले और जिंदादिल इंसान थे। कुछ समय पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे इस तरह इतनी जल्दी चले जाएंगे।

            हरियाणा के भिवानी जिले के बामला गांव में 6 जून, 1937 को एक साधारण किसान परिवार में जन्मे ग्रेवाल साहब ने उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से तथा पीएचडी की उपाधि न्यूयार्क के रोचेस्टर विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष और बाद में  कला एवं भाषा संकाय के डीन रहे। पहले वे अंग्रेजी में ही लिखते थे, लेकिन बाद में उन्होंने हिन्दी में लिखना सीखा और जल्दी ही एक प्रखर मार्क्सवादी चिंतक और आलोचक के रूप में अपनी जगह बना ली। वे जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्य थे और उसके महासचिव भी रहे। पुराने साहित्य के साथ-साथ नए से नए साहित्य को पढऩे और नए लेखकों से जीवंत सम्पर्क बनाए रखने में वे अद्वितीय थे। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों में समान अधिकार से लिखने ग्रेवाल साहब ने लिखा तो बहुत, लेकिन पुस्तकों के रूप में वह कम ही प्रकाश में आ पाए। उनकी दो ही पुस्तकें प्रकाशित हुर्इं-अंग्रेजी में ‘हेनरी जेम्स: दि आइडियोलोजी ऑफ  कल्चर’ और हिन्दी में ‘साहित्य और विचारधारा’।

            मैं जब आनंद प्रकाश और राज कुमार शर्मा के साथ ‘युग-परिबोध’ का सम्पादक था, तब ग्रेवाल साहब से मेरी घनिष्ठता हुई, जो जनवादी लेखक संघ के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान बढ़ी और उसके बाद बढ़ती ही गई। मैंने 1980 में  जब ‘कथन’ निकालना शुरू किया, तो वे उसकी शुरूआत से ही उसके लेखक, सलाहकार और शुभंचिंतक थे। वे हमारे पारिवारिक मित्र भी थे। प्रखर बौद्धिक, जागरूक चिंतक और अध्ययन, अध्यापन, लेखन, संगठन तथा आंदोलन का व्यापक अनुभव रखने वाले सहृदय आलोचक होने के साथ-साथ वे एक सरल, सहज और हंसमुख व्यक्ति थे। दूसरों के लिए वे डा. ग्रेवाल थे, पर मेरे लिए ग्रेवाल साहब, मेरी पत्नी के लिए भाई साहब और मेरे बच्चों के लिए ग्रेवाल अंकल। कुरुक्षेत्र से दिल्ली आने पर वे अक्सर एक रात के लिए हमारे यहां ठहरते थे और वह रात बातों, बहसों और ठहाकों में कब बीत जाती, हमें पता भी नहीं चलता था।

            मैंने उनके साथ हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक स्थानों की और मुंबई तथा कोलकाता तक की लंबी यात्राएं की थीं। बहुत-सी गोष्ठियों और सम्मेलनों में साथ-साथ शिरकत की थी। जनवादी लेखक संघ के निर्माण में हम दोनों एक साथ सक्रिय थे। बाद में हम दोनों उसकी केंद्रीय कार्यकारिणी में भी साथ रहे। इस सिलसिले में हमने विभिन्न स्थानों पर होने वाली सांगठनिक बैठकों में साथ-साथ हिस्सा लिया और विशेष कार्यों के लिए बनाई गई विभिन्न समितियों में साथ-साथ काम किया। अंतर यह था कि वे जलेस के साथ-साथ पार्टी (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) में भी सक्रिय थे, जबकि मैं उनके बार-बार आग्रह और अनुरोध करने पर भी पार्टी का सदस्य नहीं बना। मैंने इस प्रसंग में उनसे हमेशा एक ही बात कही-‘मैं लेखक हूं, मुझे लेखक ही रहने दीजिए। राजनीति करना मेरे बस की बात नहीं। हां, जब मुझे लगेगा कि राजनीति करना लिखने से ज्यादा जरूरी है, मैं लिखना-विखना छोड़ कर पूरी तरह राजनीति ही करूंगा।’ इस मुद्दे पर उनके साथ कई बार लंबी बहस हुई। अंतत: उन्होंने यह प्रयास छोड़ दिया। लेकिन इससे हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया और वे ‘कथन’ से तथा मेरे परिवार से पहले जैसी ही आत्मीयता से जुड़े रहे।

