सआदत हसन मन्टो और विभाजन की त्रासदी – रमणीक मोहन

मोहन रमणीक

15 अगस्त का दिन हमारे लिए ख़ुशी का दिन है। मगर यह हमें उस ऐतिहासिक त्रासदी की भी याद दिलाता है जिसे हम मुल्क के बंटवारे या विभाजन के नाम से जानते हैं। इस त्रासदी का जो असर सआदत हसन मन्टो पर पड़ा और जो असर उन की रचनाओं ने हम पर छोड़ा,वो  शायद हिन्दी-उर्दू साहित्य के बाकी सब लेखकों और उन की रचनाओं के असर से बिल्कुल अलग और अनोखाहै। कृष्ण चन्दर, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती के नाम तो फ़ौरी तौर पर याद आते हैं। इन के अलावा और भी कई लेखकों के नाम गिनवाए जा सकते हैं, और इन सब की रचनाएँ हम पर एक भरपूर असर छोड़ती हैं। लेकिन मन्टो हमें विभाजन की त्रासदी पर लिखने वाले सब लेखकों के बीचअपनी मुख़्तलिफ़ पहचान के साथखड़े दिखाई देते हैं।उसत्रासदी की दर्दनाक और शर्मनाक घटनाओं का मन्टो द्वारा किया गयाचित्रण उन हालात में सरगरमऔर फंसे हुए इन्सान के दिलो-ओ-दिमाग़-ओ-रूह के अन्दर तक की तसवीर जैसे हमारे सामने रख देता है।उस की हैवानियत और इन्सानियत, दोनों हमारे सामने आते हैं– हालाँकि कहा जा सकता है कि पहला रूप दूसरे पर शायद कुछ हावी दिखाई देता है।महसूस होता है कि जैसे लेखक ने इन दोनों रूपों को आत्मसात कर लिया है, एक-एक किरदार को अन्दर तक महसूस करते हुए पेश किया है– लेकिन मन्टो हमें दूर खड़े, हालात का जायज़ा लेते, उन पर टिप्पणी करतेहुए भी महसूस होते हैं।

            ‘सियाह हाशिए’, ‘खोल दो’, ‘ख़ुदा की क़सम’, ‘राम खिलावन’, ‘शरीफऩ’, ‘सहाय’, ‘गुरमुख सिंह की वसीयत’, ‘टोबा टेक सिंह’औरऐसी ही कुछ अन्य रचनाएँविभाजन की त्रासदी के साहित्यिक चित्रण के बेहतरीन नमूने हैं। इन में से कुछ-एकके ही अंश इस बात को साबित करने के लिए काफ़ी होंगे।

            ‘स्याह हाशिए’ छोटी कहानियों की एक लड़ी है। कुछ तो बस दो-दो, चार-चार लाइनों की ही हैं –इन्हें कहानियों की बजाय हालात का मुख़्तसर अफ़सानवी बयान कहा जाए तो शायद बेहतर होगा, अंग्रेज़ी में कहें तो ये स्नैपशॉट्स हैं। इन में एक तीखापन है, पिस्तौल से निकली गोली की तेज़ी और चोट है, ख़ौफज़दा इन्सान के मुख से निकली चीख़ की चौंक है, डरे-सहमे-घिग्घी बन्धे-नि:सहाय आदमी के लिए सहानुभूति, दया और संवेदना है। सब से बढ़ कर, तीखी चोट करता व्यंग्य है– बेमिसाल तंज़ और कटाक्ष,जो ‘स्याह हाशिए’ – और मन्टो –को एक अलग पहचान देता  है।

पेश हैं कुछ नमूने:

दावत-ए-अमल – “आग लगी तो सारा महल्ला जल गया। सिफऱ् एक दूकान बच गई, जिस की पेशानी पर यह बोर्ड लटका हुआ था: ‘यहाँ इमारतसाज़ी का सब सामान मिलता है।’”

ख़बरदार –”बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीट कर बाहर लाए। कपड़े झाड़कर वो  उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा: ‘तुम मुझे मार डालो, लेकिन ख़बरदार जो मेरे रुपए-पैसे को हाथ लगाया….”

