खाप पंचायत – वर्तमान स्वरूप – डी.आर. चौधरी

एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर साल सम्मान के नाम पर लगभग एक हतार हत्याएं होती हैं । इसमें 900 हत्याएं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, देहात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती हैं । इस कुकृत्य में हरियाणा सबसे आगे है । पिछले कुछ महीनों में तो इस छोटे से प्रदेश में ऐसी हत्याओं की बाढ़ सी आ गई है । पिछले विधान सभा चुनाव में शासक पार्टी के प्रचाार का मुख्य नारा था, ‘नम्बर वन हरियाणा’ । कमसे कम ऐसी हत्याओं के क्षेत्र में तो हरियाणा ने बाजी मार ली है और ‘नम्बर वर हरियाणा’ बनने का खिताब हासिल कर सकता है ।

खाप पंचायत आजकल सरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है । इन जातीय पंचायतों द्वारा ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर मृत्युदण्ड) की घटनायें कुकरमुतों की तरह बढ़ती जा रही हैं । यह समस्या इतना गंभीर रूप धारण कर गई हैं कि केन्द्र सरकार इस पर रोक लगाने के लिये एक विधेयक लाने के लिये विवश हो गई लगती है । सारा मामला मन्त्रियों के एक समूह को सौंप दिया गया है जो राज्य सरकारोें की राय से सरकार एक आम राय पर आधारित विधेयक सांसद के मानसून सत्र में लाने के लिए वचनबद्ध है। आशा की जा सकती है कि यह इस गंभीर समस्या को टालने की रणनीति न हो कर एक गंभीर प्रयास है जिसे मानसून सत्र में ही सुलटा किया जायेगा ।
एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर साल सम्मान के नाम पर लगभग एक हतार हत्याएं होती हैं । इसमें 900 हत्याएं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, देहात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती हैं । इस कुकृत्य में हरियाणा सबसे आगे है । पिछले कुछ महीनों में तो इस छोटे से प्रदेश में ऐसी हत्याओं की बाढ़ सी आ गई है। पिछले विधानसभा चुनाव में शासक पार्टी के प्रचाार का मुख्य नारा था, ‘नम्बर वन हरियाणा’ । कम से कम ऐसी हत्याओं के क्षेत्र में तो हरियाणा ने बाजी मार ली है और ‘नम्बर वर हरियाणा’ बनने का खिताब हासिल कर सकता है ।

हरियाणा एक प्रगतिशील राज्य माना जाता है। यह प्रदेश पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ हरित क्रान्ति के क्षेत्र में देश में अग्रणी रहा है। यहां पक्की सड़कों का जाल है। हर गॉंव पक्की सड़क से जुड़ा हुआ है। हर गॉंव में बिजली है । शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों का ताना बाना बहुत अच्छा है। यातायात के साधन उत्तम हैं। अब इस सामाजिक ताने बाने में शिथिलता व बिरबराव आ गया है। परन्तु इसे चुस्त- दुरुस्त किया जा सकता है। फिर क्या कारण है कि यह प्रदेश प्रतिगामी जातीय पंचायतों की जकड़न में है जहां रोज़ तालिबाना फरमान जारी किये जाते हैं। विवाहित जोड़ों को भई बहन बनाने का फतवा, परिवारों का सामाजिक बहिष्कार व गोत्र से निष्कासन, जोड़ों के वध का फरमान इत्यादि साधारण बात हो गई लगती है। यह प्रदेश आधुनिकरण में अगवा लगता है परन्तु यह आधुनिकरण सतही है और जनता, विशेष कर बहुसंख्यक जाट समुदाय, के दिलोदिमाग को नहीं छू पाया है। आधुनिक वेशभूषा, सम्पन्न लोगो के पास नवीनतम माडल की गाड़ियां, अति गरीब लोगों को छोड़कर हर एक के हाथ में मोबाइल और आधुनिक युग की लगभग सभी चीजें यहां देखने को मिलती हैं। परन्तु दिमाग व समझदारी अभी भी मध्य कालीन युग में अटके हुए हैं। हरियाणा में जातीय पंचायतों के दबदबे को समझने के लिए इस विरोधाभास को समझना जरुरी है। इसके लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नज़र डालना आवश्यक है।
हरियाणा में पहले दर्जे की संरचना के सृजन में बहुत बड़ी धन राशि व्यय की गई है। हरियाणा में भौतिक विकास हुआ परन्तु सांस्कृतिक उत्थान की कमी रही। यह हरियाणा समाज का मुख्य अन्तर विरोध है। जब तक आर्थिक विकास और सांस्कृतिक उत्थान के बीच की खाई को नहीं पाटा जाता हरियाणा समाज एक स्वस्थ इकाई के तौर पर विकसित नहीं हो सकता।
हरियाणा में वे सारे औजार (तत्व) या नदारद हैं या तो बहुत ही कमजोर हैं जो जीवन को समृद्ध करते हैं और जो एक स्वस्थ सांस्कृतिक जीवन-शैली के लिये आवश्यक हैं । हरियाणा की माटी की गंध वाले पत्र-पत्रिकाओं का विकास नहीं हो पाया । इस कमी को दूसरे प्रान्तों की बड़ी पत्र-पत्रिकाओं ने ही भरा है । अमर-उजाला, दैनिक जागरण आदि इसके उदाहरण हैं ।
यहां फिल्म-उद्योग भी नहीं विकसित हो पाया और न ही राज्य स्तरीय कोई सशस्त नाटक-आन्दोलन ही यहां उपस्थिित है । स्वांग काफी समय तक हरियाणा के लोक-नाट्य क्षेत्र में प्रसिद्ध हुआ लेकिन अब यह भैंडी रागनी प्रतियोगिता में ही सिमटता जा रहा है । प्रदेश स्तर का कोई सशस्त साहित्यिक और सांस्कृतिक आन्दोलन भी यहां खड़ा नहीं हो पाया है । यहां पर भाषा और साहित्य का विकास भी अवरूद्ध रहा है । पंजाबी भी हरियाणवी की तरह एक बोली ही थी परन्तु वहां एक समृद्ध पंजाबी साहित्य उभरा जिसकी छाप विदेशों पर भी पड़ी परन्तु हरियाणा के लोग पं. लख्मी चन्द और जाट मेहर सिंह की रागनियों से आगे नहीं जा पायें।