            दोस्ती और आत्मीयता का मतलब यह नहीं था कि हम हर बात पर सहमत होते थे। साहित्य की रचना और आलोचना के संदर्भ में हमारे बीच कई मतभेद थे, जिनके कारण हममें बहस तो होती ही थी, अक्सर वैचारिक झड़प भी हो जाया करती थी, लेकिन तीखी से तीखी झड़प के बावजूद उनसे मेरा झगड़ा या मनमुटाव कभी नहीं हुआ। मेरे घर में जब ऐसी बहसें और झड़पेें होती थीं, मेरी पत्नी और बच्चे डरने लगते थे कि हम दोनों कहीं लड़ न पड़ें। मगर थोडी ही देर बाद हम हंसने और ठहाके लगाने लगते। तब मेरी पत्नी और बच्चे कहते-‘आप लोग अजीब हैं। अभी लड़ रहे थे, अभी हंस रहे हैं। हम तो डर ही गए थे।’ तब ग्रेवाल साहब हंसकर कोई चुटकला सुनाते और सबको हंसाते हुए हंसते। एक बार उन्होंने यह चुटकला सुनाया-

            एक परिवार में पति-पत्नी कभी लड़ते नहीं थे। उनके पड़ोसियों को आश्चर्य होता कि हम सबके घर में झगड़े होते हैं, इनके घर में कभी कोई झगड़ा क्यों नहीं होता? आखिर एक दिन एक पड़ोसी ने पति से ही पूछ ही लिया-‘भाई साहब, आपके घर में कभी झगड़ा होते नहीं सुना। अगर शांति से रहने का कोई नुस्खा है, तो हमें भी बताइए।’ पति ने उत्तर दिया-‘बहुत आसान है। हमने अपने-अपने काम बांट रखे हैं। छोटे-छोटे फैसले पत्नी कर लेती है, बड़े-बड़े फैसले मैं कर लेता हूं। पड़ोसी ने पूछा-‘छोटे-छोटे फैसले? मसलन?’ पति ने उत्तर दिया-‘मसलन, मुझे कहां नौकरी करनी है, बच्चों को किस स्कूल में पढ़ाना है, हम लोगों को क्या खाना-पहनना है, किन चीजों पर कितना खर्च करना है, ये तमाम छोटे-छोटे फैसले मेरी पत्नी कर लेती है।’ पड़ोसी ने चकित होकर पूछा-‘ये छोटे फैसले हैं, तो वे बड़े फैसले क्या हैं, जो आप करते हैं?’ पति ने उत्तर दिया-‘जैसे यह कि रूस और अमरीका में शीतयुद्ध चलना चाहिए या नहीं, भारत को गुटनिरपेक्ष देश रहना चाहिए या नहीं….वगैरह।’

            दरअसल ग्रेवाल साहब के साथ जिन मुद्दों पर बहस होती थी, वे साहित्य और राजनीति के बड़े व्यापक और गंभीर मुद्दे होते थे। लेखकों की गुटबाजी, पुरस्कारों की राजनीति या साहित्यकारों की निजी जिंदगी के बारे में हम कभी बात नहीं करते थे। दूसरों की निंदा करने में रस लेने की न तो हमारे पास फुर्सत होती थी और न हम इसकी जरूरत ही समझते थे। वे जब भी आते, पहले मेरे परिवार के लोगों से अलग-अलग बात करके सबका हाल-चाल मालूम करते और फिर मुझसे पूछते-‘इधर नया क्या लिखा?’ मैं बताता, तो वे सुनाने की फरमाइश करते और पूरी तल्लीनता से सुनते। इस तरह वे मेरी कई कहानियों के पहले श्रोता रहे। वे कहानी बड़े ध्यान से सुनते और उस पर गंभीरतापूर्वक विस्तार से चर्चा करते। वे अक्सर मेरी आलोचना करते और कहानी को बेहतर बनाने के लिए अच्छे सुझाव देते, लेकिन शुरुआत हमेशा प्रशंसात्मक शब्दों से करते। कई बार मैं मजाक में उनसे कहा करता था-‘कहानी सुना रहा हूं, लेकिन पहले से ही जानता हूं कि आप इसे सुनकर क्या कहेंगे। आप कहेंगे, ‘कहानी अच्छी है, मगर…’ फिर उस ‘मगर का मुंह खुलता जाएगा और उसके पेट मेें मेरी कहानी ही नहीं मैं खुद ही समा जाऊंगा।’ यह सुनकर वे जोर से हंसते और कोई चुटकुला या हास्यजनक प्रसंग सुनाकर मुझे भी हंसा देते।

