हरियाणा में स्कूली शिक्षा की बिगड़ती स्थिति – नरेश कुमार

हरियाणा में स्कूली शिक्षा की तस्वीर आए दिन लगातार धुंधली होती जा रही है। हाल ही में राज्य सरकार ने प्रदेश में 25 हजार नए शिक्षकों की नियुक्ति का ऐलान किया है। पिछले दिनों से नए शिक्षकों की भर्ती के लिए आ रही नए-नए नियमों की खबरें असमंजस की स्थिति में ही बढ़ोतरी कर रही है। इन शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया के लिए निर्धारित मापदंडों में किए जा रहे बार-बार बदलावों के चलते शिक्षा से सरोकार रखने वाला बड़ा हिस्सा इस प्रक्रिया को संदेह की दृष्टि से देख रहा है। नए शिक्षकों को कभी नियमित तो कभी अनुबंध आधार पर नियुक्त करने की जानकारियां मिल रही हैं। राज्य सरकार प्रदेश की स्कूली शिक्षा की स्थिति को समग्र तौर पर समझने की बजाए नए-नए फार्मूलों को आजमाने की दिशा में नए प्रयोग करने में जुटी है। शिक्षा से जुड़े तमाम संबंधित पक्षों से गहन विचार-विमर्श के अभाव में किए जा रहे इस प्रकार के प्रयोग पूरे स्कूली शिक्षा के परिदृश्य को देखने-समझने की राज्य सरकार की अदूरदर्शिता को ही सामने लाते हैं।

उल्लेखनीय है कि हरियाणा में 15 हजार के आसपास अतिथि अध्यापक कार्यरत हैं जिन्हें एकमुश्त वेतन मिलता है। इन शिक्षकों की भर्ती करते समय आरक्षित नियमों की अवहेलना सहित बड़े पैमाने पर खामियां उजागर हुई थी। अतिथि अध्यापकों ने अपनी नौकरी को नियमित कराने के लिए कई बार आंदोलन चलाए , जिसमें एक युवा अतिथि शिक्षिका की रोहतक में पुलिस फायरिंग में मौत भी हुई। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में केस हारने के बाद हजारों अतिथि अध्यापकों की रोजी-रोटी पर अभी भी अनिश्चितता की तलवार लटक रही है। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू हरियाणा में शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर चुके लगभग सवा लाख बेरोजगार शिक्षकों के भविष्य से जुड़ा है। शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा आनन-फानन में लिए जा रहे फैसलों से अतिथि अध्यापकों और पात्रता उत्तीर्ण शिक्षकों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। राज्य शिक्षक पात्रता परीक्षा पास बेरोजगार शिक्षकों को अतिथि अध्यापक उनकी नियुक्ति में अवरोध नजर आ रहे हैं।

राज्य में बड़ी तादाद में शिक्षक पात्र परीक्षा पास कर चुके बेरोजगार युवक-युवतियां रिक्त पड़े पदों पर नियमित भर्ती की बेसब्री से इंतजार में हैं। हाल ही में राज्य सरकार की ओर से नए शिक्षकों की भर्ती के लिए नए दिशा-निर्देश सामने आएं हैं। इन नियमों के अनुसार नए भर्ती किए जाने वाले 25 हजार शिक्षक अनुबंध आधार पर नियुक्त किए जाएंगे। इस प्रकार 5 वर्ष के किए भर्ती किए गए अध्यापक पक्के नहीं माने जाएंगे। इन अध्यापकों को केवल बेसिक पे , ग्रेड पे और वार्षिक वेतन वृद्धि का भुगतान किया जाएगा। इसके साथ-साथ अनुबंध आधार पर नियुक्त किए गए इन अध्यापकों का वार्षिक आधार पर मूल्यांकन भी किया जाएगा। यह भी हो सकता है कि जो अध्यापक वार्षिक मूल्यांकन परीक्षा में सफल न हो पाएं और उन्हें वापिस घर की ओर लौटना पड़े। यानि कि लगातार 5 वर्ष तक इन शिक्षकों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छाए रहेंगे। अनुबंधित शिक्षकों को अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष अफसरशाही के दरवाजों से गुजरने की प्रकिया अनेक भ्रष्टाचार के नए स्त्रोतों को फलने-फूलने के मौके उपलब्ध करा सकती है।

