बिन किसी के दर्द में शामिल हुए – बलबीर सिंह राठी

ग़ज़ल


बिन किसी के दर्द में शामिल हुए,Baldir Rathi
कैसे मिटते दरमियां1 के फ़ासिले।
क्या कभी रुकता है दरिया वक़्त का,
कैसे रुकते दर्द-ओ-ग़म के सिलसिले।
सब ने सच माना तुम्हारे झूठ को,
लोग ही कुछ इस क़दर मासूम थे।
राह में हमसे हुए थे जो अलग,
वो हमारे क़ाफ़िले में आ मिले।
कौन उन पर चल के मंजि़ल ढूंढता,
इस क़दर दुश्वार2 थे सब रास्ते।
यूँ मिटा नफ़रत का सहरा3, हम वहाँ,
प्यार का दरिया बहा कर ले गये।
जिन पे रखता था न कोई भी क़दम,
क्यों उन्हीं राहों पे ‘राठी’ जी चले।
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  1. बीच में 2. कठिन 3. मरुस्थल

 

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