            वे हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के समान रूप से अधिकारी विद्वान थे। खूब लिखते थे, लेकिन अपने लेखों, समीक्षाओं, टिप्पणियों आदि को संकलित करके पुस्तक छपवाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी। यही कारण था कि उनके जीवन काल में हिन्दी में उनकी एक ही पुस्तक प्रकाशित हो पायी। सो भी इस तरह उनके कुछ मित्रों और प्रशंसकों ने उनके कुछ निबंध तथा समीक्षा-लेख इक_े करके जैसे तैसे पुस्तक छपवा दी। यह पुस्तक थी ‘साहित्य और विचारधारा’ जिसमें संकलित उनके आलोचनात्मक निबंध आठवें और नवें दशकों में हिन्दी की विभिन्न वामपंथी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे। ‘हिन्दी साहित्य-विवेचन में नव्य आलोचना पद्धति’, ‘रचना के कलात्मक और ज्ञानात्मक मूल्यों का सहयोजन’, ‘आधुनिकतावाद का जनविरोधी स्वरूप’, नये काव्य की सामाजिक आधारभूमि’ आदि निबंधों में उनकी सैद्धांतिक आलोचना का और नए-पुराने बहुत से कवियों तथा कथाकारों की कृतियों पर लिखे गये समीक्षा लेखों में उनकी व्यवहारिक आलोचना का जो स्वरूप सामने आया था, उससे नए-पुराने सभी प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकार प्रभावित हुए थे। अत: उनके निबंधों का पुस्तकाकार प्रकाशन बहुप्रतीक्षित था। लेकिन जब वह प्रकाशित हुआ, तब तक दुनिया बदल चुकी थी। सोवियत संघ का विघटन हो चुका था और साहित्य में जनवाद की जगह उत्तरआधुनिकतावाद तथा यथार्थवाद की जगह जादुई यथार्थवाद एक नए फैशन की तरह आ चुका था, जबकि  पुस्तक में इन चीजों की कोई चर्चा नहीं थी। पुस्तक से यह भी पता नहीं चलता था कि इसमें संकलित निबंध कब के लिखे हुए हैं। पुस्तक में न कोई भूमिका  थी, न प्रस्तावना। पुस्तक के फ्लैप पर जो कुछ छपा था, उससे भी पता नहीं चलता था कि ये निबंध कब, किन जरूरतों से और किन परिस्थितियों में लिखे गए थे।

            पुस्तक में संकलित निबंध कई प्रकार के थे। कोई निबंध सैद्धांतिक आलोचना का नमूना था, तो कोई व्यवहारिक आलोचना का। कोई निबंध परिचयात्मक था, तो कोई पोलेमिकल। अपेक्षित जानकारी के अभाव में पाठक यह समझने की भूल कर सकता था कि वे सब स्वतंत्र निबंध नहीं हैं, बल्कि पुस्तक के अध्याय हैं। मसलन, यथार्थवाद के प्रसंग में जार्ज लूकाच पर दो स्वतंत्र निबंध थे-‘जार्ज लूकाच’ और ‘जार्ज लूकाच का वास्तविकतावाद’। इन्हें पढ़कर किसी पाठक को लग सकता था कि ओम प्रकाश ग्रेवाल यथार्थवाद के संबंध में शायद जार्ज लूकाच को ही जानते और मानते हैं। अन्यथा वे यथार्थवाद पर विचार करने वाले अन्य चिंतकों, लेखकों तथा आलोचकों की भी चर्चा करते। फिर, ‘साहित्य और विचारधारा’ ग्रेवाल साहब के उस समय तक प्रकाशित सभी निबंधों  का नहीं, बल्कि कुछ चुने हुए निबंधों का ही संकलन था, जिसमें उन्हें केवल कविता के आलोचक के रूप में प्रस्तुत  किया गया था और कथा साहित्य की आलोचना से संबंधित उनके निबंधों को शायद एक अलग पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने के लिए रोक लिया गया था। मेरे विचार से यह आवश्यक था कि इस चयन की सूचना पुस्तक के पाठकों को दी जाती।

