संघर्ष कथा – सहीराम

आंखिन देखी मैं कहता हूं, सुनी सुनायी झूठ कहाय।
गाम राम की कथा सुनाऊं, पंचों सुनियो ध्यान लगाय।
हल और बल कुदाली कस्सी, धान बाजरा फसल गिनाय।
भैंस डोलती पूंछ मारती, गैया खड़ी-खड़ी रम्भाय।
सुबह सवेरे हाली निकलै, गर्मी सर्दी को बिसराय।
सारा दिन वो खटै खेत में, मिट्टी संग मिट्टी होइ जाय।
चाहे धूप जेठ के चिलके, चाहे कोहरा दे ठिठुराय।
उसकी धरम मशक्क्त करना, उसको इनकी क्या परवाय।
लेकिन उल्टी रीति ये देखो, देऊं आपका ध्यान दिलाय।
ये दुनिया जो गोरख धंधा, मिहनत कौड़ी हाट बिकाय।
हल बैलों वाला भी भूखा, जो खेतों में अन्न उगाय।
मोटे सेठ हड़प कर जाएं, सारा माल हाथ फैलाय।
रुखा टुकड़ा वे ना पावैं, डाकू चिकनी चुपड़ी खाय।
डंगर भूखे मरते मर जाय, भूसा उनको मिलता नांय।
जमा फसल देकर बनिये को, कर्जदार फिर भी कहलाय।
ज्यों-ज्यों ढलै उमरिया उसकी, त्यों-त्यों कर्जा बढ़ता जाय।
यह चक्कर देखो होनी का, वह फिर भी मरजाद कहाय।
घर में बेटी बीस बरस की, कुरड़ी की ज्यों बढ़ती जाय।
सेठ साहब का कर्ज न उतरै, लड़की क्योंकर ब्याही जाय।
जो भी देखे लानत भेजै, वो क्या पड़ै कुएं में जाय।
बेटी भारी बोझ बाप पर, मां को औरत रही गरियाय।
पांच हजार मांगता समधी, उसकी चि_ी पहुंची आय।
लाला उसका अपना बनकर ऊंच-नीच सब रहा बताय।
दुनिया में मरजाद पालनी, यह मर्दों का धरम कहाय।
खानदान को दाग लगै ना, बिटिया घर से देओ धकाय।
सारी दुनिया काल चबैना, क्यों फिर पगले तू पछताय।
जाय कचैड़ी लाला जी संग, उसने दिया अंगूठा लाय।
अब वो नहीं भौमियां कोई, कर मजदूरी पेट चलाय।
छ:-छ: बच्चे-कुच्चे सारे, भूखे बिलख-बिलख सो साये।
अगन पेट में धधक रही है, घर का चूल्हा जलता नांय।
खेलन-खावन के दिन आये, सो बच्चे कमगर कहलाय।
हड्डी तोड़ें खून सुखावैं, संझा तक बेगार कराय।
आधी परदी उजरत देकर, धक्का दें और छुट्टी पाय।
यह अन्याय राम का देखो, किस-किसका दूं नाम गिनाय।
बोटी-बोटी नोचें उसकी, लोहू बूंद-बूंद पी जाय।
पंचो यह तो एक कहानी, गाम राम की कही सुनाय।
और न जाने कितने दुखड़े, कितने लोग रहे दुख पाय।
ढांचा यो सारा गड़बड़ है, बुनगत इसकी समझ न आय।
सब इंसान बराबर जनमै, एक पेट दो हाथ कमाय।
एक तो करता ऐश महल में, दर-दर दूजा ठोकर खाय।
एक उड़ावै हलवा-पूरी, दूजा भूखा मर-मर जाय।
यह इन्साफ कहां दुनियां में, सोचो पंचो ध्यान लगाय।
एक बना फिरता पंडत है, दूजा रहा चमार कहाय।
एक ही कुदरत एक ही माया, एक तरह से जनमे माय।
फिर कोई क्यों ठाकुर बनता, दूजा हरिजन रहा कहाय।
सबरनता का गरब नशीला, त्यौरी ऊपर को चढ़ जाय।
बुलद समझ कै चमड़ी तारै, और फिर ऊपर से गरियाय।
