पं. कृष्ण चन्द

पंडित कृष्ण चन्द

रोहतक जिले के सिसाना गांव में 22 जुलाई, 1922 को साधारण किसान परिवार में जन्म। 10वीं तक औपचारिक शिक्षा। 1940 में फौज में भरती।
बाद में दिल्ली पुलिस में सेवा दी।

1

जिले रोहतक मैं बसर्या सै वो गढ़ी गाम कड़े तैं ल्याऊं
सच्चा रहबर इस जनता का छोटूराम कड़े तैं ल्याऊं
 
थे मेळ मुल्हाजे आपस मैं इसा महर मळोटा दिखै था
मिलकै काम कर्या करते सब भरम भरोटा दिखै था
जो दीदे काढ़ै ठाडा बणकै ना माणस खोटा दिखै था
वो सबका सेवक और सबका प्यारा सबतैं छोटा दिखै था
मेरी आत्मा सीळी हो इसा प्यारा नाम कड़े तैं ल्याऊं
 
ये कला बाज हठधर्मी सैं मेळ मिलारे जनता पै
झूठ कपट छळ बेइमानी की बेल फलारे जनता पै
एक सीट के लालच खातर सेल चलारे जनता पै
लूट लूट धन कठ्ठा कर लिया खेल खिलारे जनता पै
करै खात्मा गुंड्यां का इसा छत्री जाम कड़े तैं ल्याऊं
 
कदे वो उसकी कदे वो उसकी यो दुत्तां केसा रोळा सै
कठ्ठे होरे यें लाख कुमसल यो पुत्तां केसा टोळा सै
कोए जात जमात नहीं इनके यो ऊत्तां केसा टोळा सै
लेकै माल घरां म्हं बडग़े यो भुत्तां केसा टोळा सै
न्यूं मुंधा पड़ पड़ रोऊं सूं भला उसके काम कड़े तैं ल्याऊं
 
मूरख माणस इस दुनिया म्हं बोई जामी के जाणै
ऊंच नीच की बातां नै भई नमक हरामी के जाणै
इज्जत और बेइज्जती नै यो कृपण कामी के जाणै
स्याल बड़े रहैं बिल म्हं पर यो शेर गुलामी के जाणै
कहै कृष्ण चन्द सुसाणे केसा रमणीक धाम कड़े तैं ल्याऊं

2

वजह बता द्यूं आज म्हारा क्यूं हिन्दुस्तान दुखी सै
मिलता ना इन्साफ  आड़ै मजदूर किसान दुखी सै
 
हड्डी पसळी पीस दई यें कूट कूट कै खागे
ना छोड्या मांस कसाईयां नै यें चूट चूट कै खागे
बढऱे पेट ढोल केसे यें ऊठ ऊठ कै खागे
म्हारी कमाई लहू पसे की यें लूट लूट कै खागे
ना पेट में रोटी ना तन पै कपड़ा एक टूटी छान दुखी सै
 
यें कल्बां मैं ऐश करैं सैं डालमियां और टाटा
पड्य़ा भुखा मील कर्मचारी ना दो रोटी का आटा
सब क्यांहे पै काबिज होगे यें इरला बिरला बाटा
जब देणी आवै मजदूरी तै यें तुरत दिखादें घाटा
काम करणिया इस भारत मैं बहुत महान दुखी सै
 
कोए ऐडी रगड़ रगड़ कै मरग्या बाहर पडय़ा पाळे मैं
कोए पत्थरां कै नीचै दबग्या कोए डूब गया नाळे मैं
आंख फूटगी अन्धा होग्या कोए धूम्मे काळे मैं
फिर भी रोटी ना थ्याई कुछ कसर नहीं चाळे मैं
कमा कमा घर भर दिया फिर भी बेअनुमान दुखी सै
 
दई बिठा रुखाळी बिल्ली जड़ मैं यो दूध उघाड़ा धरकै
जब बाड़ खेत नै खाण लगै तै के जहाज चलैंगे भरकै
पाप के बेड़े भवसागर से पार लगै ना तिरकै
ना सुख पाया दुनियां म्हं कोए बुरा गरीब का करकै
कृष्ण चन्द कहै इस दुनिया म्हं न्यों नादान दुखी सै

3

के सुपने का जिकर बात एक याद जरूरी आगी
पुलिस लाईन मैं पड़े पड़े कै याद अंगूरी आगी
 
सुपने मैं सुसराड़ डिगरग्या मन मैं आन्नद छाया
ताता पानी करवा कै मैं बैठ पाटड़ै न्हाया
फेर छोटा साळा न्यूं बोल्या आ जीजा रोटी खाया
मेरी सासु नै बना रसोई मैं जड़ मैं बैठ जिमाया
जणु थाळी कै म्हां मेरे खाण नै हल्वा पूरी आगी
 
फेर जीजा तैं बतळावण खातिर कठ्ठी होगी साळी
कोए गोरी कोई श्याम वर्ण कोई भूरी कोई काळी
मीठी मीठी बात करैं थी करकै अदा निराळी
घूर घूर कै देखैं थी वे कर कर नजर कुढ़ाळी
रुकमण चन्द्रो और शान्ति झट कस्तूरी आगी
 
एक जणी नै दई नमस्ते दूजी नै प्रणाम
मटक मटक इतरावैं थी वें करकै जिगर मुलाम
मन का भेद बतादे जीजा खोल कै तमाम
फेर हाथ जोड़ कै न्यों बोली कोए म्हारे लायक काम
हो बोल पड़ै नै घरसी के के इसी गरुरी आगी
 