हरियाणा में सांस्कृतिक जड़ता के कई ऐतिहासिक उदाहरण हैं जिनकी संक्षिप्त चर्चा जरूरी है । स्वतन्त्र राज्य की स्थापना, नगरों या महानगरों का विकास और एक प्रगतिशील मध्य-वर्ग का उभरना आवश्यक चीजें हैं जोकि संस्कृति-भाषा और साहित्य के विकास के लिये जरूरी है । चूंकि दिल्ली देश की सत्ता का केन्द्र रही है और इसने बचने चारों ओर मध्यकालीन युग में किसी राज्य का विकास नहीं होने दिया। भरतपुर राज्य एक मात्र अपवाद रहा है । हरियाणा के दिल्ली को तीन तरफ से घेरा हुआ है परन्तु मध्यकालीन युग में यहां किसी राज्य की स्थापना नहीं हुई जिसकी वजह से सामन्ती संस्कृति का विकास यहं नहीं हो पाया । यहां कुछ नवाबियां उभरी जनकी आर्थिक दशा प्रायः कमजोर रहती थी । किसी प्रदेश के विकास में महानगर की विशिष्ट भूमिका होती है । संयुक्त पंजाब में लाहौर ने यह भूमिका निभाई । यह शिक्षा-प्रसार का केन्द्र रहा और सब राजनीतिक-समाजिक आन्दोलन यहीं से आरम्भ हूए । इसी प्रकार हम बंगाल की कोलकत्ता के बिना कल्पना भी नहीं कर सकते और यही बात तमिलनाडु में चेन्नई के बारे में की जा सकती है । हरियाणा में अभी तक कोई ऐसा महानगर नहीं उभरा है । यहां के अधिकांश नगर विकसित ग्रामीण ताने-बाने के नमूने हैं जहां आधुनिक सुविधाये तो उपलब्ध हैं लेकिन यहां के नागरिक ग्रामीण मानसिकता के शिकार हैं । जीवन के अधिकांश फैसले जात-पात, गोत-नात के आधार पर ही लिये जाते हैं । आधुनिक वैज्ञानिक सोच लगभग नदारद है । हरियाणा का दिल्ली के अति निकट होने का भी कुप्रभाव ही देखा गया है । इनके बीच रिश्ता एकतरफा रहा है । दिल्ली यहां का सरप्लस तो खींचती रही परन्तु इसके बदले में दिल्ली से कुछ अधिक नहीं मिला । हरियाणा, दिल्ली की छत्रछाया में ही रहा और इस कारण इसका कद बौना रह गया । आज भी दिल्ली महानगर में हरियाणावासियों की पहचान लगभग नदारद है ।
भारत का इतिहास किसान-विद्रोहों से भरा पड़ा है । परन्तु इस विसलसिले में भी हरियाणा पिछड़ा रहा है । मेवात और नारनौल को छोड़ कर हरियाणा इन विद्रोहों से वंचित रहा है । मुगल काल में आगरा के इर्द-गिर्द ब्रज क्षेत्र में जाटों का विद्रोह हुआ और नारनौल मे सतनामी विद्रोह । परन्तु इन विद्रोहों में जाति एकता का सूत्र थी और इसी कारण किसानों में वर्ग-चेतना का विकास नहीं हुआ था । वैज्ञाानिक सोच का उभार नदारद रहा आर आजादी के समय यहां के लागों को जात-पात की कमजोरी विरासत मे मिली । इसी कारण लूट-खसोट करने वाले लोगों ने यहां अपनी जागीरें और नवाबी कायम की और यहां तक एक विदेशी जार्ज थामस ने हांसी में लगभग 800 गॉंवों की जागीर की स्थापना कर दी ।
हरियाणा क्षेत्र वैदिक काल से दसवीं शताब्दी तक काफी हद तक शान्त इलाका रहा । इसी दौरान यहां वेदों और प्राचीन ग्रन्थों की रचना हुई । विशेषकर भागवद् गीता यहां रची गई । किसी प्रदेश में सांस्कृतिक विकास के लिये शांति का वातावरण और एक तबके में सरप्लस भी उपलब्ध हो यह सांस्कृतिक विकास में मदद करता है । यूनान की सभ्यता इसका ज्वलंत उदाहरण है । दसवीं शताब्दी के बाद यह इलाका विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार रहा जो इस इलाके में से लूट-पाट, मारकाट करते हुए दिल्ी-आगरा पहुचते थे । हरियाणा का पानीपत नगर तीन युद्धों के लिए प्रसिद्ध है । 1014 ई. में मोहम्मद गजनवी ने थानेसर को तहस-नहस किया । तैमूरलंग हरियाणा में राजस्थान की ओर से घुसा और फतेहाबाद, टोहाना, कैथल, पानीपत होते हुए 26 दिसम्बर, 1398 को दिल्ली पहुंचा और वहां कत्ले आम किया । (1738) में नादिरशाह अपने अमले के साथ भारत में घुसा और दिल्ली को उसने तहस-नहस किया ।
इसके बाद हरियाणा क्षेत्र में अराजकता का दौर शुरू हुआ। विभिन्न लुटेरों ने इस क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में अपनी जागीरें कायम की । इसी कारण यहं के लोगों के सामने आने आप को बचा कर रखना ही चुनौती थी । इन हालात में सांस्कृतिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती ।
1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में हरियाणा के लागों की एक अहम भूमिका रही है । हरियाणा ही नहीं अपितु देश के विभिन्न हस्सों में किसानों, कारीगरों, दलित तबकों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया । इस विद्रोह ने देश के इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम की । हरियाणा में यह विद्रोह बड़ी क्रूरता के साथ कुचला गया । झज्जर के नवाब और बल्लबगढ़ के राजा को फांसी पर लटकाया गया । इस विद्रोह के प्रसिद्ध नायक राव तुलाराम ने काबुल में जाकर आखिरी सांस लिया । अंग्रेजी शासन ने यहां आतंक फैलाया । गॉंव के गॉंव जला दिये गये । लोगों को वृक्षों से लटका कर फांसी दी गई जिनकी लाशें कई दिनों तक लटकती रहीं । इससे यहां के लोगों का मनोबल टूटा । आज भी हरियाण के ग्रामीण क्षेत्रों में यह कहावत प्रसिद्ध है कि सरकार की अगाड़ी और घोड़े की पछाड़ी में नहीं आना चाहिए । इस मानसिकता ने यहां एक ऐसी कुलीन वर्ग को जम्म दिया जो हर हालत में सत्ता के नज़दीक लग कर निजी लाभ उठाने के लिये तत्पर रहाता है । यहां का गांवों से उभरा हुआ मध्यवर्ग अवसरवादिता का शिकार रहा है और मध्यवर्ग प्रगतिशील भूमिका से वंचित रहा है ।
समाज -सुधार आन्दोलन के मामले में भी हरियाणा पिछड़ा रहा है। भारतीय पुनर्जागरण चाहे वह कितना भी नाकाफी या अधकचरा रहा हो इसकी कई प्रदेशों में महत्वपूर्ण भूमिका रही। बंगाल में राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आदि ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और इसी प्रकार अन्य प्रदेशों में भी इसका प्रभाव पड़ा। परन्तु हरियाणा का क्षेत्र इसके प्रभाव से लगभग अछूता रहा। हरियाणा ही नहीं यही बात दिल्ली के आसपास के हिन्दी क्षेत्र के बारे में कही जा सकती है। यह क्षेत्र आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा से वंचित रहा, यही कारण है कि यह क्षेत्र आज भी जात-पात के अभिशाप से ग्रस्त है।
मध्यकालीन युग में भक्ति आन्दोलन का कुछ प्रदेशों में सकारात्मक प्रभाव रहा। गुरुनानक दादू, कबीर, रैदास इत्यादि संतों ने आम लोगों की बोलचाल की भाषा में ही वाणी का निर्माण किया, जिससे भाषा और साहित्य के विकास में काफी सहायता मिली। हरियाणा क्षेत्र इस आन्दोलन के प्रभाव से भी काफी हद तक अछूता रहा। रोहतक के इर्द-गिर्द गरीबदास, चेतरामदास, निश्चलदास और हरिदास इत्यादि संत पैदा हुए परन्तु इनका प्रभाव अपने आसपास के इलाके तक ही सीमित रहा।