जिन्दा उसको आग में झोंके, तब तक नशा नहीं थम जाय।
फिर भी उसको गद्दी मिलती, वो मिट्टी में मिलता जाय।
यह कैसा कानून राम का, यह तो नहिं इंसाफ कहाय।
बेटी, बहू, माय हरिजन की, सरेआम इज्जत लुट जाय।
छुट्टा सांड गांव में डोलै, कोई नहीं सामने आय।
रात दिनों जो खेत जोतता, वो उसका मजदूर कहाय।
मालिक कोई और भूमि का, अपनी ये जागीर बताय।
उसको नहीं पता क्या मिट्टी, क्या मिट्टी की गंध कहलाय।
वो बैठा है महलों अंदर, उस तक गंध पहुंचती नांय।
सौ रुपए के कर्जे बदले, बंधुआ सात पुश्त हो जाय।
ऐसा यह कानून राम का, ज्ञानी गुनियों ज्ञान लगाय।
सर्दी गर्मी पीठ पै झेले, मालिक उसको रहा जुतियाय।
न्याय, धर्म के नाम पै पंचो, माणस दिन-दिन पिसता जाय।
मिल मजदूरों के बूते ही, चिमनी धुआं उगलती जाय।
पर इक बात सोचियो पंचो, वो क्यों अधभूखे रह जाय।
सेठ तिजोरी भर-भर गाड़ै, काले धन को रहा छुपाय।
मजदूरों का खून चूसता, लोहू बूंद-बूंद पी जाय।
वो महलों में बैठा लेकिन, उसकी पूंजी बढ़ती जाय।
शोषण वो कर रहा मजूर का, उसकी चर्बी बढ़ती जाय।
वो इंसान नहीं कोई सीधा, दीखत का वो नरम सुभाय।
आदमखोर जानना उसको, उसका दीन धर्म कोई नांय।
झूठा उसका पोथी पत्रा, झूठे मंदिर रहा बनाय।
मिल सारी मजदूरों की है, वो झूठा मालिक कहलाय।
मजदूरों को गाली देता, हड़तालों को झूठ बताय।
छंटनी कर-कर के वो इनकी, और गुंडों से रहा पिटाय।
उसके हाथ बनैले पंजे, उसको खूनी समझो भाय।
उसकी सारी पुलिस फौज है, गौरमिंट भी वही बनाय।
वो नहीं देगा बोनस तुमको, वो नहीं रहा सकूल खुलाय।
छंटनी कर-कर के लोगों की, घाटा ही घाटा दिखलाय।
उसकी खातिर मरो भूख से, उसको बात लागती नांय।
वो चमड़ी का मोटा भैंसा, उसके सींग रहे चिकनाय।
उससे लडऩा चाहो गर तो, एका पक्का कर लो भाय।
उसके साथ है सारी ताकत, उसकी एक जानियो नांय
अपनी ताकत एक जुटा लो, एक साथ लेओ हाथ मिलाय।
वो खूंखार बनैला भैंसा, उसे खून की गंध सुहाय।
वो रौंदेगा बस्ती को भी, बच्चों को वो चींथत जाय।
यह संघर्ष कथा उनकी है, पंचो सुनियो ध्यान लगाय।
जिनके हाथ हथौड़ा केवल, दोनाली से अड़ गए जाय।
सदियों में जो लुटते जाये, और लुटना जिनका धर्म कहाय।
जिनके पसीने को गंगा का, वे गोली में मोल लगाय।
जिनके बूते दुनिया चलती, दुनिया पै हक उनका जाय।
सारे दिन जो खटते-पिटते, रोटी उन्हें रही तरसाय।
कपड़ा उनको नहीं मय्यसर, दवा दारु की कौन बताय।
उस मेहनत का मोल मिला है, छाती में बंदूक अड़ाय।
राय तुम्हारी क्या है पंचो, क्या यह नहीं अन्याय कहाय।
धरम की बात तुम्हीं कह देना, लेकिन कहना ध्यान लगाय।
अन्यायी का पक्ष न लेना, पंचों से यकीन उठ जाय।