सुपने कै म्हां तरह तरह के देगे ठाठ दिखाई
साळे साळी कठ्ठे होरे ठोळे की लोग लुगाई
आंख खुली जब बैठा होग्या कुछ ना दिया दिखाई
चौगरदें नै लड़धू सोवैं वाहे लाईन पाई
कृष्ण चन्द नै सेवा करकै शर्म हजूरी आगी

4

तनै जिसके ना पै धन लुटवा दिये छोड़ अमीरी ठाठ पिता
वो कृष्ण छलिया सुण्या मनै तूं किसकी देखै बाट पिता
 
गोकुल गढ़ मैं नन्द बाबा कै जाकै गऊ चराई
माखन मिश्री दही खोस कै घर घर मांह तै खाई
सतभामा कालन्दी कृष्णा छल से सुभदरा ब्याही
छल से रुकमण हरी जिनै वा भीम सेन की जाई
रुकमण मार कै लई बुराई कुणसी घाली घाट पिता
 
एक श्रामपन्त मणी की खातिर धर्म कर्म सब हार दिया
मथुरा के म्हां कंस सुण्या खुद मामा का सिर तार दिया
पीठ दिखा कै भाज्या रण तैं बिल्कुल कर लाचार दिया
फेर ब्राहम्ण बण कै गए मघद मैं सारा मान बिसार दिया
धोखा दे कै मार दिया वो जरासिन्ध सम्राट पिता
 
धर्म युधिष्ठर झूठ बोल कै खो सारा विश्वास गया
दुर्योधन तै दगा करी जब गान्धारी के पास गया
धोखा देकै कर्ण मार दिया मिल अर्जुन नै सांस गया
ठारा अक्षोणी दल खपगे इस भारत का रंग रास गया
छत्री कुल का नाश गया मच्या चोगरदे कै करळाट पिता
 
कहै कृष्ण चन्द सिसाने आळा तनै धूप गिणी ना छाया
इस कृष्ण के छळ म्हं आकै लुटवा दी धन माया
सुध बुध भूल गया इस तन की और ना काबू मैं काया
जो गैर के बदले सिर देदे इसा कोण जगत मैं पाया
वो ब्राहम्ण बनकै घर पै आया सुकी देगा डाट पिता

5

बोस इसी साड़ी ल्याईये कष्ट दूर हो सारा
 
बनी हुई साड़ी देवर शुद्ध खादी भण्डार की
तीन रंग चाहिए जिसमैं शोभा हो बहार की
बीच मैं तसवीर छपै गान्धी और जवाहर की
लक्ष्मीबाई का फोटू हो नक्शा सारे जंग का
देख कै नै ल्याइये बोस फैसन नए ढंग का
एक कोणे पै फोटू हो उस वीर भगत सिंह का
बढिय़ा रंग का छपा हुया हो यो जै हिन्द का नारा
 
लाजपत राय का फोटू हो उस शेरे पंजाब का
बी के दत का फोटू देवर चाहिए पूरी आब का
चौगरदे कै लिख्या हुआ नारा इन्कलाब का
छापा और चतेरा देवर चाहिए अलग डिजान का
बीच कै म्हां खिंच्या हुआ नक्शा हिन्दुस्तान का
लहराता हो तिरंगा झण्डा आजादी की शान का
उधम सिंह बलवान का फोटू जिसनै डायर मारा
 
राजगुरु सुखदेव का फोटू दोनों न्यारे न्यारे हों
राजेन्द्र पटेल टण्डन खड़े हुए यें सारे हों
हाथ के म्हां झण्डा लिए शरत चन्द्र प्यारे हों
एक तरफ  नै फोटू तेरा हाथ मैं तलवार हो
टैंक हवाई जहाज तोप मोटर आर्मड कार हो
खून खून और खून चलो दिल्ली की पुकार हो
मैं साड़ी बान्धूं एक बार हो जब सौराज हमारा
 
सारे दिल्ली का चित्र हो लाल किले की याद का
लहराता हो तिरंगा झण्डा हिन्द देश आजाद का
आगरे झांसी का फोटू माहें इलाहबाद का
सिंघापुर का फोटू हो और आई एन ए तमाम का
सहगल ढिल्लों शाहनवाज फोटू उनके नाम का
मेहर सिंह का फोटू हो साथ बरोने धाम का
सकल ससाणे गाम का फोटू मांहे कृष्ण चन्द बिचारा

6

आज सखी म्हारे बाग मैं हे किसी छाई अजब बहार
हे ये हंस पखेरु आ रहे
 
जैसे अम्बर मैं तारे खिलैं, ये पंख फैलाए ऐसे चलैं
जैसे नीचे को पानी ढळै हे मिलैं कर आपस मैं प्यार
हे मेरे बहुत घणे मन भा रहे
 
बड़ी प्यारी सुरत हे इसी, जैसे अम्बर लगते किसी
मेरै मोहनी मूरत मन बसी, किसी शोभा हुई गुलजार
हे दिल आपस मैं बहला रहे
 
कदे बैठैं हरियल डाल पै, मैं व्याकुल इनके हाल पै
ये मायल जल की झाल पै गई बैठ ताल पै डार
हे कुछ आवैं कुछ जा रहे
 
सब मन की चिन्ता त्याग कै, फेर सब सखियां नै लाग कै
वही हंस पकड़ लिया भाग कै, इस राग कै बस संसार
हे कथा कृष्ण चन्द भी गा रहे
 
 
 
 
 

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