आर्य-समाज एक ऐसा समाज सुधारक आन्दोलन है जिसका प्रभाव हरियाणा के क्षेत्र में रहा और कुछ हद तक आज भी देखा जा सकता है। इस आन्दोलन ने जात-पात और पंडितों द्वारा फैलाये अंधविश्वास पर कठोर प्रहार किया। परन्तु पंजाब क्षेत्र की तुलना मेें इस क्षेत्र में इस आन्दोलन की बड़ी भारी कमजोरी रही। पंजाब क्षेत्र में आर्य समाज की प्रगतिशील सोच की छाप रही और वहां डी.ए.वी. संस्थाओं के माध्यम से आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार रहा। हरियाणा में इस आन्दोलन की प्रतिगामी परम्परा का प्रभाव अधिक दिखाई पड़ता है। यहां बेशुमार गुरुकुल संस्थाओं की स्थापना हुई जहां आधुनिक शिक्षा व दृष्टिकोण नदारद रहा है। मिसाल के तौर पर कुछ साल पहले झज्जर के पास दुलीना में पांच दलित सड़क पर पीट-पीट का इसलिए मार दिये क्योकि एक आधारहीन अफवाह फैल गई कि उन्होने गाय को मारा था। झज्जर के प्रसिद्ध गुरुकुल के ब्रहमचारियों ने इर जघन्य कांड में अहम भूमिका निभाई। 1947 में देश के बंटवारे के समय मुसलमानों की कत्लो-गारत में भी इस गुरुकुल की भूमिका रही।
देश का स्वतन्त्रता आन्दोलन भी हरियाणा क्षेत्र में तुलनात्मक रुप से कमजोर रहा। जबकि पंजाब क्षेत्र ने भगतसिंह और उनके साथियों जैसे स्वतन्त्रता के मतवाले पैदा किये जिन्होने शहादत का जाम पिया परन्तु हरियाणा क्षेत्र में उस समय कुछ पढ़े-लिखे नौजवान सरकारी नौकरियों के पीछे भागते रहे। इसने हरियाणा क्षेत्र में उभरते मध्यवर्ग मेें नौकरशाही और सरकारपरस्ती की मानसिकता पैदा की।
उपरोक्त ऐतिहासिक और सांस्कृति पृष्ठभूमि के परिप्रिक्ष्य में यहां एक ऐसा शासक वर्ग ;तनसपदह मसपजमद्ध पैदा हुआ जिन के लिए किसी प्रकार भी सत्ता की प्राप्ति और फिर प्रदेश के संसाधनों का अपने परिवार और पिछलगुओं के लिए प्रयोग करना ही मुख्य उद्देश्य है। यहां की मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों में विचारधारा लेश मात्र भी नहीं है। दक्षण पंथी और प्रगतिशील दोनों धाराओं के राजनैतिक संगठन अति कमज़ोर हैं और वे यहां की राजनीति को एक विशिष्ट दिशा देने में असमर्थ है। यथा स्थिति को बनाये रखने में यकीन रखने वाली राजनैतिक धारा ही इस प्रदेश की मुख्य धारा है चाहे लफ्फाजी कुछ भी क्यों न हो। इस प्रदेश मेें सूत-कसूत की राजनीति हावी है। जैसे हालात वैसी ही बोली और कृत्य।
उपरोक्त ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृष्य में इस प्रदेश में खाप पंचायतों की जकड़न तर्क संगत है । इस सिलसिले खाप के ऐतिहासिक परिदृष्य पर और इसका हरियाणा प्रदेश में स्वरूप पर नजर डालना जरूरी है ।
खाप पंचायत दिल्ली, दिल्ली देहात, हरयाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और साथ लगे क्षेत्रों के इर्द-गिर्द, बहुधा एक जाट संस्थान है । यह एक गोत्र-केंद्रित पंचायत है, जिसमें विशेष गोत्र के बाहुल्य वाले गांवों के समूह जैसे गठवाला, हुड्डा, कादियां, सांगवान, श्योराण और इसी तरह के विशेष गोत्र के समूह शामिल होते हैं । कुछ मामलों में यह क्षेत्राीय अस्तित्व का निकाय हो सकता है जैसे मेहम चौबीसी पंचायत, रोहतक जिले में जिसमें पहले 24 गॉंव होते थे और अब 32 गॉंव हैं जिनसे एक विधान सथा का क्षेत्र बन जाता है ।
खाप के सभी सदस्यों का एक-दूसरे से खून का रिश्ता माना जाता है । यह भाईचारा एकता का आधार है । प्रमुख गोत्रों के अलावा अन्य गात्रों के जाट जो किसी विशेष खाप के गॉंवों में रहते हैं, उसका भाग माने जाते हैं । उसी खाप के भीतर शादियां वर्जित होती हैं भले ही एक का गोत्र और एक की मां का गोत्र छोड़ दिया जाए जैसा कि आम प्रथा है । यदि लड़की के गोत्र के कुछ परिवार लड़के के गॉंव में रहते हैं तो शादी की अनुमति नहीं दी जाती भले ही वह दूर जगह पर भिन्न खाप से संबंधित हो । यदि विशेष खाप में उसका कोई मामा की ओर से प्रमुख गोत्र के साथ संबंध हो तो भी शादी गैरकानूनी मानी जाती है ।
खाप केा मध्यवर्ती युग से जाना जा सकता है जबकि जाट एक कबीलाई समाज था और दलों द्वारा शासित था । इसने खाप में भाईचारा पैदा करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । अतः उन्होने असुरक्षा के उस काल में उपकरण सृजित किया जबकि कानून और व्यवस्था की आधुनिक अवधारणा सुनी भी नहीं थी और जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ थी । किसी विशेष खाप के सदस्यों से उसे संरक्षित रखने की आशा की जाती थी । जब दिल्ली के कुछ शासकों ने जजिया (धार्मिक कर) लगाया तो भी खाप ने धार्मिक निष्ठा का बचाव किया या धार्मिक कट्टरपंथी का विरोध किया । जब अलाऊद्दीन खिलजी में गढ़शंकर में गंगा नदी में नहाने पर जजिया लगाया तो खाप ने इसका जमकर मुकाबला किया । आरंगजेब की धर्मांधता का विरोध किया गया । जब कभी दिल्ली के शासकों ने राजनीतिक और सैनिक दृष्टि से कमजोरी दिखाई तेा खाप पंचायत ने अपने लाभ के लिए उसका इस्तेमाल किया ।
दिल्ली के आसमास के जाट क्षेत्र के विभिन्न खापों ने सन् 1857 के आंदोलन में अंग्रेजी शासन का विरोध किया था । किसी विशेष क्षेत्र में विभिन्न खापों ने सर्व-खाप पंचायत (विभिन्न खापों की एक संयुक्त परिषद) बुलाकर अंग्रेजों का विरोध किया । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बालियां, सालकलेन (या देश), गठवाला और कालसलेन इत्यादि ने अंग्रेजों का विरोध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । हरियाणा क्षेत्र में भी, अंग्रेजों का विरोध करने के लिए विभिन्न खापों ने सक्रिय भाग लिया था । क्रांति के बाद ब्रिटिश शासन की स्थापना के पश्चात सर्व-खाप की संस्था केा धक्का लगा । ब्रिटिश द्वारा लागू किए गए प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र से एक और धक्का लगा ।
