धर्मवीर सिंह – गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं आरक्षण

बीच बहस में


डीएसपी ऑफिस से निकलते ही उस सिपाही के चेहरे पर गुस्से और हिकारत का भाव था। गेट पर खड़े उसके साथी संतरी ने पूछा कि छुट्टी मंजूर हो गई क्या? गुस्से से तमतमाए सिपाही ने अपनी परंपरागत नफरत के साथ कहा, साले चमार ने मना कर दिया। करीब 22 साल पहले का जींद जिले के नरवाना उपमंड़ल में डीएसपी कार्यालय के बाहर दो पुलिसकर्मियों के बीच का यह संवाद आज भी मेरे जहन में उसी कदर ताजा है, मानो कल की ही बात हो। मेरे बड़़े भाई उन दिनों नरवाना सिटी थाने में तैनात थे। मैं अपनी पढ़ाई का खर्च लेने अक्सर उनके थाने चला जाता था। थाने के साथ ही डीएसपी कार्यालय था, जहां सुखदेव सिंह नाम के अफसर उन दिनों डीएसपी नरवाना के पद पर तैनात थे। लेकिन उनके मातहत तथाकथित सवर्ण मुलाजिमों के लिए शायद वे डीएसपी से पहले एक चमार थे। यह मैं नहीं, उन दो कर्मचारियों के बीच का वह संवाद बता रहा था। शायद पुलिस में इतने बड़े ओहदे पर पहुंचकर भी उनकी निम्न जाति ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। मेरा सुखदेव सिंह से कोई निजी वास्ता कभी नहीं रहा। लेकिन सोचता हूं कि अगर वे महकमें में डीएसपी के बजाय कोई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी होते तो उनकी क्या दुर्गति होती। अपना आला अफसर होते हुए भी जो अदना से जवान उन्हें हिकारत से साला कह कर गरिया रहे थे, तब उनका रवैया कितना तिरस्कृत होता। इसी रवैये से मौजूदा व्यवस्था में आरक्षण के औचित्य व उसकी अनिवार्यता का सवाल उठता है।

अगर आरक्षण नहीं होता, तो क्या सदियों से जातीय उत्पीड़ऩ का संताप झेल रहे करोड़़ों दलित व पिछड़़ों को इस व्यवस्था में निर्णय लेने व उनको लागू करवाने वाली व्यवस्था में कोई भागीदारी मिल पाती। आरक्षण लागू होने के सत्तर साल बाद भी देशभर में आरक्षित जातियों विशेषकर दलितों के साथ होने वाला भेदभाव व उत्पीड़ऩ इसका जवाब है। इस तरह से कहा जा सकता है कि आरक्षण दलित व पिछड़़ों को मिला हुआ नागरिकता का अधिकार है। बिना आरक्षण दलित-पिछड़ों को वे बुनियादी अधिकार भी हासिल नहीं थे जो एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिकों को मिलने चालिए। इसमें सबसे बड़़ा अधिकार समानता का अधिकार है। इसमें भी सबसे अहम है सामाजिक समानता का अधिकार।

यही कारण है कि आरक्षण का विश्लेषण आरक्षण का लाभ लेने वालों की आर्थिक संपन्नता से आंकने की बजाय उनको मिले सम्मान से आंकना चाहिए। क्या आरक्षित जातियों को आरक्षण लागू होने के इतने सालों बाद भी वह सम्मान मिल पाया है जो सामान्य जातियों के लोगों को हासिल है। अगर इसका जवाब हां में है, तो आज ही आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है। दलित उत्पीड़न की घटनाएं रोज बयान कर रही है कि जाति के आधार पर होने वाला उत्पीड़ऩ ही दलितों के उत्पीड़ऩ की मुख्य वजह है। यानी सामाजिक तौर पर अभी भी आरक्षित जातियों के नागरिकों को दोयम दर्जा ही हासिल है। इसलिए बाकी जातियों की तरह दलित-पिछड़़ों को भी समान नागरिक अधिकार हासिल होने तक आरक्षण जरूरी है। यही आरक्षण की उपलब्धि होगी।

आरक्षण किसी भी रूप में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का हिस्सा नहींहै। आरक्षण का मुख्य मकसद सदियों से वंचित समुदायों को शासन प्रशासन में हिस्सेदारी देकर उन्हें राष्ट्र का अभिन्न अंग होने का एहसास दिलाना है। इसलिए आरक्षण की आर्थिक आधार के बजाय सामाजिक या जातीय आधार पर वकालत की जाती है। डा.आंबेडकर ने कहा था कि हम तब तक एक राष्ट्र नहीं बन जाते जब तक कि हमारे दुख-सुख सांझा नहीं बन जाते।

नि:संदेह आजादी के सत्तर साल बाद भी एक लोकतांत्रिक देश में आरक्षण जैसी व्यवस्था शर्मनाक है। यह शर्मनाक इसलिए है क्योंकि अभी भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा सामाजिक तौर पर इतना तिरस्कृत है कि उसे आरक्षण का सहारा देकर मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। सत्तर सालों तक चुनी गई सरकारें व समाज सुधार का ढिंढोरा पीटने वाले संगठन आबादी के इतने बड़़े हिस्से को इतनी सामाजिक समानता भी नहीं दिला पाए कि उन्हें आरक्षण की जरूरत न रहे। आरक्षण सामाजिक न्याय का उपकरण है। जहां-जहां भी इस उपकरण को सही तरीके से इस्तेमाल किया गया है, वहां सामाजिक न्याय कायम हुआ है। आरक्षित जातियों के सामाजिक स्तर में सुधार हुआ है। उनमें शिक्षा व रोजगार को लेकर एक ललक पैदा हुई है। स्वाभाविक है कि एक शिक्षित व रोजगारशुदा व्यक्ति सामाजिक उत्पीड़न व भेदभाव को भी बर्दाश्त नहीं करेगा। आरक्षण ने जो सबसे अहम काम किया है वह इन वर्गों में सपने देखने की शक्ति पैदा की है। एक स्वतंत्र व भेदभाव रहित जीवन जीने का सपना। 

सम्पर्कः 9253681039

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