            मैंने अपनी शिकायतें ग्रेवाल साहब के सामने रखीें और कहा कि इन जरूरी सूचनाओं के अभाव में वह पाठक, जो आपके निबंधों को पत्रिकाओं में लगातार पढ़ता रहा है, पूछ सकता है कि आपके कथा साहित्य से संबंधित आपके निबंधों के साथ प्रकािशत कराना ज्यादा उचित न होता? जार्ज लूकाच तो आमतौर पर कथा-समीक्षा के ही संदर्भ में याद किए जाते हैं और कुछ नहीं, तो कम से कम पुस्तक के प्रूफ तो आप खुद देख ही लेते। प्रूफ  ठीक से न देखे जाने के कारण पुस्तक में भयंकर गलतियां चली गई हैं।  लेकिन ग्रेवाल साहब ने परेशानी और पछतावा प्रकट करते हुए भी इतना ही कहा कि ‘मैंने तो देखा भी नहीं कि किताब कैसे बनी और कब छपी!’

            मुझे उनकी यह उदासीनता अच्छी नहीं लगी और मैंने उनसे कहा कि अगली किताब के छपने के समय वे ऐसी लापरवाही न बरतें।

            पुस्तक अच्छी तरह नहीं छपी थी, इसलिए उसकी कोई चर्चा नहीं हुई। लेकिन उसमें संकलित निबंध अपने लिखे जाने के समय बहुत महत्वपूर्ण माने गए थे। उनमें ग्रेवाल साहब ने मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र को हिन्दी साहित्य के संदर्भ में विकसित करने का प्रयास किया था। वे यह मानते थे कि ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र का यह एक मुख्य कर्तव्य है कि प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ चिंतकों द्वारा साहित्य के बारे में जो अवैज्ञानिक और भ्रांतिपूर्ण धारणाएं एवं प्रस्थापित की जाती हैं, उनका सही विश्लेषण द्वारा खंडन किया जाये तथा सामान्य पाठक के सामने साहित्य के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट किया जाये।’

            वे यह भी जानते थे कि ‘साहित्य का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ता है और उसके माध्यम से पाठकों की भावनाओं को उभारा जा सकता है अथवा उन्हें नया मोड़ दिया जा सकता है तथा  पाठक की अपनी आसपास की दुनिया की समझ को प्रखर बनाया जा सकता है।’ लेकिन ‘पूंजीवादी व्यवस्था के पतनशील दौर में जब समाज के प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्वों के बीच संघर्ष तीव्र हो उठता है और शोषित-उत्पीडि़त जनसमूह सचेत और जागरूक होकर पतनशील बुर्जुआ चिंतन द्वारा पोषित भ्रमों को त्यागने लगते हैं, तो समाज के यथास्थितिवादी तत्वों की यह भरसक कोशिश होती है कि साहित्य को स्वस्थ सामाजिक मूल्यों का वाहक  तथा बहुसंख्यक जनता की चेतना को विकसित करने का माध्यम न  बनने दिया जाये।’

            उन्हें लगता था कि साहित्य और विचारधारा के संबंध के बारे में अनेक भ्रांतियां फैलायी जा रही हैं, जैसे-अच्छे साहित्य की रचना के लिए यह आवश्यक है कि लेखक अपने-आपको सभी प्रकार की विचारधाराओं से मुक्त रखे, क्योंकि साहित्यकार किसी वर्ग-विशेष से प्रतिबद्ध नहीं होता, बल्कि उसकी प्रतिबद्धता मानव-मात्र के साथ होती है। या जैसे-वर्ग, देश और काल की परिधियों से ऊपर उठकर शुद्ध मानवीय स्पंदनों से हमारे हृदय को झंकृत करते जाना ही साहित्यकार का एकमात्र लक्ष्य होता है, जबकि विचारधारा लेखक को अपने स्वार्थों और वर्गगत पक्षपातों से ऊपर नहीं उठने देती। या जैसे-साहित्यकार का सरोकार तो मानव स्वभाव की उदात्त आकांक्षाओं और लालसाओं से होता है, जो हमें अन्य जीवों से भिन्न और श्रेष्ठ बनाती हैं, जबकि विचारधारा का क्षेत्र राजनीतिक होता है, जहां सभी व्यक्ति अपने टुच्चे स्वार्थों से अभिभूत होकर एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहते हैं। या जैसे-विचारधारा के सूत्र में बदल जाने से व्यक्ति के अनुभव की सम्पूर्ण आत्मीय अनुपमता और विलक्षणता समाप्त हो जाती है और उसकी जीवंत मूर्तता क्षीण पड़ जाती है। या जैसे विचारधारा में बंधकर व्यक्ति अपनी स्वायत्तता को बनाए नहीं रख सकता और साहित्य-रचना में अपने व्यक्तित्व की असीम संभावनाओं को मूर्त रूप देने में समर्थ होने के बजाय  समाज के आकाओं के आदेश के अनुसार वैसी ही रचनाएं गढऩे लगता है, जैसी कि उनके हिसाब से आम पाठकों के सामने लाई जानी चाहिए और इससे साहित्य सरकारी फरमान या पार्टी का नारा बनकर रह जाता है।