खाप पंचायत और विगत में सर्व-खाप काउंसिल के गठन और कार्यों की वर्तमान स्थिति में जांच करनी आवश्यक है। क्षाप का ढांचा साझी पीढ़ी और निवास के दो सिद्धांतों पर खड़ा है। समुदाय ग्रुप के खाप-मुखिया को विशेष प्रयोजन के लिए आयोजित की गई विशेष बैठक के लिए नामांकित किया जाता था । कुछ मामलों में नेतृत्व पैतृक हो गया । खाप पंचायत बैठकों में विवाह जन्य संगोत्रता की एकीकरण में प्रमुख भूमिका होती थी। विवादों का निपटज्ञरा खाप की एकता और संबद्धता बनाए रखने के लिए किया जाता था। साझे रिवाजों, विश्वासों, जीवनशैली और आदर्शें से संबद्धता का आधार मिलता था। सांझे ढांचे से किसी प्रकार के विचलन को बुरा माना जाता था । इन सबको भाईचारे के सांचे में रखने से खाप पंचायत बनती थाी जो विगत में एक शक्तिशाली संस्था होती थी और अनिश्चितता के उस युग में इसकी भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण और सामाजिक तौर पर लाभदायक होती थी । खाप पंचायत का प्रमुख कार्य सदस्यों के बीच और अपने प्रभाव क्षेत्र के अधाीन गॉंवों के विवादों का निपटारा करना होता था । उद्देश्य यह था कि खाप के भीतर एकता और सामंजस्य बनाए रखा जाए । दहेज प्रथा, परिवार के कार्यों में फिजूलखर्ची, शराब का प्रयोग करने आदि जैसे सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास भी किया गया । समुदाय का कल्याण और उसकी प्रगति, खाप का मार्गदर्शी सिद्धांत था ।
अपने अक्खड़ सदस्यों के साथ निपटने में खाप पंचायत अनुनय-विनय से काम लती थी न कि डांट-डपट या बल प्रयोग करके। कोई शारीरिक सजा, आर्थिक आदेश (नाममात्र के लिए एक धेला जुर्माना होता था) या किसी की संपत्ति को हानि पहुंचाने से बचा जाता था। विशेष समुदाय के धूम्रपान करने का साझा उपकरण हुक्का रहा है। समाजिक बहिष्कार के लिए ‘हुक्का-पानी बंद’ की युक्ति का प्रयोग किया जाता था जिसके द्वारा दोषी व्यक्ति का किसी के साथ हुक्का पीना या किसी के घर पर पानी पीना बंद कर दिया जाता था। किसी को गॉंव से स्थाई तौर पर निकाल देना बहुत कम होता था और इसका प्रयोग तभी किया जाता था जब उस व्यक्ति ने कोई ऐसा अपराध किया हो जिससे सामाजिक आक्रोश पैदा हो । आशय, समुदाय की एकता के हित में सदस्य को उसकी गलती जतलाने का रहता था । खाप की कार्यशैली अनुनय का तरीका था न कि डांट-डपट या बल प्रयोग का तरीका । जब समझाने-बुझााने का तरीका असफल हो जता तभी यथासंभव कम-से-कम दंड दिया जाता था ।
खाप पंचायत की संस्था की शुरूआत से अब तक परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं । समय बदल गया है और इस प्रक्रिया में संस्था भी अपना उत्साह खो चुकी है । अनुनय-विनय भूतकाल की वस्तु रह गई है, अब तो डांट-डपट या बल प्रयोग का तरीका अपनाया जाता है । खाप पंचायत की बैटकों में इन दिनों निर्णय लेने के लिए बदले की कार्रवाई करना ही प्रेरक करक हो गया है । खाप क्षेत्र में भाईचारे की धारणा जो कि संस्था का उद्देश्य होता था, अब एक कहानी बनकर रह गई है न कि असलियत । संचार के सुधरे तरीकों, परिवहन, जन मीडिया और आधुनिक शिक्षा के प्रसार ने युवा को बाहरी विश्व के साथ जोड़ दिया है और उनमें से बहुतों ने ग्रामीण समाज की पुरानी आस्थाओं को नकार दिया है । जजमानी की पुरानी प्रथा जो निचली जातियों को उच्च जातियों से ताबेदारी के संबंध से बांधे रखती थीं, अब भूतकाल की बात हो गई है । शिक्षा के प्रसार और अनुसूचित जातियों के लिए नौकरियों के आरक्षण ने कमजोर वर्गों की गतिशीलता में वृद्धि की है जिससे उनकी आकांक्षाएं बढ़ी हैं और उन्होंने स्वयं को अधिकार से आंकना शुरू कर दिया है ।
संयुक्त परिवार प्रणाली प्रायः समाप्त हो चुकी है और परिवार का मुखिया अपना सम्ममन खो चुका है । खाप के सभी सदस्य अब भाई और बहन नहीं माने जाते और स्त्री और पुरूष दोनों वर्गों के बीच आत्मीयता आम हो गई है । जब यह वैवाहिक संबंधों का रूप ले लेती है तो इसे ग्रामीण समाज के एक वर्ग द्वारा खाप संस्था की महिमा को खतरे के रूप में लिया जाता है । इसे अक्षमरू पाप माना जाता है जिसकी सजा क्रूर होती है । हरियाणा के झज्जर जिने के जोंधी गॉंव के एक लड़के ने दिल्ली देहात के गॉंव की एक लड़की से शादी कर ली । जब उनका डेढ वर्ष का एक शिशु हो गया तो यह खोज निकली कि इस वैवाहिक बंधन में खाप के नियमों का कुछ उल्लंघन हुआ है। खाप की पंचायत ने फतवा जारी किया कि पत्नी अपने पति को, लोगों के बीच उसकी कलाई पर राखी बांधकर, भाई धोषित करे । वैवाहिक जोड़े ने इस हुक्मनामे को मानने से इन्कार कर दिया और उनका गॉंव से बहिष्कार कर दिया गया । लड़के मे पिता की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, लड़के की ट्रक ड्राईवर के रूप में नौकरी चली गई । इस तरह के कई उदाहरण और भी हैं ।
हरियाणा प्रदेश का प्रमुख ग्रामीण समुदाय जिसका भूमि और बाहुबली शक्ति पर आधिपत्य है और जो अपने नजरिए से अत्यधिक पैतृक है, पैतृक खाप पंचायत पर अपना आधिपत्य मानता है, यह महिला विरोधी और कमजोर वर्ग विरोधी है । झाज्जर जिले के तलाव गॉंव में एक जाट लड़की के एक अनुसूचित जाति के लड़के के साथ संबंध थे और वह उसके साथ भाग गई । उसकी छोटी बहन भी उन्हें नैतिक समर्थन देने के लिए उनके साथ चली गई । लड़कियां पकड़ ली गईं और घर वापस लाई गईं। अगली प्रातः दोनों मृत पाई गईं और लुके-छिपे जला दी गईं । स्पष्ट है उनकी हत्या की गई थी । इस वीभत्स घटना की प्रशासन द्वारा कोई तहकीकात या जांच नहीं की गई । ऐसी हत्याएं दिल्ली के गिर्द जाट क्षेत्र में होती रहती हैं। जाट क्षेत्र में ‘सम्मान’ की हत्याएं आम हैं जैसा कि पाकिस्तान के कबीलाई क्षेत्रों में होता है। पैतृक समाज में सम्मान की धारणा महिला से संबद्ध है और यदि लड़की खाप के कायदे-कानून के अनुसार यौण संबंधी रीति-रिवाज से पथभ्रष्ट हुई पाई जाती है तो उसे प्रायः मार दिया जाता है और कोई प्रश्न नहीं पूछता । रोहतक जिले की एक जाट लड़की के छोटी जात के एक लड़के से संबंध थे । उसे रात को परिवार के एक खेत में ले जाया गया आर उसके चाचा ने उसे ट्रेक्टर के नीचे कुचल डाला ।
