जो कटे हैं, उन सरों सा एक सर मेरा भी है – बलबीर सिंह राठी

ग़ज़ल


जो कटे हैं, उन सरों सा एक सर मेरा भी हैं,
जो जले हैं, उन घरों जैसा ही घर मेरा भी है।
आग लेकर आ गये हो तुम गुलिस्तां1 में, मगर,
इस चमन में आशियाँ2 इक शाख़3 पर मेरा भी है।
इक ग़लत रस्ते पे लेकर उस को तुम चल तो दिए,
वो शरीफ़ इन्सान लेकिन हमसफ़र मेरा भी है।
तुम बसाते जा रहे हो जा-ब-जा नफ़रत कदे,
इस ज़मीं पर एक हिस्सा नाम भर मेरा भी है।
खेल नफ़रत का है, लेकिन, प्यार का हामी हूँ मैं,
इस तुम्हारे खेल में, कुछ दाव पर मेरा भी है।
मैं किसी को क्यों बनाने दूँ इसे दोज़ख4 नुमा,
ये जहाँ औरों का होगा, मगर मेरा भी है।
आ गई बस्ती जलाने मज़हबी5 लोगों की भीड़,
मैं कि चिल्लाया बहुत, बस्ती में घर मेरा भी है।
गुमरही6 का डर भी है और रास्ता दुश्वार भी,
अब उसी रस्ते पे लेकिन इक सफ़र मेरा भी है।
मैं ही ला सकता हूँ ‘राठी’ खुशनुमा रंगी सहर,
शब-परस्तों7 को यक़ीनन एक डर मेरा भी है।
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  1. बाग 2. घोंसला 3. टहनी 4. नरक  5. धार्मिक  6. भटकना  7. अंधेरे के उपासक

 

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