मनुष्य की नई प्रजाति – सहीराम

सहीराम 

हम मनुष्य की नई प्रजाति हैं। हमारी खासियत यह है कि हम अपने बच्चों को खा जाते हैं। हम सांप नहीं हैं, हम कोई ऐसे बनैले जीव भी नहीं हैं, जो अपने बच्चों को खा जाते हैं। हम मनुष्य ही हैं। ऐसा नहीं है कि हम भूख के मारे अपने बच्चों को खाते हैं। यह सही है कि मनुष्यों में भुखमरी खूब पायी जाती हैं। वे पड़ों के पत्ते और छाल खाकर, आम की गुठलियां पका कर अपना पेट भरने की कोशिश करते हैं। लेकिन कहते हैं कि भूख से मरते इन मनुष्यों को अपने बच्चों की बड़ी भारी चिंता रहती है और वे अपना निवाला भी अपने बच्चों को ही देने की कोशिश करते हैं।
हम वैसे नहीं हैं। हम तो समृद्घ और संपन्न इलाके के खाते-पीते के लोग हैं। हम तो हरित क्रांतिवाले हैं। हम तो सरपलस पैदा करनेवाले हैं। फिर भी हम अपने बच्चों को खा जाते हैं। निर्ममता से उनकी हत्या कर डालते हैं और उनके खून से स्नान कर पवित्र होते हैं। हम हत्यारे हैं। हम मानवभक्षी हैं। और यह हम पूरी बशर्मी से, छाती ठोंककर कहते हैं। गर्व से कहते हैं।
हम भूख के मारे नहीं, अपनी मूंछों के लिए, अपनी इज्जत के लिए अपने बच्चों का भक्षण करते हैं। साहूकार हमें कदम-कदम पर बेइज्जत करता है, आढ़ती हमारी पगड़ी उछालता है, गांव के हमारे पंच-सरपंच और बड़े लोग अक्सर हमें अपमानित करते ही रहते हैं। नेता की ड्यौढ़ी पर जाएं तो बेइज्जत होना ही पड़ता है। कोर्ट-कचहरी में हमें खूब दुत्कारा जाता है। अफसर और बाबू लोग हमारी खिल्ली उड़ाते हैं। फिर भी हमारी मूंछें हैं और हम उन मंूछों के लिए, अपनी इज्जत के लिए अपने बच्चों का भक्षण करते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारी बिरादरी ताली बजाती है।
असल में जो इज्जत हमारी रोज उतरती रहती है, वह हमारी इज्जत नहीं है। हमारी इज्जत तो बेटी है। वह हमारा लाड़ नहीं है। उसका नाम लाड़ो हो सकता है, पर वह लाड़ नहीं, प्यार नहीं, दुलार नहीं, वह हमारा स्नेह नहीं, वात्सल्य नहीं। वह हमारी इज्जत है। वह किसी से प्यार करे, किसी का प्यार पाए, वह मोहब्बत करे, दिल लगाए, कोई उसे अपने दिल में बसाए यह हमें मंजूर नहीं। हम अपनी मर्जी से उसका शादी-ब्याह करें, गांव वालों को दिखाएं, बिरादरी को दिखाएं, नाते-रिश्तेदारों को दिखाएं कि देखो हमारी कैसी और कितनी इज्जत है। चाहे इसके लिए उसकी ससुरालवाले हमें कितना ही बेइज्जत करें। दहेज के लिए हमारी पगड़ी उछालें, चाहे हमें जूते की नोंक पर रखें। पर अगर वह हमारी मर्जी के खिलाफ जाएगी, किसी को प्यार करेगी, किसी का प्यार पाएगी तो हम उसे और उसके प्रेमी दोनों को ही मार डालेंगे, उसके खून से स्नान करेंगे, पवित्र होंगे और इस तरह अपनी इज्जत बचाएंगे। इसमें हमें खापवालों का और नेताओं का समर्थन मिलेगा और वे हमारी पीठ थपथपाएंगे। इसीलिए हम सीना तानकर, छाती ठोंककर कहते हैं कि हम अपने बच्चों को खाते हैं, हम मानवभक्षी हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि इस प्रजाति का अब निरंतर विस्तार हो रहा है। वह दिल्ली, बनारस, रांची, इंदौर हर जगह पाई जाने लगी है।

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