शिवकुमार मिश्र

पितृतुल्य प्रो. शिव कुमार मिश्र – ओम सिंह अशफाक

शिवकुमार मिश्र

शिव कुमार मिश्र (2-2-1931—21-6-2013) जी का जाना हिन्दी जगत में सक्रिय विमर्श और रचनात्मक आलोचना के एक स्तम्भ का उखड़ जाना है। समकालीन परिदृश्य में इस वय में बहुत कम आलोचक होंगे, जो पूरे भारत का भ्रमण करते हुए साहित्यिक विमर्श में संलग्र होकर नई पीढ़ी और युवा रचनाकारों का मार्गदर्शन करते हुए उनके प्रेरणा स्त्रोत बन जाने की क्षमता रखते हैं। मिश्र जी ऐसे ही थे। उनका लेक्चर सुनते हुए एक सामान्य पाठक की रचनात्मकता भी जाग उठती थी और उसके अंदर का रचनाकार कुछ लिखने के लिए कसमसाने लगता था। यही वजह थी कि उनके व्याख्यान सुनने के लिए गैर-विभागीय और विभागेत्तर श्रोता भी दौड़े चले आते थे।

      मेरे साथ भी कई बार ऐसा ही हुआ है। जब भी पता लगता कि प्रो. मिश्र जी किसी अन्य कार्यवश कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आए हुए हैं, तो कोई मंच अथवा फोरम उनका लेक्चर अवश्य आयोजित कर लेता था और मुझे भी उसकी भनक लग जाती थी। सो, मैं दौड़ पड़ता था। मजे की बात यह थी कि चाहे कितना लम्बा लेक्चर हो, कोई श्रोता न तो सुस्त होता था और न ही बाहर जाता था। सब मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते और मिश्र जी लगाकार अपने अध्ययन और अनुभवजन्य ज्ञान की पोटली खोलते जाते थे। वह ब्राह्मणवादी-कृपणता से एकदम विपरीत थे, जिसमें ज्ञान को संचित करके अपने पास ही रखा जाता था।

      मिश्र जी की विशेषता यह भी थी कि वे हमेशा अलिखित व्याख्यान ही दिया करते थे। यूं लिखने का सहारा लेकर बोलना भी कई विद्वानों का स्टाईल होता हे। उसका ये फायदा भी है कि वक्ता से कोई बिन्दू छूट जाने की आशंका नहीं रहती है, लेकिन उसकी एक दिक्कत ये भी हो सकती है कि श्रोताओं की एकाग्रता में व्यवधान पड़ते रहने का जोखि़म रहता है।

      खैर, मिश्र जी का स्मृति भंडार इतना व्यापक था कि उनको किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती थी। उनको सब कुछ कंठस्थ था और उसी के साथ वे अपने नए अनुभवों और नवीन शोधों के निष्क र्ष को जोड़ लिया करते थे। पता नहीं मुझ जैसे कितने अनगढ़ श्रोताओं को मिश्र जी ने रचना के लिए प्रेरित किया होगा। मुझे लगता है कि मैं आज जो भी हूं ये मिश्र जी की देन है। सन् 2001 की घटना है। मिश्र जी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आए हुए थे। उसका लाभ उठाते हुए कुछ मित्रों ने एक कविता गोष्ठी कर डाली-शायद डॉ० ओ.पी. ग्रेवाल के निवास पर हुई थी। उस वर्ष 26 जनवरी के दिन गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया था जिसमें अरबों-खरबों की सम्पति के नुकसान से बड़ा एक और नुकसान हुआ था। वह यह कि गणतन्त्र की प्रभातफेरी निकालते हुए 400 स्कूली बच्चों का जुलूस एक भवन की दीवार के मलबे में दबकर प्राणविहीन हो गया था। मेरे लिए उस विनाश लीला की ये सबसे बड़ी त्रासदी थी, जिसने मुझे विचलित किया और ‘भूकम्प में बच्चे’ शीर्षक से एक कविता लिखी गई। यही कविता मैंने मिश्र जी के समक्ष उस गोष्ठी में सुनाई, जिसे सुनकर मिश्र जी ने वह कविता मुझसे लेकर अपने पास रख ली और गुजरात जाकर वहां की साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित किसी ‘भूकम्प रोधी कविता सम्मेलन’ में अपने किसी शोध छात्र के माध्यम से उस कविता की प्रस्तुति करवाई, जिसने श्रोताओं की संवेदना को झकझोर कर रख दिया।

      ये बात मिश्र जी ने अगली बार कुरुक्षेत्र आगमन पर बताई और मुझसे पूछा कि क्या गुजरात अकादमी के निदेशक का कोई पत्र आपको नहीं मिला? मेरे नकारात्मक उत्तर से वे कुछ दुखी हुए और बताया कि निदेशक ने उसी सम्मेलन में वह कविता प्रकाशन हेतु उनसे ले ली थी और मुझे पत्र लिखकर प्रकाशन की स्वीकृति लेने का आश्वासन भी दिया था।

