अकेला ख़ुद को समझ कर मैं घर से निकला था- आबिद आलमी

ग़ज़ल

अकेला ख़ुद को समझ कर मैं घर से निकला था
क़दम-क़दम पे मगर क़ाफ़िलों का साथ मिला

हमारे शहर के दस्तूर का कमाल है ये
न इस में हंसना रवा है न इस में रोना रवा

हम अपने कंधों पे ही अपने घर उठाये फिरे
कहीं भी बस्ती बसाने का हौसला न हुआ

हमारे साथ रही और हमारी हो न सकी
कि जि़ंदगी पे किसी संगदिल का क़ब्ज़ा था

सुलग रहा है अभी एक-इक पहाड़ का दिल
अभी सफ़र में रहेगा य’ आग का दरिया

तमाम शहर ही जब तुम से हो गया बरहम
तो फिर ये किस को सुनाते हो अपना बावैला

ये कह के रोक लिया उस ने मोड़ पर हम को
अभी तो कल का लहू ही नहीं ठिकाने लगा

वो आग बरसी कि बस राख रह गई ‘आबिद’
फिर इस के बाद चली ख़ूब ठंडी-ठंडी हवा

क़ाफ़िलों : यात्री-दलों, रवा : उचित, संगदिल : पत्थर-दिल, संवेदनहीन, बरहम : रुष्ट, बेसरोकार, बावैला : विलाप, शोर-गुल

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Author: आबिद आलमी

परिचय आबिद आलमी का पूरा नाम रामनाथ चसवाल था। वो आबिद आलमी नाम से शायरी करते थे। उनका जन्म गांव ददवाल, तहसील गुजरखान, जिला रावलपिंडी पंजाब (पाकिस्तान) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी भाषा साहित्य से एम.ए. किया। वो अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और उर्दू में शायरी करते थे। उन्होंने हरियाणा के भिवानी, महेंद्रगढ़, रोहतक, गुडग़ांव आदि राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन किया। वो हरियाणा जनवादी सांस्कृतिक मंच के संस्थापक पदाधिकारी थे। उनकी प्रकाशित पुस्तकें दायरा 1971, नए जाविए 1990 तथा हर्फे आख़िर (अप्रकाशित) आबिद आलमी की शायरी की कुल्लियात (रचनावली) के प्रकाशन में प्रदीप कासनी के अदबी काम को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने आबिद की तीसरी किताब हर्फ़े आख़िर की बिखरी हुई ग़ज़लों और नज़्मों को इकट्ठा किया। ‘अल्फ़ाज़’ शीर्षक से रचनावली 1997 और दूसरा संस्करण 2017 में प्रकाशित। आबिद आलमी जीवन के आख़िरी सालों में बहुत बीमार रहे। बीमारी के दौरान भी उन्होंने बहुत सारी ग़ज़लें लिखीं।

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