हमेशा की छुट्टी–”पकड़ लो… पकड़ लो…. देखो जाने न पाए।” शिकार थोड़ी सी दौड़-धूप के बाद पकड़ लिया गया। जब नेज़े उस के आर-पार होने के लिए आगे बढ़े तो उस ने काँपती आवाज़ में गिड़गिड़ा कर कहा: ‘मुझे न मारो…. मैं छुट्टियों में अपने घर जा रहा हूँ।”

जूता – हुजूम ने रुख़ बदला और सर गंगाराम के बुत पर पिल पड़ा। लाठियाँ बरसाई गईं, ईंटें और पत्थर फैंके गए; एक ने मुँह पर तारकोल मल दिया; दूसरे ने बहुत से पुराने जूते जमा किए और उन का हार बना कर बुत के गले में डालने के लिए आगे बढ़ा कि पुलिस आ गई और गोलियाँ चलनी शुरू हो गईं – जूतों का हार पहनाने वाला जख़़्मी हो गया; चुनांचे मरहम-पट्टी के लिए उसे सर गंगाराम हस्पताल भेज दिया गया।”

पेशबन्दी– “पहली वारदात नाके के होटल के पास हुई। फौरन ही वहाँ एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया। दूसरी वारदात दूसरे ही रोज़ शाम को स्टोर के सामने हुई। सिपाही को पहली जगह से हटा कर दूसरी वारदात के मक़ाम पर तैनात कर दिया गया। तीसरा केस रात के बारह बजे लाण्डरी के पास हुआ। जब इन्स्पेकटर ने सिपाही को इस नई जगह पहरा देने का हुक्म दिया तो उस ने कुछ देर ग़ौर करने के बाद कहा: ‘मुझे वहाँ खड़ा कीजिए जहाँ नई वारदात होने वाली है…..!”

उलाहना–”देखो यार, तुम ने ब्लैक मार्केट के दाम भी लिए और ऐसा रद्दी पेट्रोल दिया कि एक दुकान भी न जली….”

आराम की ज़रूरत–”मरा नहीं…. देखो, अभी जान बाक़ी है!” “रहने दे यार…. मैं थक गया हूँ!”

ये लघु कथाएँ विभाजन की त्रासदी के दिनों में हमारे मुल्क की सड़कों और गलियों के हालात का चलता-फिरता बयानहैं। किरदार बेनाम हैं लेकिन पहचान से परे नहीं हैं। ये ख़ास हालात में ज़ाहिर तौर पर सामने आने वाली इन्सानी फि़तरत के सशक्त नमूने हैं।

