क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा- आबिद आलमी

ग़ज़ल

क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा,
सारे दरया को पी गया सहरा।

लोग पगडंडियों में खोए रहे,
मुझ को रस्ते दिखा गया सहरा।

धूप ने क्या किया सलूक उससे,
जैसे धरती पे बोझ था सहरा।

बढ़ती आती थी मौज दरया की,
मैंने घर में बुला लिया सहरा।

जाने किस शख़्स का मुकद्दर है,
धूप में तपता बे-सदा सहरा।

खो के अपना वजूद अँधेरे में,
रात कितना उदास था सहरा।

ज़हन की वादियाँ उठाए फिरें,
आँख में आ के बस गया सहरा।

मेरे कदमों को चूमने के लिए,
रस्ते-रस्ते से जा मिला सहरा।

मैं समन्दर को घर में ले आता,
मेरे दर पे पड़ा रहा सहरा।

मेरा इस में बिखरना था ‘आबिद’,
फिर मुझे ढूंढता फिरा सहरा।

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Author: आबिद आलमी

परिचय आबिद आलमी का पूरा नाम रामनाथ चसवाल था। वो आबिद आलमी नाम से शायरी करते थे। उनका जन्म गांव ददवाल, तहसील गुजरखान, जिला रावलपिंडी पंजाब (पाकिस्तान) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी भाषा साहित्य से एम.ए. किया। वो अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और उर्दू में शायरी करते थे। उन्होंने हरियाणा के भिवानी, महेंद्रगढ़, रोहतक, गुडग़ांव आदि राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन किया। वो हरियाणा जनवादी सांस्कृतिक मंच के संस्थापक पदाधिकारी थे। उनकी प्रकाशित पुस्तकें दायरा 1971, नए जाविए 1990 तथा हर्फे आख़िर (अप्रकाशित) आबिद आलमी की शायरी की कुल्लियात (रचनावली) के प्रकाशन में प्रदीप कासनी के अदबी काम को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने आबिद की तीसरी किताब हर्फ़े आख़िर की बिखरी हुई ग़ज़लों और नज़्मों को इकट्ठा किया। ‘अल्फ़ाज़’ शीर्षक से रचनावली 1997 और दूसरा संस्करण 2017 में प्रकाशित। आबिद आलमी जीवन के आख़िरी सालों में बहुत बीमार रहे। बीमारी के दौरान भी उन्होंने बहुत सारी ग़ज़लें लिखीं।

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