खूनखोर नरभक्षी देखा, भेड़ मुखौटा रहा लगाय।
पूरी कौम के ये दुश्मन हैं, इनका तो बस नफा खुदाय।
मेहनतकश मिलजुलकर सारे, अब तो इनको पटख लगाय।
क्या इंसानी रिश्तेदारी, क्या इंसानी प्यार कहाय।
मेहनतकश का परोपकार है, नफाखोर की क्या परवाय।
ऊपर से ये चिकने चुपड़े, अंदर कोढ़ रहा गन्धाय।
पूरी कौम को कोढ़ी कर दें, इनसे पिंड छुड़ाओ भाय।
ये कलंक पूरी दुनिया पर, इनका नामोनिशां मिटाय।
अब ये दुनिया है नहीं इनकी, अब ये और बसा लें जाय।
पर इंसान जहां होगा, इनकी पेश पड़ेगी नांय।
पंचों मैंने गलत कहा क्या, झूठ सांच देना बताय।
जिसने इनको जन्म दिया है, वो पग की जूती कहलाय।
बहन खिलौने की वस्तु है, उनको कोठे दिया बिठाय।
हक जीने का नारी मांगे, उसके सिर को रहे जुतियाय।
इनकी यह मर्दूमी देखो, यह इनका दमखम कहलाय।
मांग करें जो हक अपने की, उसकी खिल्ली देय उड़ाय।
उसको झांसे दे देकर ही अब तक उसको भोगे जाय।
नीलामी की यह वस्तु है, इसके मनकी समझें नांय।
लेकिन पंचो सुनना तुम भी, एक बात देऊं बतलाय।
नारी जागी है तो देखो, अब ये हक छोड़ेंगी नांय।
अब ये इनके पग की जूती, और शो पीस बनेगी नांय।
मरजादों की धमकी देकर, उसको रोक सकोगे नांय।
यह प्रतिबंध हटाना होगा, इनकी शक्ति लेओ परचाय।
शोर शराब नहीं है केवल, पक्की बात लीजियो लाय।
अब ये नहिं कोई पूजा वस्तु, धर्म कर्म की नहीं परवाय।
एक बराबर मानव शक्ति, एक को छोटा दिया बताए।
अब यह चालाकी नहीं होगी, सुनियो सजनो ध्यान लगाय।
शोषित पीडि़त जनता की, जो मैं कथा रहा बतलाय।
इतनी लंबी कथा है पंचो, एक-एक चीज सुनोगे नांय।
ना ये किस्सा तोता मैना, ना राजा-रानी की बात।
शोषित पीडि़त जनता की ही, मैंने आज बतायी बात।
नाले की कीड़ों सी दुर्गत, मानुष चोले की हो जाय।
श्रम शक्ति के दुरुपयोग से, बेड़ा कैसे पार लगाय।
मानव श्रम को बिन पहचाने, देश रसातल को हो जाय।
गांधी उनको  काम न आया, अर्थशास्त्रा को घुन खाय।
मैं पूछूं नेता लोगों से, पहन जो खद्दर रहे इतराय।
कुर्सी जिनका धर्म हो गई, जनता पड़ों कुएं में जाय।
कब तक वो देंगे भाषण ही, कब तक वादों की भरमार।
बहुत दिनों की बात नहीं अब, मेहनतकश हो रहे तैयार।
उनके हाथ दरांती अपनी, और हथौड़ा रहे उठाय।
कस्सी और कुदाली उनकी, हाथ बसूला पहुंचा आय।
तैयारी पूरी है उनकी, अब तो एका लेंय बनाय।
तब मैं आऊंगा और पूछूं, अब क्यों छुपे किले में जाय।
कहां गयी बंदूक दुनाली, क्या तलवार गयी बल खाय।
फौज, पुलिस सब अपने भाई, वो भी शामिल हो जा आय।
वो दिन होगा सज्जनो अपना, वे जल्दी ही पहुंचे आय।
तब तुम सुनना लोकगीत भी, ढोल मजीरा तभी सुहाय।

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