            इन्हीं हालात का बयान कहानी ‘खोल दो’भी करती है।यहाँ किरदार बेनाम नहीं रह जाते और हम उन के साथ एक करीबी रिश्ता बनाते हैं। सकीना, और पागलों की तरह उस की तलाश करता उस का बाप सिराजुद्दीन, हमारे लिए उन तमाम लोगों के नुमाइंदे बन जाते हैं जो उस बड़ी ऐतिहासिक ट्रैजेडी के शिकार हुए थे। विभाजन के नतीजे में इधर से उधर और उधर से इधर आती-जाती आबादियों और जगह-जगह लोगों को सम्भालने के लिए लगे कैम्पों का जो ख़ाका यह कहानी खैंचती है, वो भटकती हुई इन्सानियत को हमारे सामने लाता एक नज़ारा है। बाप बेटी को खोज रहा है – “पूरे तीन घण्टे वो ‘सकीना….. सकीना….’ पुकारता कैम्प की ख़ाक छानता रहा मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न चला – चारों तरफ़ एक धांधली सी मची हुई थी। कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई माँ, कोई बीवी और कोई बेटी।….. सिराजुद्दीन को हमदर्दी की ज़रूरत थी, लेकिन चारों तरफ़ जितने भी इन्सान फैले हुए थे, सब को हमदर्दी की ज़रूरत थी – उस ने रोना चाहा मगर उस की आँखों ने उस की मदद न की। आँसू न जाने कहाँ ग़ायब हो गए थे।” नौजवान स्वयंसेवकों की मदद और भरोसे पर निर्भर बाप,इस बात से अन्जान कि सकीना उन्हीं की हवस का शिकार हो चुकी है, जब आखिऱ उसे पा लेता है और ख़ुशी के मारे चिल्लाता है, “जि़न्दा है… मेरी बेटी जि़न्दा है…”तो अस्पताल का डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में ग़कऱ् हो जाता है। क्योंकि सिराजुद्दीन तो मारे ख़ुशी के चिल्ला रहा था मगरअपनी इज़्ज़त और आबरू से हाथ धो बैठी, ख़ुद से बेख़बर सकीना अब असल मेंएक जि़न्दा लाश थी। यह कहानी भटकी और भटकती इन्सानियत का बेहतरीन साहित्यिक वृत्तान्त है।

            इधर सिराजुद्दीन सकीना की तलाश में था, और उधर अधेड़ उम्र की पटियाले की रहने वाली एक मुसलमान बुढिय़ा अपनी बेटी से बिछुड़ गईथी। वो भी बेटी की तलाश में है। और एक लायज़ाँ अफ़सर के लफ्ज़़ों में, वे भी अपहृत औरतों की तलाश में “मारे-मारे फिरते हैं; एक शहर से दूसरे शहर; एक गाँव से दूसरे गाँव, फिर तीसरे गाँव, फिर चौथे; गली-गली, महल्ले-महल्ले, कूचे-कूचे।” वो  कहता है, “बॉर्डर के उस पार कई फेरे हुए और हर बार मैंने उस पगली को देखा – अब वो  हड्डियों का ढांचा रह गई थी; बीनाई कमज़ोर हो चुकी थी; टटोलकर चलती थी; उस की तलाश जारी थी, बड़े ज़ोर-शोर से।” यह मुसलमान बुढिय़ा उसे कभी जालन्धर की बस्तियों में तो कभी सहारनपुर के लारियों के अड्डे पर तो कभी अमृतसर की सड़कों पर अपनी बेटी की तलाश में घूमती दिखाई देती है। वो  यह मानने को तैयार नहीं है कि उस की बेटी बंटवारे के इस ज़लज़ले में मर-खप गई होगी – उस के इस पक्के यकीन की बुनियाद वो इन लफ्ज़़ों में बयान करती है – “वो ख़ूबसूरत है…. इतनी ख़ूबसूरत है कि उसे कोई क़त्ल नहीं कर सकता….. उसे कोई तमाचा तक नहीं मार सकता….!” और वो लायज़ाँ अफ़सर सोच रहा है, “मगर इस तूफ़ान में कौन सी ख़ूबसूरती है जो इन्सान के खुरदरे हाथों से बची है…..” सिराजुद्दीन जब अपनी बेटी को पाता है तो ये खुरदरे हाथ उस तक पहुँच चुके होते हैं। हमें नहीं मालूम कि इस पगला गई बुढिय़ा की बेटी, जिसे वो भाग भरी के नाम से पुकारती है, के साथ भी ऐसा हुआ या नहीं। मगर जब वो उसे मिलती है, एक सिख नौजवान के साथ,तो मौत का एक और रूप हमारे सामने आता है। नौजवान और घूंघट काढ़े हुए वो लड़की हाथ में हाथ लिए जब उस बुढिय़ा के पास से गुजऱते हैं, तो नौजवान उस का ध्यान उस की ओर दिलाता है – “तुम्हारी माँ….!” लड़की सिख नौजवान का बाज़ू पकड़ कर भिंचे हुए लहजे में कहती है, “चलो…” और वे दोनों सड़क से जऱा उधर हट कर तेज़ी से आगे निकल गए, और पगली बुढिय़ा चिल्लाती है, “भाग भरी….. भाग भरी!” मौके की नज़ाकत को देखते हुए लायज़ाँ अफ़सर पहले की ही तरह उसे समझाने की कोशिश करता है – “वो मर-खप चुकी है माई!” “तुम झूठ कहते हो!” लायज़ाँ अफ़सर कहता है –’इस मर्तबा मैंने उस को पूरा यकीन दिलाने की ख़ातिर कहा: “मैं ख़ुदा की क़सम खा कर कहता हूँ, वो मर चुकी है….!” यह सुनते ही पगली चौक में ढेर हो गई।’ कहानी का नाम – ख़ुदा की क़सम!