            ग्रेवाल साहब ने अपने लेखन से इस प्रकार की तमाम भ्रांतियों को  दूर करने का प्रयास किया और मार्क्सवादी दृष्टि से विश्लेषण करते हुए उनका खंडन किया। विचारधारा का वर्गीय स्वरूप स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि विचारधारा वर्गीय तो होती है, लेकिन ‘एक वर्ग-विशेष के सामूहिक राजनीतिक कार्यक्रम को ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की समूची चेतना के वर्गीय स्वरूप को हमें विचारधारा की संज्ञा देनी चाहिए। विचारधारा व्यक्ति के अनुभव का कोई ऐसा अंश नहीं है, जिसे हम उसके शेष अनुभव से अलग कर सकें, बल्कि वह उसके समूचे अनुभव का एक विशिष्ट और आधारभूत आयाम है। सचेष्ट, सुचिंतित और सुव्यवस्थित बौद्धिक निष्कर्षों के अलावा विचारधारा हमारी भावनाओं  के धरातल पर भी सक्रिय रूप से विद्यमान रहती है।’

            ग्रेवाल साहब विचारधारा को केवल चेतना या छद्म चेतना न मानकर वर्गीय दृष्टिकोण मानते थे, इसलिए मार्क्सवाद को एक विचारधारा नहीं, बल्कि सर्वहारा वर्ग की विश्व-दृष्टि कहते थे। वे महान साहित्यकार उन्हें मानते थे, जो अपने समय के सबसे अधिक प्रगतिशील वर्ग के दृष्टिकोण को अपना लेते हैं। दूसरी तरफ जो लेखक अपनी रचनाओं में किसी ऐसे वर्ग की विचारधारा को अपनाए रहते हैं, जो ऐतिहासिक विकास के क्रम में पिछड़ चुका हो और जिसका सांस्कृतिक प्रभुत्व उत्पादन की शक्तियों के अनुकूल न होने के कारण अनुचित एवं असह्य लगने लगा हो, उन्हें वे प्रतिक्रियावादी मानते थे। उनका कहना था कि लेखक प्रगतिशील हो या प्रतिक्रियावादी, साहित्यिक कृति में कोई न कोई विचारधारा अनिवार्यत: विद्यमान होती है।

            लेकिन अन्य कई मार्क्सवादी आलोचकों से भिन्न ग्रेवाल साहब प्रतिक्रियावादी तर्कों का खंडन करते समय यह सावधानी बरतना नहीं भूलते थे कि प्रतिक्रियावादी विचारधारा को अपनाने वाले लेखकों की रचनाओं में भी कुछ साहित्यिक गुण हो सकते हैं और प्रगतिशील विचारधारा को अपनाने वाले लेखकों की रचनाओं में भी कुछ दोष हो सकते हैं। उनका कहना था कि ‘साहित्यिक कृति के माध्यम से व्यक्त होने वाले किसी भी अनुभव में विचारधारा एक आधारभूत आयाम के रूप में विद्यमान होती है और रचना के मूल्यांकन में इस आयाम का महत्वपूर्ण स्थान होता है, किन्तु रचना में व्यक्त होने वाले अनुभव  को हमें उसकी समग्रता में देखना चाहिए और उसकी सार्थकता को केवल उसमें अंतर्निहित विचारधारा के स्वरूप के आधार पर ही नहीं आंकना चाहिए। एक ही प्रकार की विचारधारा के आधार पर ऐसी रचनाएं की जा सकती हैं जो बौद्धिक क्षमता, संवेदन-शक्ति और अभिव्यक्ति-माध्यम पर अधिकार की दृष्टि से एक-दूसरे से काफी भिन्न हों। इन रचनाओं का मूल्यांकन करते समय हमें इन सभी बातों की ओर ध्यान देना पड़ेगा।’