झज्जर जिले के ससरोली गॉंव का एक लोहार का लड़का ऊंची जाति की एक लड़की के साथ भाग गया । सजा देने के लिए खाप पंचायत ने केवल लड़के के परिवार को ही पकड़ा और उसे गॉंव से निकाल दिया । लड़की के परिवार को उदारता से छोड़ दिया ।
खाप पंचायत का उभार एक समानांतर न्यायिक पद्धति के रूप में हुआ है और यह राज्य के प्रत्येक अंग को हिकारत की निगाह से देखती है । कंगारू न्यायालय आयोजित किए जाते हैं जिनमें क्रूर फतवे जारी किए जाते हैं। इसमें वही भाग लेते हैं जो इसके सदस्य होते हैं-प्रमुख राजनीतिक दलों के सदस्य, प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका-सभी मूकदर्शक बने रहते हैं। यह दृष्टिकोण नजरंदाजी का कार्य नहीं है । इसे जानबूझकर पोषित किया गया है ताकि जाति-पपति में रंगी खाप और गोत्र की इस पिछड़ी चेतना को कायम रखा जा सके क्योंकि यह उनके अनुकूल है जो वर्तमान समाजिक ढांचे पर हावी हैं ।
खाप क्षेत्र में भारत के संविधान का परमादेश नहीं चलता। भिवानी जिले के जेवली गॉंव के ओमवीर की शादी जूही गॉंव मे सरोज से हुई थी । वे श्योराण गोत्र जो कि क्षेत्र में प्रमुख हैं, से भिन्न गोत्र से संबंधित थे । अतः विवाह में खाप मानदंडों का कोई अतिक्रमण नहीं हुआ था । तथापि, लड़की का श्योराण गोत्र से मातृ पक्ष से कोई दूर का संबंध था। यह श्योराण खाप मुखिया की नाराजगी के लिए र्प्याप्त था। इस वैवाहिक जोड़े को श्योराण खाप क्षेत्र के बाहर किसी अन्य गॉंव में शरण लेनी पड़ी। लड़के के पैतृक गॉंव में तनाव था । शांति बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस तैनात की गई थी । गॉंव के श्योराणों ने गॉंव के चारों तरफ घेराबंदी कर दी ताकि यह जोड़ा गॉंव में प्रवेश न करे । गॉंव में प्रवेश करने वाले प्रत्येक वाहन की तलाशी ली गई । पुलिस के वाहन भी इस तलाशी से नहीं बच सके । आरंभ में लड़के के पिता ने इस निर्णरू का विरोध किया लेकिन अंततः उसे भी खाप पंचायत के दबाव के आगे झुकना पड़ा । पुलिस दल ने गॉंव को तब छोड़ा जब माता-पिता अपने इकलौते पुत्र के स्थाई निष्कासन के लिए राजी हो गए । भारत के संविधान के अंतर्गत गणतंत्र के प्रत्येक नागरिक को भारत में किसी भी स्थान पर बसने का मौलिक अधिकार प्राप्त है । प्रशासन और पुलिस ने इस लज्जाजनक उल्लंघन को मौन सहमति दी ।
निर्वाचित ग्रामीण पंचायत, जो गठन में अधिक प्रतिनिधिक है जिसमें अनुसूचित जानियों, पिछड़े वर्गों और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण है (खाप पंचायत में निर्वाचित सिद्धान्त नहीं है), खाप संस्था द्वारा, उसे मान्यता नहीं दी जाती । आज के युग में जबकि कानून प्रवर्तन, न्याय, सजा देने और विवाद के हल के लिए संस्थाएं विद्यमान हैं और चूकों के बावजूद, बिल्कुल नियमित रूप से कार्य करती हैं, खाप पंचायत की उपयोगिता जबकि समाप्त हो चुकी है, तब भी वर्षों पुरानी यं संस्थाएं अपनी उत्तरजीविता के लिए पूरे दमखम के साथ संघर्ष करती हैं । ऐतिहासिक तौर पर यह मिट चुकी है परंतु भौतिक तौर पर जीवित है ।
खाप पंचायत स्वयं में कानून बनी हुई हैं । इन पंचायतों में बेरोजगार निखटू युवा अग्र पंक्ति में रहते हैं और बेतुके, अनोखे और निकृष्ट निर्णय देने के लिए ज्येष्ठों को प्रेरित करते हैं । वे अपने नीरस जीवन को सजीव करने के लिए सनसनी पैदा करने की तलाश में रहते हैं । अजूबा यह है कि ये खाप पंचायतें सामाजिक बुराइयों, जैसे राज्य में अपराधों के बढ़ने, प्रशासन में भ्रष्टाचार, विपरीत लिंगानुपात और भ्रूण हत्या की बढ़ती घटनाओं, ग्रामीण युवकों द्वारा शराब और ड्रग का बढ़ता हुआ चलन और ऐसी ही अन्य बुराइयों पर ध्यान नहीं देतीं। कौन किससे शादी करता है यही मामला उनको आंदोलित करता रहता है।
तथापि राजस्थान ने इस अंधेरे को प्रकाश में बदलने का प्रयास किया है । राजस्थान उच्च न्यायालय और राज्य के मानव अधिकार आयोग ने जातिगत पंचायतों के कार्यचालन पर स्वप्रेरणा से ध्यान दिया है और राज्य प्रशासन को उन पर रोक लगाने के लिए अनुदेश जारी किए हैं । राजस्थान के गृह मंत्रालय ने दिनांक 14.02.2001 के बपने पत्र सं.डी-10(26) गृह 13/98 के तहत पुलिस एवं कानून प्रवर्तन कने वाले अन्य अभिकरणों को अनुदेश दिए हैं कि राज्य में जातिगत पंचायतों के गैर कानूनी कार्यचालन पर रोक लगाई जाए । इन पिशाचरूपी संस्थाओं पर रोक लगाए जाने के बडे दूरगामी सुखद परिणाम निकलेंगे । हरियाणा में प्रमुख समस्या यह है कि सिविल सोसायटी तो राज्य में मौजूद नहीं है । यहां कोई सामाजिक संस्थाएं, संगठित समूह, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार संगठन व गैर सरकाी संगठन नहीं है जो अधिकरों और स्वतंत्रता के मुद्दे केा उठा सके, जिसके लिए भारत के संविधान के अंतर्गत गारंटी दी गई है । यही कारण है कि ये पुराने सामाजिक संगठन बिना किसी रोक-टोक के प्रचलन में है।
पिछले कई सालों से हरियाणा की खाप पंचायत अपने फरमानों की वजह से चर्चा में रही है। वैवाहिक जोडों को भाई-बहन बनाने का फरमान, परिवारों का सामाजिक बहिष्कार या उनके गॉंव से निष्काषण, ऑनर किलिंग-सम्मान के लिये मृत्यु दण्ड इत्यादि मामलों में हरियाणा की खापें मीडिया में छाई रही हैं।
आजकल हरियाणा की खापें उक्त फैसलों से पल्ला झाडने में लगी हुई हैं। उनकी दलील है कि अमानवीय फरमान जारी करने में खापों की कोई भागीदारी नहीं रही, अपितु इस प्रकार के फैसलें गॉंव विशेष की पंचायत व विशिष्ट परिवार के लोग लेते रहे हैं और खाप को मीडिया बिना मतलब बदनाम करने में लगा हुआ है। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूॅं कि यह दलील आधारहीन है।