      खैर, इस घटना ने मुझे प्रेरित किया और उसी शीर्षक से मैंने अपनी 35 कविताओं का एक संग्रह उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली से सन् 2003 में निकलवाया, जिसकी बहुमूल्य भूमिका लिखने का आग्रह भी प्रो. मिश्र जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था, बावजूद उनकी तमाम व्यस्तताओं के। ऐसे थे मिश्र जी। समकालीन दौर में कविता के समक्ष मौजूद संकट और मिश्र जी कविता से क्या अपेक्षा करते थे, यह उनके निम्न उद्धृत गद्यांश से स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है :

      ‘बाजारवाद के वर्तमान माहौल में जब सब कुछ आयोजित प्रायोजित होकर उपभोक्ता वस्तुओं के रूप में उपभोक्ताओं के सामने परोसा जा रहा हो, वस्तु से अधिक उसके विज्ञापन और उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो उठा हो, साहित्य, कला, संस्कृति सब इस बाजारवादी सम्मोहन की चपेट मेें आ गए हों, कविता जैसी विधा पर छाए संकट का अनुमान किया जा सकता है। उन अपवादों को छोड़ दें, जिनके तहत विपरीत स्थितियों में भी समर्पित और प्रतिबद्ध रचनाकार कविता की साख को बनाए और बचाए हुए हैं अन्यथा कविता जब श्रीमंतों के शुभागमन के कसीदे पढ़ रही हो या हमारे आसपास और पूरे विश्व में आए दिन घट रहे तमाम कुछ रोमांचक और भयावह को निहायत ठंडेपन के साथ, महज सूचनाओं के रूप में पेश कर रही हो, ऐसी रचनाओं का सामने आना, जिनमें समय की शक्ल को उसकी आंखों में आंखें डाल कर पहचानने की कोशिश की गई हो, उसकी क्रूरता और उसके हिंसक तेवरों को आदमीयत के सारे तकाजों के साथ उजागर किया गया हो, कितना प्रीतिकर अनुभव हो सकता है, आसानी से समझा जा सकता है।‘ 1

      हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक और चिंतक डॉ० शिव कुमार मिश्र जी का 21 जून 2013 को अहमदाबाद के एक अस्पताल में देहावसान हो गया, जहां उनका पिछले 15 दिनों से इलाज चल रहा था। डॉ० शिव कुमार मिश्र का जन्म कानपुर में 2 फरवरी, 1931 को हुआ था। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से एम.एम., पी.एच.डी., डी.लिट की तथा आगरा विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री प्राप्त की। डॉ० मिश्र ने 1959 से 1977 तक सागर विश्वविद्यालय में हिन्दी के व्याख्याता तथा प्रवाचक के पद पर कार्य किया। 1977 से 1991 तक उन्होंने सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्ल्भविद्यानगर (गुजरात) के हिन्दी विभाग में सफलतापूर्वक कार्य किया। उनके 30 वर्षों के शोध निर्देशन में लगभग 25 छात्रों ने पी.एच.डी. की उपाधि हासिल की। डॉ० मिश्र को उनकी मशहूर किताब ‘माक्र्सवादी साहित्य चिंतन’ पर 1975 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। भारत सरकार की सांस्कृतिक अदान-प्रदान योजना के तहत 1990 में उन्होंने सोवियत यूनियन का दो सप्ताह का भ्रमण किया। मिश्र जी ने जनवादी लेखक संघ के गठन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, आपातकाल के अनुभव के बाद अलग संगठन बनाने का एक विचारधारात्मक आग्रह सबसे पहले उनकी तरफ से आया था। वह उसके संस्थापक सदस्य थे। वह जयपुर सम्मेलन में 1992 में ‘जलेस’ के महासचिव और पटना सम्मेलन (सितम्बर 2003) में ‘जलेस’ के अध्यक्ष चुने गए और तब से निधन तक वह उसी पद पर अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे थे। अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वह अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता पर अडिग रहे। भारत की कम्पयूनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी के वह सदस्य थे। मिश्र जी हिन्दी के शीर्षस्थ आलोचकों में से एक थे। उनकी पुस्तकों में से प्रमुख हैं- ‘नया हिन्दी काव्य’, ‘यथार्थवाद’, ‘प्रेमचंद : विरासत का सवाल’, ‘दर्शन साहित्य और समाज’, ‘भक्तिकाव्य और लोक जीवन’, ‘आलोचना के प्रगतिशील आयाम’, ‘साहित्य और सामाजिक संदर्भ’, ‘माक्र्सवाद देवमूर्तियां नहीं गढ़ता’ आदि। उन्होंने ‘इफको’ नाम की कोआप्रेटिव सेक्टर कम्पनी के लिए दो काव्य संकलनों के सम्पादन का भी शोधपूर्ण कार्य भी किया। पहला संकलन था- ‘आजादी की अग्निशिखाएं’ और दूसरा ‘संतवाणी’। मिश्र जी के निधन से हिन्दी साहित्य व समाज के लिए अपूर्णीय क्षति हुई है। जनवादी लेखक संघ ने मिश्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है तथा उनके परिवारजनों व मित्रों के प्रति संवेदना प्रकट की है।2

संदर्भः

  1. भूमिका, भूकम्प में बच्चे, पृ० 9, उद्भावना, दिल्ली-1
  2. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ के प्रैस नोट का अंश

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