इसी प्रकार राज्य सरकार वरिष्ठ एवम् योग्यता के आधार पर पदोन्नति पाने की इन्तजार में बैठे शिक्षकों के लिए भी अध्यापक पात्रता परीक्षा पास करने का प्रावधान भी लाई है। हाल ही में राज्य सरकार ने भविष्य में नौकरी पाने वाली महिला उम्मीदवारों को 3 महीने की गर्भवती होने की स्थिति में उन्हें अयोग्य माने जाने के नियम को किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। स्कूली शिक्षा के मौजूदा हालात को बदलने के समग्र संबोधन की बजाए दिशाहीनता की ओर धकेला जा रहा है।

प्रदेश के शिक्षा विभाग द्वारा पिछले दिनों स्कूलों में स्थापित किए गए एजुसेट जैसे भारी-भरकम बजट वाले प्रोजेक्ट आज किस हालत में हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। इसके अलावा निजी कम्प्यूटर कम्पनियों को प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने के लिए अनुबंधित किया गया। इन कम्प्यूटर कम्पनियों को दिए जा रहे बजट के अनुरूप स्कूली बच्चे कम्प्यूटर की कितनी जानकारियां हासिल कर पा रहे हैं,इसका मूल्यांकन भी किए जाने की जरूरत है। एजुसेट शिक्षा पर खर्च किया गया करोड़ों का बजट शुरू करने से पहले इस माडल के व्यवहारिक पक्षों पर शिक्षाविदों, अभिभावकों, शिक्षक संगठनों व शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों से व्यापक विमर्श नहीं हुआ और अफसरशाही के कटे-फटे परिप्रेक्ष्य के आग्रहों के चलते यह प्रोजेक्ट बंद होने के कगार पर है।

राज्य में शिक्षा का बाजार बेरोक-टोक फल-फूल रहा है। निजी स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थाओं की व्यापारिक पूंजी की वृद्धि दर में निरन्तर बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। निजी शिक्षण संस्थाओं द्वारा जनता से महंगी फीसों के रूप में एकत्रित की गई पूंजी का आकार बढ़ता ही जा रहा है। शिक्षा के व्यापार से अर्जित अकूत पूंजी से निजी शिक्षण संस्थाओं के वातानुकूलित भव्य भवनों में सम्पन्न परिवारों के विद्यार्थी ही प्रवेश कर पा रहे हैं। निजी स्कूलों की मनमानी पर राज्य सरकार का नियंत्रण ढ़ीला होता जा रहा है और सार्वजनिक स्कूली शिक्षा के आधारभूत ढांचों में बुनियादी सुविधाओं का अभी भी अभाव बना हुआ है। बहुमत कामकाजी आबादी के पास महंगाई के इस दौर में अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने का ही सामथ्र्य बचा है।

शिक्षा के अधिकार के तहत आर्थिक रूप से कमजोर हिस्सों के लिए आरक्षित सीटों पर दाखिले के लिए निजी स्कूल संचालक आनाकानी कर रहे हैं। इस अधिकार को जमीनी स्तर पर लागू करवाने के लिए सघन जनभागीदारी का सुनिश्चित किया जाना महत्वपूर्ण पक्ष है। स्कूली शिक्षा की दयनीय होती जा रही स्थिति के लिए एक ओर जहां राज्य सरकार की उदारीकरण-निजीकरण की नीतियां जिम्मेदार हैं वहीं दूसरी ओर उच्च पदों पर आसीन अफसरशाही का इस दिशा में चलताऊ रूख भी एक सीमा तक जिम्मेदार है।

प्रदेश में स्कूली शिक्षा की स्थिति को सुधारने और गुणवत्तापरक बनाने की दिशा में गंभीर पहलकदमियां किए जाने की जरूरत है। जन भागीदारी को सुनिश्चित किए जाने के साथ-साथ स्कूली शिक्षा का समयबद्ध मूल्यांकन किए जाने जैसे महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। नई भर्ती के लिए अपनाई जाने वाली पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।

नरेश कुमार, 1017, सेक्टर-3, रोहतक,  मोबाइल – 09416267986

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