हरियाणा के जिन गॉंव में पिछले दो दशक से खाप संबंधित घटनाएं हुई हैं, मैं लगभग उन्हीं सभी गॉंवों में गया हूॅं और मामले की तह तक जाने की चेष्ठा की है। कुछ समय पहले झज्जर जिले के आसंडा गॉंव में राठी खाप की पंचायत राठी खाप के प्रधान धर्म सिंह राठी की अध्यक्ष्ता में हुई और उस गॉंव के एक वैवाहिक जोडे को भाई-बहन बनाने का फरमान जारी किया गया। आसंडा के रामपाल राठी का विवाह रोहतक जिले के सांधी गॉंव की सोनिया हुड्डा से हुआ था। दोनों के गोत्र, गॉंव, खाप और जिले अलग-अलग, फिर भी यह शादी अवैध करार दी गई। तर्क ये दिया गया कि सोनिया के बुजुर्ग पॉंच सौ साल पहले राठी थे। मैं कुछ साथियों के साथ धर्म सिंह राठी से मिला और जब हमने उनसे पूछा कि क्या वह बता सकते हैं कि पांच पॉंच सौ साल पहले उनके बुजुर्ग क्या थे, वह चुप रहे। हमने हाथ जोड़ कर उनसे प्रार्थना की कि वह इस दम्पति पर दया करें और उन्हें गॉंव में बसने दे। उन का जवाब था कि यदि रामपाल व सोनिया पति-पत्नी रहना चाहते हैं तो उन्हें गॉंव छोड़ कर कहीं ओर आबाद होना पडेगा।
सोनिया गर्भवती थी और इस फरमान के बाद वह बेहोश हो गई और उसे मेडिकल कॉलिज रोतहक में भर्ती कराया गया। पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका डाली गई। न्यायलय ने प्रशासन को निर्देश दिया कि इस जोडे़ को उनके गॉंव में बसाया जाये। पुलिस कप्तान दल बल के साथ आसंडा गया। राठी खाप के प्रधान धर्म सिंह राठी की अध्यक्षता में राठी खाप की पंचायत आसंड़ा में फिर से बुलाई गई और इस पंचायत ने दबाव में आकर अपना फैसला बदला और रामपाल व सोनिया को आसंड़ा में बसने की आज्ञा मिली।
कैथल जिले के वेद पाल मौर का विवाह जींद जिले के सिंहवाल गॉंव की सोनिया बनवाला से हुआ। दोनों के गोत्र, गॉंव, खाप और जिले अलग-अलग, परन्तु यह शादी इस बिनाह पर अवैध करार दी गई कि बनवाला के व मौर गोत्रों में भाईचारा था। बनवाला खाप के प्रधान ने वेदपाल मौर की हत्या का फरमान जारी किया। जो कई टी.वी. चैनलों पर टेलिकास्ट हुआ और अखबारों में भी छपा। जब वेदपाल मौर हाईकोर्ट के वारंट अफसर व पुलिस के साथ अपनी पत्नी को लेने सिंहवाल गया तो गॉंव की भीड़ ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। अगर बनवाला खाप के प्रधान ने लोगों को उकसाया न होता तो वेदपाल मौर की हत्या न होती। इस प्रकार की कई ओर मिसालें दी जा सकती हैं।
अगर खाप की मुखियों व उनके समर्थकों की दलील को सच्च भी मान लिया जाये मो एक अहम सवाल उठता है। खापें तुगलकी फरमानों और अमानवीय कृत्यों पर चुप क्यों रही है, उन्होंने इनकी भर्त्तना क्यों नहीं की। ये सब कृत्य खाप के नाम पर किये जाते रहे हैं। अगर खाप की इनमें कोई भूमिका नहीं रही तो खाप ने ऐसे फैसले लेने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार क्यों नहीं किया और उन्हें दण्डित क्यों नहीं किया।
अतीत में खापें न्याय के लिये लडती रही हैं। अब क्या हो गया कि हरियाणा की खापों के नाक के नीचे जुल्म हो रहे हैं और उन्हें सांप सूंघ गया है और खाप के चौधरी चुप्पी साधे रहते हैं।
हकीकत यह है कि वर्तमान खाप संस्था पर इस प्रकार के लोग काबिज हो गये हैं जो अपने निजी रंजिशें निकालने और ग्रामीण समाज पर अपना गलबा कायम रखने के लिये उल जलूल फैसले लेते रहते हैं।
आजकल हरियाणा की खापों की मुख्य मांग यह है कि विवाह अधिनियम 1955 में संशोधन करके सगोत्र विवाह, उसी गॉंव में विवाह और गवांड में विवाह पर प्रबिंध लगाया जाए। स्वंय हरियाणा में हिसार से आगे अनेक गॉंव हैं जहां जाटो और बिश्नोईयों के गॉंवों में उसी गॉंव में विवाह की प्रथा है। हरियाणा के प्रसिद्ध गॉंव चौटाला में 200 से अधिक शादियां उसी गॉंव में हुई हैं। यह गॉंव अपवाद नहीं है। एक बहुत बडा क्षेत्र है जहां खाप की व्यवस्था नहीं है। हरियाणा में हिसार, फतेहबाद, सिरसा, पंजाब के अबोहर फाजिलका का ईलाका, राजस्थान में गंगानगर, बिकानेर, जेसलमेर व बाडमेर जिले-एक बहुत विशाल क्षेत्र है जहां खाप संस्था नहीं है और वहां जाटों के गॉंव में उसी गॉंव में विवाह की प्रथा का प्रचलन है। अगर कानून में बदलाव किया जाता है तो इसका यह अभिप्राय हुआ कि देशवाली जाटों के लिये एक कानून और बागड़ियों और बिश्नोईयों के लिये दूसरा कानून। कौन देशवाली है और कौन बागड़ी, इसका फैसला कौन करेगा। हिसार व फतेहबाद जिलों में ऐसे कई गॉंव हैं जहां दोनों देशवाली व बागड़ी जाट आबाद हैं।
गवांड और भाईचारे वाले गोत्रों के विवाह पर रोक की मांग तो बिल्कुल बेतुकी है। आज के युग में जबकि सारी दुनिया एक ‘ग्लोबल विलेज’ मानी जाती है, गवांड की बात करना बिल्कुल फिजूल लगती है। गॉंव में जितने गोत्र हैं, उस गोत्र की लडकी बाहर से भी बहु बनकर उस गॉंव में नहीं आ सकती। इस परम्परा की वर्तमान युग में कोई प्रासंगिता नहीं है। खाप क्षेत्र में कई ऐसे गॉंव है जहां एक दर्जन या इससे भी अधिक गोत्र वाले जाट आबाद हैं। समचाना गॉंव में जाटों के 15 गोत्र हैं। विवाह के लिये यह सब गोत्र टाले जाएं और गवांड में भी रिश्ता नहीं हो सकता। फिर जाटों के बहुत से गोत्र हैं जिनमें भाईचारा माना जाता है, जैसा कि दलाल, मान, देशवाल, सुहाग इत्यादि और उनमें भी रिश्ता नहीं हो सकता। अगर इन सब वर्जनाओं को माना जाए जो जाटों को रिश्तों के लिये विदेश जाना पडेगा।
जहां तक सगोत्र विवाह का सवाल है, जाटों में ऐसा विवाह कहीं भी नहीं होता। सारे हरियाणा में सगोत्र विवाह का कैथल जिले के किरोड़ा गॉंव के मनोज व बबली की एक घटना है। कोई दूसरी मिसाल हरियाणा में नहीं मिलती। किरोड़ा की घटना एक अपवाद है और कानून में जा भी परिवर्तन हो, ऐसे अपवाद होते रहेगें। जोड़े भागते रहेगें। जरूरत पड़ने पर धर्म परिवर्तन करके विवाह कर लेगें-इस्लाम व बौद्ध धर्म में गोत नात का लफडा नहीं है। फिर उच्चतम न्यायलय का फैसला है कि व्यसक लड़का व लड़की विवाह के बिना भी साथ रह सकते हैं। अगर ऐसे मामलों में खाप या जातीय पंचायत हिंसा पर उतरती है तो कानून अपना कार्य करेगा जैसा कि मनोज व बबली के हत्यारों के साथ हुआ।
जाहिर है कि सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का कोई हल नहीं होगा। समस्याएं कुछ ओर हैं जिनसे खाप के मुखियों का दूर का भी वास्ता नहीं लगता। ग्रामीण समाज तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव के साथ परम्पराओं में भी तबदीली आनी चाहिए।
