हम तालिबान बनना चाहते हैं – सहीराम

सहीराम 

खाप पंचायती वैसे तो तालिबान बन ही चुके थे, सब उन्हें मान भी चुके थे। लेकिन पक्के और पूरे तालिबान बनने की उनकी इच्छा ने इतना जोर मारा कि उन्होंने फौरन ही एक साझा पंचायत बुला ली और जल्द से जल्द पक्के और पूर्ण तालिबान बनने के उपाय तलाशने लगे। एक पंचायती का सुझाव था कि तालिबान बनने के लिए प्यार-मोहब्बत खत्म करना सबसे जरूरी है। यह हमें भी पता है-पंचायत में से कई आवाजें एक साथ उठी-ज्यादा तीस मारखां बनने की कोशिश मत करो। तो फिर कुछ ऐसा करो यारो-वह पंचायती एकदम ढ़ीठ निकला और हुटिंग से बिल्कुल भी नहीं घबराया, बल्कि उसने फिर ललकार लगायी-कि प्यार-मोहब्बत का कोई फसाना ही न बने।
एक दूसरे पंचायती ने थोड़ी गंभीरता दिखाते हुए कहा-देखो, प्यार-मोहब्बत तो सब करते हैं। उसके गंभीरता दिखाने की इस अदा से एक दूसरा पंचायती चिढ़ गया और उसने तुरंत उठकर उसकी बात काट दी-सब कौन करता है? तुमने किया होगा, हमने तो नहीं किया। ऐसी गलत बातें यहां मत करो। उसकी इस टोका-टोकी पर जबर्दस्त तालियां और सीटियां बजी। देखो-गंभीर बने उस पंचायती ने तुरंत ही डिप्लोमैटिक पलटी खायी और सफाई देते हुए बोला-मुझे खुशी है कि प्यार-मोहब्बत के हम इतने खिलाफ हैं। पर मैं तो यह कह रहा था कि आजकल प्यार-मोहब्बत कुछ ज्यादा ही हो गया है। जिधर देखो उधर प्यार-मोहब्बत। किताबें पढ़ो तो प्यार-मोहब्बत। फिल्में देखो तो प्यार-मोहब्बत और टेलीविजन खोलो तो प्यार-मोहब्बत।
नहीं-टोकनेवाले पंचायती ने कहा-ऐसा बिल्कुल नहीं है। इश्क अब तक काफी कमीना हो चुका है। खुद आशिक, माशुकाओं का कत्ल कर रहे हैं। कोई लडक़ी किसी मजनूं को शादी से इंकार देती है, तो वह फौरन चाकू मार देता है। अखबार नहीं पढ़ते क्या? वहां तो बलात्कार भी खूब है। हमें ऐसे टुच्चे आशिकों और बलात्कारियों पर भरोसा रखना चाहिए। हां-वह पंचायती हार मानने के लिए तैयार नहीं था-यह बात तो ठीक है, फिर भी प्यार-मोहब्बत बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इससे हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं। तो ठीक है, फिर सबसे पहले किताबें ही जलाओ-तालियां बटोरने से उस टोकनेवाले पंचायती के हौसले बुलंद थे-फिल्म और टेलीविजन बंद कराओ।
देखो-एक और पंचायती ने कुछ अनुभवी दिखने की कोशिश करते हुए कहा-भविष्य में जब हम पूरे और पक्के तालिबान बन जाएंगे, तब वो भी करेंगे। पर अभी वो सब करने की जरूरत नहीं। वो करनेवाले दूसरे बहुत हैं। वैसे तो लोग उन्हें भी तालिबान ही कहते हैं। पर हमें तो पक्का और पूरा तालिबान बनना है, उसका उपाय करो। लेकिन प्यार-मोहब्बत का खात्मा करने का काम तो हम बरसों से कर ही रहे हैं-एक और पंचायती बोल पड़ा-उनके परिवारवालों का हुक्का-पानी बंद कर देते हैं। उन्हें गांव से निकाल देते हैं। उनकी हत्या का फरमान तक जारी करते हैं। इन फरमानों का पालन भी होता है। फिर भी यह प्यार-मोहब्बत का यह रोग बढ़ता ही जा रहा है।
उसकी बात में दम था। इस पर एक पंचायती ने फडक़ता हुआ सुझाव दिया-देखो भाइयो, हमारे फरमान से जो हत्याएं होती हैं, उनका ठीक से प्रचार नहीं हो पाता। देखा नहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तानवाले तालिबान उन लड़कियों और औरतों को कैसे सरेआम कोड़े लगाते हैं,जो गैर-मर्द के साथ घर के बाहर कदम भी रखती हैं। इस पर जोरदार तालियां बजी और कोड़े मारो-कोड़े मारो की आवाजें आने लगी। कोड़े मारने से कुछ नहीं होगा-एक पंचायती ने गंभीरता से कहा-जब हत्याएं करने से प्यार-मोहब्बत काबू नहीं आ रहा, तो कोड़े मारने से कैसे काबू आएगा? तो कोड़े मारकर ठांय से गोली भी मार देनी चाहिए-पंचायत में से आवाजें आयी। हां, हां की आवाजें फिर गूंज उठी। मेरा सुझाव है-उस पंचायती ने कहा-कि हमें पीट-पीटकर मारने और ठांय से गोली मारने की वीडियो फिल्में बनानी चाहिए और ये फिल्में चैनलों को देनी चाहिए।
इस पर एक डरपोक पंचायती ने कहा-लेकिन पुलिस है, कानून है, सरकार है। सब जेलों में ठूंस दिए जाएंगे। पंचायत कायर-कायर की आवाजों से गूंज उठी। इसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिए-एक मुखिया टाइप पंचायती ने कहा-पुलिस और सरकार इस पंगे में नहीं पड़ती। इतनी हत्याएं हमारे फरमानों पर हुयी, बताओ कौन पकड़ा गया। फिर हमारे पास अपनी सामाजिक परंपराओं की, अपनी संस्कृति की दुहाई भी तो है। यह संस्कृति क्या होती है-किसी ने बीच में टोक दिया। कुछ नहीं होती-मुखिया टाइप उस पंचायती ने उसे चुप करा दिया-तू उसकी चिंता मत कर। ऐसा सिर्फ कहा जाता है। समाज-संस्कृति की दुहाई के बाद कोई नेता इस पचड़े में नहीं पड़ेगा। न सरकार का, न विपक्ष का। सबको अपने वोट की चिंता रहती है। पर हमारे पास वोट कहां हैं-उस डरपोक पंचायती ने फिर कहा-आज तक हम तो पंच भी नहीं चुने गए। हमें तो हमारे घरवाले भी वोट नहीं देते। पंचायत में एक पल को खामोशी छा गयी।

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