            अब दो ख़ास रचनाओं की बात, जिन में कहानी और यथार्थ की आँख-मिचोली के बीच विभाजन की टीस और दर्द मन्टो के अपने, व्यक्तिगत दर्द और टीस में तबदील होती दिखाई देते हैं।  ये हैं कहानी ‘सहाय’ तथा लेख ‘मुरली की धुन’ जो मन्टो के करीबी दोस्त, उस ज़माने के मशहूर फि़ल्म एक्टर श्याम की शख़्सीयत पर केन्द्रित है।

            ‘मुरली की धुन’ मेंमन्टो बंटवारे के बाद श्याम से लाहौर में कुछ देर की मुलाक़ात का हाल बयान करते हैं तो सरहद ने जो सितम ढाया था, इन अल्फ़ाज़ में ज़ाहिर होता है: “श्याम की हालत अजीब-ओ-गऱीब थी… उस …. लाहौर में  ……जिस का फ़ासला अब अमृतसर से हज़ारों मील हो गया था। और उस का रावलपिण्डी कहाँ था, जहाँ उस ने अपने लड़कपन के दिन गुज़ारे थे? लाहौर, अमृतसर और रावलपिण्डी, सब अपनी-अपनी जगह पर थे, मगर वो दिन नहीं थे। वो  रातें नहीं थीं, जो श्याम यहाँ छोड़ कर गया था, सियासत के गोरकन ने उन्हें नामालूम कहाँ दफ्ऩ कर दिया था।”

            इसी लेख में मन्टो श्याम के साथ बीती उन दिनों की एक शाम को याद करते हैं जब दोस्त भी दोस्त दिखाई देने बन्द हो गए थे: “श्याम और मैं रावलपिण्डी से भागे हुए एक सिख ख़ानदान के पास बैठे थे। वे लोग अपने ताज़ा जख़़्मों की रूदाद सुना रहे थे जो बहुत ही दर्दनाक थी। श्याम मुत्तासिर हुए बग़ैर न रह सका। वो हलचल जो उस के दिल-ओ-दिमाग़ में मच रही थी, उस को मैं बख़ूबी जानता था। जब हम वहाँ से रुख़्सत हुए तो मैंने श्याम से कहा: ‘मैं मुसलमान हूँ…. क्या तुम्हारा जी नहीं चाहता कि मुझे क़त्ल कर दो?’

            श्याम ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया: ‘इस वक़्त नहीं…. लेकिन उस वक़्त जब कि मैं मुसलमानों के ढाए हुए ज़ुल्मों की दास्तान सुन रहा था, मैं तुम्हें क़त्ल कर सकता था।’

            बकौल मन्टो, “श्याम के मुँह से यह सुन कर मेरे दिल को ज़बरदस्त धक्का लगा। उस वक़्त शायद मैं भी उसे क़त्ल कर सकता था, मगर बाद में जब मैंने सोचा और उस वक़्त और इस वक़्त में ज़मीन-ओ-आसमान का फ़कऱ् महसूस किया तो उन तमाम फ़सादात का नफ़्िसयाती पसमंजऱ [यानी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि]मेरी समझ में आ गया जिस मेंरोज़ाना सैंकड़ो बेगुनाह हिन्दू और मुसलमान मौत के घाट उतारे जा रहे थे।”