समय की मांग के अनुसार अगर परम्पराओं में परिवर्तन नहीं होता तो परम्पराएं सड़ांध मारने लग जाती हैं और समाज पर बोझ बन जाती हैं। परम्पराओं और आधुनिकताओं में सही तालमेल बिठया जाना चाहिए। जिसके लिये खाप के मध्यकालीन युग की सोच के लोग तैयार नहीं है।
आज ग्रामीण समाज में गहरा संकट है। भ्रूण हत्या एक गहरी समस्या है। हरियाणा में लिंग अनुपात (861ः1000) भारत में ही नहीं, सारी दुनिया में सबसे कम है। हर बडे गॉंव में सैंकड़ों नौजवानों की शादियां नहीं हो रही। रिश्तों पर तरह-तरह की बंदिशें इस समस्या केा ओर गहन बना रही हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार महिलाओं की पूर्ति के लिये दूर दराज प्रदेशों से साल में लगभग 10,000 लड़कियां हरियाणा में लाकर बेची जाती हैं। उनकी जात व गोत्र कोई नहीं पूछता। एक अच्छी भैंस खरीदने के लिये 60 से 70 हजार रूपये खर्च करने पडते हैं। एक अच्छी लड़की 10 से 15 हजार में मिल जाती है। कई मामलों में मर्द अपनी हवस पूरी होने पर ऐसी पत्नी को आगे बेच देता है। समाज का अमानवीयकरण हो रहा है।
नई पीढ़ी में भारी भटकाव है। नशाखोरी बढ़ रही है। बेरोजगारी मुॅंह बाये खड़ी है। भ्रष्टाचार चर्म सीमा पर है। दहेज प्रथा जोर पकड रही है। दिशाहीन युवा पीढ़ी अपराध की ओर अग्रसर हो रही है और अनेक ऐसे अन्य मसले हैं जिनसे खाप के मुखियों का कोई लेना देना नहीं लगता। कौन किससे शादी करता है, महज एक मसला उनके सामने है। लगता है ग्रामीण समाज के दंबग लोग खाप परम्परा को ढाल की तौर पर इस्तेमाल करके अपना आधिपत्य जमाये रखना चाहते हैं और प्रशासन का ढुल मुल रवैया इसको बढ़ावा दे रहा है।
आज कल हयिाणा की खापों ने उग्र रुप धारण किया हुआ है। जब से कैथल के किरोड़ा गांव के मनोज बबली के हत्यारों को करनाल की अदालत द्वारा कड़ी सजा-पॉंच को फांसी और एक को उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद खाप के मुखियाओं और समर्थकों में आतंक छा गया है। इस के बाद कई स्थानों पर सर्वखाप पंचायतों का आयोजन हुआ है जिन में विभिन्न खापों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उन्होने मुख्य रुप से दो मांगें रखी हैंः सहगोत्र विवाह व सह गांव विवाह पर भारतीय विवाह अधिनियम में संशोधत करके इन पर प्रतिबंध लगाया जाये।
खापों ने धमकी दी है कि अगर उन की मांगें नहीं मानी गईं तो वे अक्तूबर 2010 में दिल्ली में होने वाले कॉमनवैल्थ गेम्स के समय दिल्ली का घेराव करेंगे और देश की राजधानी में हर प्रकार की सप्लाई रोक देंगे। याद रहे कि दिल्ली के तीन तरफ हरियाणा लगता है और उनकी धमकी असलियत में बदलती है तो एक गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। परन्तु यह गीदड़ भबकी अधिक है। पहले तो इस फैसले पर विभिन्न खापों में विरोध उभर कर आये हैं। कई मुखियाओं ने इसका खुल कर विरोध किया है। दूसरे, इन खापों का हरियाणा के ग्रामीण समाज पर न ही पहले जैसा प्रभाव है और न ही इनके पास कोई कारगर संगठन है जिस के द्वारा वे इस कार्य को पूरा कर सके।
दरअसल, खाप वर्तमान दौर में एक मरणशील व्यवस्था बन कर रह गई है। इस में महिलाओं व कमजोर वर्गों की कोई शिरकत नहीं। कुछ लम्पट युवाओं को छोड़कर युवा वर्ग भी इस से किनारा किये हुए हैं क्योकि इस वर्ग के युवा-युवती इनके फरमानों का शिकार होतें हैं। चुनी हुई पंचायतों के वजूद में आने के बाद इनका प्रभाव और प्रासंगिकता और भी कम हो गई है क्योकि संवैधानिक पंचायतों में महिलाओं और कमज़ोर वर्ग के लोगों की भागीदारी है।
हरियाणा के मुख्य राजनेताओं में किसी विचारधारा से कट्टी बधत्ता की कमी के कारण गहरी असुरक्षा की भावना है । चुंकि जीवन में कोई आदर्श और विचाारधारा ही शक्ति प्रदान करती है । इन की कमी के कारण प्रदेश के राजनेता इतने असुरक्षित महसूस करते हैं कि उन्हें अपने साये से भी डर लगता है ।
हरियाणा प्रदेश के एक यूवा सांसद नवीन जिंदल के हल्के में खाप के कुछ लोगों का जमावड़ा हुआ । इस सांसद ने विदेश में शिक्षा प्राप्त की है और देश के बडे़ औद्योगिक घराने से संबंघित है । वह राहुल ब्रिगेड के भी सदस्य हैं । वह कुछ वोटों के नुकसान की संभावना से इतना डर गये कि वह खाप की सथा में जा कर उन की मांगों का समर्थन कर बैठे और वायदा किया कि वह उनकी मांगों केा उपर तक पहुंचायेंगें ।
हरियाणा के एक अन्य महत्वपूर्ण राजनेता और प्रदेश के भूतपूर्व मुख्य मन्त्री ओम प्रकाश चौटाला ने आरंभ में खाप की मांगों का समर्थन करते हुए गॉंव के गॉंव में विवाह पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर डाली । वह हरियाणा के उस हिस्से से आते हैं जहां खाप परंपरा नहीं है और गॉंव के गॉंव में विवाह की प्रथा है । वह भूल गये कि उनके अपने गॉंव चौटाला में 200 से अधिक ऐसी शादियां हुई हैं और वे जोड़े वहां बिना किसी दिक्कत के रह रहे हैं ।
सत्ताहीन पार्टी के कई नेताओं ने खाप की दोनों मांगों का समर्थन किया है । उनका तर्क है कि खाप एक सामाजिक संस्था है और एन.जी.ओ. गैर सरकारी संस्था की तरह है । 1911 में रोहतक जिले के बरोना गॉंव में एक खाप पंचायत हुई थी जिसमें शिक्षा के प्रसार का फैसला किया गया । इस के फलस्वरूप अगले कुछ सालों में रोहतक में कई जाट शिक्षा संस्थानों की स्थापना हुई । इसमें कई प्रकार के लोगों का योगदान था परन्तु खाप की अपनी भूमिका भी । इसके कुछ सालों बाद सिसाना गॉंव में एक ऐसी ही पंचायत हुई जिसमें विवाह में फिजूल खर्ची पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया । इसके बाद पिछले पच्चास-साठ सालों में हरियाणा की किसी खाप ने कोई सामाजिक समस्या नहीं उठाई । यह खापें शादियां तुड़वाने व तरह-तरह के अल जलूल फतवे जारी करती रही है । प्रायः यह होता है कि ऐसी फैसलों की पीछे आपसी रंजिश निकालने और किसी परिवार के निष्कासन के बाद उसकी सम्पति हड़पने की अन्शा भी नजर आती है । इसके कई उदाहरण दिये जा सकते हैं । भिवानी जिले के समसपुर गॉंव में पंचायत ने एक परिवार के निष्कासन का फैसला सुना कर यह फतवा दिया कि उक्त परिवार अपनी जमीन व घर पंचायत को सोंप कर गॉंव से निकल जाये । देश का कौन सा कानून किसी संस्था को ऐसा फैसला सुनाने की इताजत देता है । ऐसा ही फैसला झज्जर के धराणा गॉंव में हुआ । कुछ लोगों की नजर एक परिवार की पच्चीस एकड़ जमीन पर थी । वहां जमीन की कीमत पच्चास लाख रूपये एकड़ है । जबकि पंचायत ने आदेश दिया कि वह परिवार अपनी जमीन पॉंच लाख रूपये एकड़ के हिसाब से बेच कर गॉंव से निकल जाये । यह दूसरी बात है कि मीड़िया व अन्य समाजसेवी संस्थाओं की कड़ी आलोचना के बाद यह फरमान अमल में नही लाये जा सके ।
