अन्नदाता – राजकुमार जांगड़ा

क्यूं काम करणियाँ भूखे सोवे,हामने या बता दो रै ।
क्यूं ठाडे के दो बॉन्डे हो से ,कोई तो समझा दो रै ।
कमा कमा के झोड़ा होग्या, गिनती नहीं खून पसीने की ।
हामने कद न्या भा मिलेगा,किम्मे ठोड़ ठिकाणे ला दयौ रै ।
रोटी माँगा आँख दिखावे ,काम मांग ल्यां घणे गुर्रावें ।
झूठ बोल सबने बहकावें ,कोए तो समझा लो रै ।
भूखे नै दो रोटी ठा ली ,कैद होई छः महीना की
लँगवाड़े यू देश लूटगे,कोए इन नै भी पकड़ा दयौ रै ।
आपस में लड़वाना चाहवें ,मुदया ते ध्यान हटाना चाहवें ।
कड़े कड़े उलझाणा चाहवें ,इबतो इन्हेंनै उलझा दयौ रे ।
जल्दी बख़्त पीछाणना होगा,योहे ‘राज’ जाणना होगा ।
मिलके आओ सबने समझाओ,इनकी अक्ल ठिकाणे ला दयौ रै ।
                           राजकुमार जांगड़ा ‘राज’

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