            ज़ाहिर है कि इस घटना ने मन्टो पर अपना भरपूर असर छोड़ा।इसी लिए तीन दोस्तों, मुमताज़, ब्रजमोहन और जुगल की कहानी ‘सहाय’ में यह घटना अपने अफ़सानवी अवतार में फिर से हमारे सामने आती है। मन्टो लिखते हैं –

            “जुगल को लाहौर से ख़त मिला कि फ़सादात में उस का चचा मारा गया है तो उसे बहुत सदमा हुआ, चुनांचे इसी सदमे के ज़ेरे-असर बातों-बातों में एक दिन उस ने मुमताज़ से कहा: ‘मैं सोच रहा हूँ, अगर हमारे महल्ले में फ़साद शुरू हो जाए तो मैं क्या करूँगा…!’

            मुमताज़ ने उस से पूछा, ‘क्या करोगे…..?’ जुगल ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया, ‘मैं सोच रहा हूँ…. बहुत मुमकिन है, मैं तुम्हें मार डालूँ….’ यह सुन कर मुमताज़ बिलकुल ख़ामोश हो गया। उस की यह ख़ामोशी तकरीबन आठ रोज़ तक क़ायम रही और उस वक़्त टूटी जब उस ने अचानक हमें बताया कि वो पौने चार बजे समुन्दरी जहाज़ से कराची जा रहा है।’

            इसी तरह लम्बी उधेड़ बुन के बाद लेकिन अचानक मन्टो नेबिलआखिऱ बम्बई छोडऩे का फ़ैसला किया था।मन्टो शायद हालात से पस्त हो कर बम्बई छोड़ कराची जाने पर मजबूर हुए थे– सन सैंतालीस में नहीं, बल्कि सन अड़तालिस में, जब कि वे उस से पहले भी ऐसा कर सकते थे क्योंकि उन की बीवी विभाजन से पहले ही लाहौर जा चुकी थीं – उस वक़्त जब उन के ख़्वाब-ओ-खय़ाल में भी न था कि वे वहीं के हो रहेंगे। ‘मुरली की धुन’ में वे लिखते हैं – “मैंने बहुत ग़ौर-ओ-फि़क्र किया मगर कुछ समझ में न आया। आखिऱ तंग आ कर मैंने कहा, हटाओ, चलें यहाँ से।”फिर वे श्याम के साथ बीते आखऱी लम्हों काख़ुलासा करते हैं, और बंटवारे के दर्द की झलक इस जुदाई के दर्द में दिखाई देती है– मगर ख़ास बात यह भी है कि दोनों एक-दूसरे के फ़ैसले की क़द्र करते हैं।

            बकौल मन्टो, “मैंने अपना अस्बाब वग़ैरह बांधना शुरू कर दिया। सारी रात इसी में गुजऱ गई। सुबह हुई तो श्याम शूटिंग से फ़ारिग़ हो कर आया। उस ने मेरा बंधा हुआ अस्बाब देखा तो मुझ से सिफऱ् इतना पूछा – ‘चले?’ मैंने भी सिफऱ् इतना ही कहा – ‘हाँ।’

            इस के बाद मेरे और उस के दर्मियान हिजरत के बारे में कोई बात न हुई। बकाया सामान बंधवाने में उस ने मेरा हाथ बंटाया… जब मेरे रुख़्सत होने का वक़्त आया … तो उस ने क़हक़हे लगाते हुए मुझे अपने चौड़े सीने के साथ भींच लिया – ‘सूअर कहीं के…..’