            ग्रेवाल साहब की अपनी समीक्षा-पद्धति को हम उनके निबंध ‘नए काव्य की सामाजिक आधारभूमि’ की इन पंक्तियों से समझ सकते हैं-‘किसी भी युग के काव्य को समझने के लिए यह अच्छा होता है कि  हम उसे उन सामाजिक परिस्थितियों में संबद्ध करके देखें, जिनमें यह लिखा गया है। जब कभी किसी समाज के मूल संगठन में, उसकी आर्थिक प्रणाली में तथा उस पर आधारित राजनीतिक व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं, तभी उस समाज में जीने वाले व्यक्तियों के दृष्टिकोण तथा उनकी भावभूमि में विशिष्ट परिवर्तन आ जाते हैं। अत: साहित्यिक परम्परा के बदलते हुए स्वरूपों को हम ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत समाज में होने वाले परिवर्तनों से संबद्ध करके ही ठीक तरह से समझ पाएंगे तथा किसी भी नई साहित्य-धारा का सही मूल्यांकन कर सकेंगे।’

            इसी निबंध में ग्रेवाल साहब ने सबसे अच्छा कवि उसे माना है, जो ‘निम्न-मध्यवर्गीय परिस्थितियां से जुड़ा होते हुए भी क्रांतिकारी परिवर्तन का साहस बटोर चुका है और पूर्णत: समाजवादी दृष्टिकोण को अपना चुका है। ऐसे  कवि की कृतियों में सामयिक जीवन की जटिल एवं द्वंद्वपूर्ण वास्तविकता का सही चित्रण होता है।

            प्रगतिशील और जनवादी साहित्य के आंदोलन का यह दौर कुछ ऐसा था कि उसमें शामिल हम सभी लेखक-आलोचक उस समय ‘सही राजनीति’ या ‘राजनीतिक रूप से सही’ होने पर बहुत जोर दिया करते थे। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर जल्द ही यह समझने लगा था कि जिसे हम ‘सही’ कहते हैं, वह वास्तव में या वस्तुपरक रूप से भी सही हो, यह आवश्यक नहीं है। अत: मैं ग्रेवाल साहब की बहुत-सी बातों से सहमत होते हुए भी उनकी ‘सही राजनीति’ या ‘राजनीतिक रूप से सही’ होने वाली बात से सहमत नहीं हो पाता था। इस मुद्दे पर उनसे अक्सर ही मेरी बहस हो जाती थे। मुझे ऐसा लगता था कि ग्रेवाल साहब साहित्य और साहित्यकारों की वास्तविकताओं से अधिक ध्यान उनके ‘सही’ या ‘गलत’ होने पर देते हैं। कई बार वे इस कोशिश में रचनाकारों को सही रचना तथा आलोचकों को सही आलोचना करना सिखाने वाले अध्यापक या उपदेशक भी नजर आने लगते थे। इसका कारण शायद यह था कि उस समय राजनीतिक रूप से सही होने का अर्थ सिर्फ  यह नहीं था कि आप प्रतिक्रियावादी खेमे के विरुद्ध प्रगतिशील खेमे में हैं। चूंकि प्रगतिशील खेमे में भी विभाजन था, इसलिए उसके भीतर भी राजनीतिक रूप से सही होना एक मुख्य सरोकार था। अत: ग्रेवाल साहब अक्सर सही रचना, सही आलोचना, सही मूल्यांकन, सही दृष्टिकोण, सही परिप्रेक्ष्य आदि की बात करते थे और जाने-अनजाने उस पर कुछ जरूरत से ज्यादा ही जोर देते थे।