खाप पंचायत को एक एन.जी.ओ. से तुलना करना हास्य स्पद है । एन.जी.ओ. एक सरकार द्वारा पंजीकृत संस्था है जिसका अपना विधान होता है और एक कार्य समिति जो इसके कामकाज की देखभाल और आगे के कामों के बारे में फैसला लेती है । खाप पंचायत में ऐसी कोई बात नहीं न ही सरकार द्वारा कोई मान्यता और न ही कोई विधान और न ही इसके संगठन में कोई चुनाव प्रक्रिया । इसके अधिकांश मुखिया स्वयंभूव नेता हैं । दरअसल आज की खाप पंचायतें व अतीत की पंचायतों में कोई मेल नहीं है । आज यह संस्था ग्रामीण समाज के कुछ दबंग लोगों के हाय में समाज में अपना दबदबा कायम रखने का एक औजार बन कर रह गई है । यह लाग आधुनिक युग की जटिलताओं से अनभिज्ञ हैं और ग्रामीण समाज में तेजी से आ रहे परिवर्तन और इसके उपजी समस्याओं का मानवीय हम खोजने की बजाय हजारों साल पुरानी परम्पराओं को ज्यों की त्यों समाज पर लादना चाहते हैं ।
चूंकि राजनेताओं द्वारा दोगली बात और इसके फलस्वरूप प्रशासन द्वारा ढुल मुल रवैया अपनाने के कारण खाप के लोग और उन द्वारा प्रेरित परिवार जन कानून को अपने हाथ में लेकर सामाजिक समरसता और कानून व्यवस्था को ढेंगा दिखा रहे हैं । राजनेताओं द्वारा यह कहना कि किसी को कानून का उल्लंघन नहीं करने दिया जायेगा और कानून अपरा काम करेगा एक अफ्फाजी के सिवा कुछ नहीं है । झज्जर जिले के धराणा गॉंव और रोहतक के खेड़ी महम गॉंव में पंचायतों को कड़ी आलोचना के बाद कड़े फतवे तो वापिस लेने पड़े परन्तु वहां विवाहित जोडों को आज भी घुसने पर प्रतिबंध है । देश का कौन सा कानून इस बात की इजाजत देता है कि किसी दम्पति को अपने गॉंव में रहने पर प्रतिबंध लगा दिया जाये जबकि किसी नागरिक को कहीं पर भी आबाद होने का संविधान में मौलिक अधिकार है । कानून अपने आप कोई काम नहीं करता । इससे कैसा काम ऐसा काम लिया जाये, यह प्रशासनिक ढांचे पर निर्भर करता है ।
केन्द्र सरकार द्वारा कानून में संसोधन करके खापों पर लगाम लगाने के बारे मेंयह भी मीडिया में प्रचारित हुआ है कि हत्या के बारे में खाप के सभी सदस्यों को जिम्मेदार ठहरा जाये । यह व्यवहारिक नहीं है । खाप कोई सुसंगठित संस्था नहीं है । इसमें सदस्यता की कोई व्यवस्था नहीं है । यह किसी मुद्दे पर इक्कठी की गई भीड़ है । हां, जो हत्या को जायज ठहराये और इस की महिमामंडप करे उसे कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए । जैसा कि दिल्ली के वजीपुर गॉंव की दो युवतियों की हत्या को हत्यारों के कई परिजनों ने सही ठहराया । हरियाणा के कैथल जिले के मटोर गॉंव के वेद पाल मोर की हत्या के पीछे बनवाला खाप के प्रधान का यह कथन कि वेद पाल को अपनी शादी की कीमत चुकानी पडे़गी, निर्णायक सिद्ध हुआ । जब वह जींद जिले के सिंघवाल गॉंव में उच्च न्यायालय के वारंट ऑफिसर व पुलिस के साथ अपनी पत्नी को लाने गया तो गॉंव की उग्र भीड़ ने उसे पीट-पीट कर मार दिया । अगर खाप के प्रधान ने उत्तेजनक ब्यान देकर लोगों को न उकसाया होता तो संभवतः वेद पाल मोर की हत्या न होती ।
कैथल जिले के किरोड़ा गॉंव के मनोज बबली की हत्या के पीछे वातावरण पैदा करने के लिये एक खाप के चौधरी गांगा राज का महत्वपूर्ण भूमिका रही और अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा भी सुनाई है । हस हत्या के कुछ दिन बाद कुरुक्षेत्र में जाटों की एक सभा में गंगा राज को ‘जाट गौरव’ के खिताब से नवाजा गया जैसा कि हत्या करना कुछ जाटों के लिये गर्व का विषय है । 13 अप्रैल 2010 को कुरुक्षेत्र में सर्वखाप पंचायत के सम्मेलन में प्रसिद्ध किसान नेता व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बलियान खाप के प्रधान चौधरी महेन्द्र सिंह रिकेत ने एक सार्वजनिक ब्यान दिया कि जो युवा युवती खाप परंपरा के विरूद्ध शादी करेंगें उन का अवश्य कत्ल किया जायेगा । इस प्रकार के व्यक्ति विशेष जो कि सम्मान के खातिर मृत्युदण्ड का खुलकर समर्थन करते हैं उस पर कानून का शिकंजा कसा जाना आवश्यक है ।
सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने जैसा इस खाप पंचायतों के गैर कानूनी फतवों पर कठोर कानून बनना आवश्यक है परन्तु यह पर्याप्त नहीं । खाप क्षेत्र जैसे सांस्कृतिक पिछवाड़े में सामाजिक सुधार और जन आंदोलन अति आवश्यक है । यह चुनौती है उन सामाजिक तत्वों के लिये जो समाज को प्रगति के पथ पर डाल कर एक समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहते हों । जहां महिलाओं और पिछड़े वर्गों को समान अधिकर हों और दबंग लागों पर आवश्यक अंकुश लग सके ।

1 thought on “खाप पंचायत – वर्तमान स्वरूप – डी.आर. चौधरी

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    Vikas Sharma says:

    देस हरियाणा बहुत बहुत आभार
    मुझ नासमझ को तो अब मालूम पड़ा हमने क्या खोया है..
    ऐसा क्या दूसरा लेख होगा इस विषय पर.. इतना परिपक्व, संतुलित और हिम्मत वाला कौन दूसरा विद्वान होगा..
    बहुत बड़ी क्षति, हाँ पर उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी पीछे रहने वालों के लिए
    नमन नमन नमन ?

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