            मैंने अपने आँसू रोके – ‘पाकिस्तान के…’

            श्याम ने पुरख़ुलूस नारा बुलन्द किया – ‘जि़न्दाबाद पाकिस्तान!’ ‘जि़न्दाबाद हिन्दुस्तान’ – और मैं नीचे चला गया, जहाँ ट्रक वाला मेरा इंतिज़ार कर रहा था। बन्दरगाह तक श्याम मेरे साथ गया।”

            ‘मुरली की धुन’ में ही14 अगस्त 1947 के दिन का वृत्तान्त भी विभाजन की चोट को नुमायाँ करता है। “14 अगस्त का दिन मेरे सामने बॉम्बे में मनाया गया। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों आज़ाद मुल्क कऱार दिए गए थे। लोग बहुत मसरूर थे, मगर क़त्ल और आग की वारदातें बाकायदा जारी थीं। ‘हिन्दुस्तान जि़न्दाबाद’ के साथ-साथ ‘पाकिस्तान जि़न्दाबाद’ के नारे भी लगते थे। कांग्रेस के तिरंगे के साथ इस्लामी परचम भी लहराता था…. समझ में नहीं आता था हिन्दुस्तान अपना वतन है या पाकिस्तान। और वो लहू किस का है जो हर रोज़ इतनी बेदर्दी से बहाया जा रहा है।…… हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया था, पाकिस्तान आलम-ए-वजूद में आते ही आज़ाद हो गया था लेकिन इन्सान इन दोनों मम्लुकतों में ग़ुलाम था। तास्सुब का ग़ुलाम, मज़हबी जुनून का ग़ुलाम, हैवानियत व बरबरियत का ग़ुलाम।”

            इस मार्मिक वृत्तान्त के बाद कहने को कुछ नहीं रह जाता, मगर ‘टोबा टेक सिंह’ का जि़क्र हुए बिना बात ख़त्म नहीं हो सकती। यह शाहकार कहानी उन लोगों के दर्द को आवाज़ देती है, जिन के लिए आबादियों का उखड़ कर इधर से उधर जाना और उधर से इधर आना पागलपनथा, और जो समझ ही न पाए कि मुल्क का बंटवारा हुआ क्यों। यह उन लोगों की कहानी है जो अपनी पहचान की तलाश में हैं, जिन के लिए एक मुल्क से दो बन जाना अपने आप में एक अजूबा है – कहानी के किरदारों को यह समझ में नहीं आता कि ‘वे पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में, अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वो कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिन्दुस्तान में थे।’ यह महत्वपूर्ण है कि मन्टो अपनी कहानी को पागलख़ाने में स्थित करते हैं और वो तमाम बातें जो शायद उस दौर के बहुत से लोगों के दिमाग़ पर हावी थीं, तथाकथित पागल किरदारों के बयानात और हालात के ज़रिए पाठक तक पहुँचाते हैं। मानो वो कह रहे हों कि विभाजन के दौर का सारा आलम ही एक पागलख़ाना है – और मुल्क को दो हिस्सों में तक़सीम करना पागलपन। हम कह सकते हैं कि छोटी-छोटी कहानियों के यथार्थ-आधारित वृत्तान्तों को पीछे छोड़ कर मन्टो ने इस कहानी में विभाजन की त्रासदी को एक मेटाफऱ की शक्ल दे दी है –मालूम होता है कि इस कहानी में मन्टो ने विभाजन की त्रासदी को कहानी के किरदार सरदार बिशन सिंह के वजूद में ही ला खड़ा किया है – इस तरह, कि उसी में ‘स्याह हाशिए’ और ‘खोल दो’, ‘सहाय’ और ‘मुरली की धुन’ और ऐसी ही अन्य कहानियों और उन के किरदारों का ग़म और दर्द और पागलपन एक जगह आ कर बस गया है। और सआदत हसन मन्टो का दर्द और टीस भी। क्योंकि वे शायद मरते दम तक विभाजन की हक़ीक़त को स्वीकार नहीं कर पाए थे, उसे देखने काउन काअन्दाज़ अलग ही था– जो शायद दिखने में टेढ़ा था मगर था बहुत ही साफ़-स्पष्ट, तीखा और सीधा।

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