            ग्रेवाल साहब यह मानते थे कि राजनीतिक रूप से सही साहित्य ही महान साहित्य हो सकता है। अत: वे साहित्य और राजनीति के तालमेल की जरूरत पर जोर देते थे और साहित्यकारों को सही राजनीतिक दल से जुड़ने की सलाह देते थे। उन्होंने लिखा था-‘हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें साहित्य और राजनीतिक दोनों के तालमेल की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, लेकिन इसके चलते दोनों क्षेत्रों की विशिष्टता को नहीं भूलना चाहिए। साहित्य के माध्यम से राजनीतिक कार्य कुछ हद तक तो किया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र की प्राथमिकताएं साहित्य के क्षेत्र की प्राथमिकताएं नहीं हो सकतीं। अत: आज जिस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है, वह यह है कि साहित्यकार साहित्य और राजनीति के अनिवार्य संबंध को समझें, सामाजिक परिवर्तन की राजनीतिक  गतिविधियों से अपनी साहित्यिक गतिविधियों का तालमेल बढ़ाएं, सही राजनीतिक दल से जुड़ने का प्रयास करें, जिससे सामाजिक यथार्थ की सही समझ विकसित करना उनके लिए अधिक संभव हो सके और वे जनजीवन और जनसंघर्षों के अपने अनुभवों को समृद्ध और व्यापक बना सकें तथा उनका सही और प्रभावशाली चित्रण करने में सक्षम हों।’

            अपनी इसी समझ के चलते वे मुझे पार्टी का सदस्य बनने के लिए प्रेरित किया करते थे। लेकिन मैं उनसे कहता था – आप शायद यह समझते हैं कि ‘सही राजनीतिक दल’ से जुड़ना प्रत्येक लेखक के लिए संभव है और यह एक आसान-सी प्रक्रिया है, जो लेखक की परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि मुख्यत: उसकी अपनी इच्छा शक्ति या विवेक-चेतना पर निर्भर करती है। आप यह नहीं देखते कि आज अच्छे साहित्य और सही राजनीति की हालत कितनी खराब है। मसलन, आज एक लेखक को जीवित रहने के लिए लेखन से इतर क्या-क्या करना पड़ता है? अपने साहित्य को पाठों तक पहुंचाने के लिए उसे संपादकों, प्रकाशकों और साहित्य संबंधी अन्य संस्थाओं की  कैसी राजनीति का शिकार होना पड़ता है? पारिश्रमिक, प्रतिष्ठा, पुरस्कार आदि पाने के जो तरीके प्रचलित हैं, उनमें से किनको अपनाने के लिए लेखक बाध्य है और किनको न अपनाने के लिए स्वतंत्र? राजनीतिक दलों को साहित्यकारों की कितनी जरूरत है और साहित्यकारों के लिए साहित्य और राजनीति में एक साथ सक्रिय रह पाना संभव भी है या नहीं?

            ऐसे अनेक प्रश्न थे, जिन पर ग्रेवाल साहब से मेरी बहस होती थी। मैं उनसे कहा करता था-‘आप साहित्यकारों को सही राजनीतिक दल से जुड़ने की सलाह देते समय इसमें आ सकने वाली वास्तविक कठिनाइयों पर विचार नहीं करते। उदाहरण के लिए, जहां मार्क्सवाद या समाजवाद से अपना संबंध जोड़ने वाले कई दल हों और वे सभी अपने-आपको सही-बल्कि सबसे सही-दल मानते हों, वहां साहित्यकार निश्चयपूर्वक यह कैसे जान सकता है कि वह जिस दल से जुड़ रहा है, वही वास्तव में सही राजनीतिक दल है? क्या वह किसी दल से जुड़ने से पहले सभी राजनीतिक दलों का तुलनात्मक अध्ययन करे और तमाम गलत दलों को छोड़ कर एक सही दल से जुड़े? या वह ‘ट्रायल एंड एरर’ की प्रक्रिया अपनाए और अपने अनुभवों के आधार पर सभी गलत दलों को छोड़ता हुआ एक सही दल से जुड़े? लेकिन क्या वास्तविक जीवन में कहीें ऐसा होता है? कोई व्यक्ति किस दल से जुड़ता है, यह आमतौर पर सर्वथा आकस्मिक और सांयोगिक होता है। अकस्मात् किसी संयोग से कोई ऐसा शिक्षक, सहपाठी, मित्र, संबंधी, नेता या कार्यकत्र्ता मिल जाता है, जो साहित्यकार को अपने दल के निकट ले जाता है और साहित्यकार उसी दल को सही मानकर उससे जुड़ जाता है।

            ग्रेवाल साहब कहते-‘जो साहित्यकार इतना भोला है कि सही और गलत राजनीति का फर्क नहीं समझता और किसी के कहने पर किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ जाता है, क्या उसे सचेत साहित्यकार कहा जा सकता है?

            बहस लंबी खिंचती देख मैं कुछ-कुछ हास्य-व्यंग्य के लहजे में कहता-‘ग्रेवाल साहब, ज्यादातर मामलों में तो राजनीतिक दल के लोगों का संबंध शादी, नौकरी या जात-बिरादरी का-सा होता है। पत्नी से नहीं निभती, फिर भी उसे तलाक नहीं दे पाते। नौकरी में दम घुटता है, फिर उसे छोड़ नहीं पाते। जात-बिरादरी की बहुत-सी बातें गलत लगती हैं, फिर भी उन्हें यह सोच कर बर्दाश्त करते रहते हैं कि इससे निकले या निकाले गए, तो कहां जाएंगे।

            मेरी ऐसी बातों पर ग्रेवाल साहब हंस पड़ते, मानो कहे बिना ही कह रहे हों-‘आप नहीं सुधरेंगे।’

            इस तरह हमारी बहस कभी कटुता या मनमुटाव तक नहीं पहुंचती थी। अंतत: हम असहमत रहने के लिए सहमत हो जाते थे और कोई दूसरी बातें करने लगते थे। उनसे बात करने पर मुझे लगता था कि मैं बौद्धिक और वैचारिक रूप से नहीं, बल्कि मानवीय और भावनात्मक रूप से भी पहले से ज्यादा समृद्ध हो गया हूं। मुझे लगता था कि हर मार्क्सवादी को उन जैसा ही होना चाहिए।

            मेरी कहानियों पर उन्होंने कई बार लिखा, प्रशंसा भी की, लेकिन ‘सही राजनीतिक दल’ से जुड़े होने के उनके प्रतिमान पर खरा न उतरने के कारण भरपूर प्रशंसा के बावजूद उनकी समीक्षा में ‘मगर’ कहीं न कहीं जरूर आ जाता था। एक बार जब हम जनवादी कहानी पर बात कर रहे थे, मतभेद के कई मुद्दे हमारी बातों के बीच उभरे। मैंने कहा-‘बेहतर हो कि आप कहानी-समीक्षा पर एक पूरी पुस्तक लिखें और उसमें अपने इन विचारों को विस्तार से लिखित रूप दें।’ लेकिन वे अन्य कामों में इतने व्यस्त और प्रकाशन के प्रति इतने उदासीन रहते थे कि यह काम हो नहीं पाया। जुलाई, 1991 में वे इस बात पर सहमत हुए कि मैं उन्हें पत्र लिखूं और वे उत्तर दें और इस प्रकार धीरे-धीरे एक पुस्तक तैयार हो जाये। हम दोनों का यह पत्राचार अगस्त, 1991 से अक्तबूर, 1991 तक चला, लेकिन आगे जारी न रह सका। (उस पत्राचार के दो प्रारंभिक पत्र उन्हें याद करते हुए मैंने ‘कथन’ के पचासवें अंक में प्रकाशित किए हैं।) वे फिर कभी उस सिलसिले को आगे नहीं बढ़ा पाये और 24 जनवरी, 2006 की रात को तो हमारी बहस हमेशा के लिए अधूरी रह गई।

            उनकी बीमारी के दौरान मैं उनके घर कुरुक्षेत्र फोन करके उनके परिवार से या पत्र लिखकर वहां के मित्रों से उनका हाल पूछता रहता था। उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले, वहां से निकलने वाली जलेस की पत्रिका ‘जतन’ के सम्पादक रविन्द्र गासो ने मुझे लिखा था-‘डा. ग्रेवाल जी के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा है-विवश हैं हम। ‘बता दो, क्या बता दें?’ यही दोहराते रहते हैं। कमजोर हो गए हैं बहुत। मस्तिष्क काम नहीं कर रहा। पहचान लेते  हैं, सुनते हैं, लेकिन जो कहना चाहते हैं, उसे रूप नहीं दे पाते। इतने बड़े आदमी को बीमारी के आगे विवश देखा नहीं जाता। इलाज में कोई कमी नहीं, लेकिन सुधार की किरण भी दिखाई नहीं देती। राष्ट्रीय स्तर पर तो है नहीं, हम कुरुक्षेत्र वालों को तो जो नुक्सान हुआ है, हम ही जानते हैं।

            मैंने लिखा नहीं, लेकिन लिखना चाहता था-‘मेरा, ‘कथन’ का और हमारे परिवार का जो नुक्सान हुआ है, उसे कौन जानता है!’

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