ग़ज़ल


इतनी आसान ये रहगुज़र1 भी नहीं,
साथ अपने कोई हम सफ़र भी नहीं।
मेहरबां हम पे उन की नज़र भी नहीं,
कोई तरकीब अब कारगर भी नहीं।
साथ चलने से क्यों लोग घबरा गये,
इतना मुश्किल तो अपना सफ़र भी नहीं।
कितने हमदर्द अपनी ही बस्ती में थे,
क्या हुआ अब कोई चारा गर भी नहीं।
बात करते हैं सब दुश्मनों की तरह,
गुफ़्तगू2 के लिए हमसफ़र भी नहीं।
लुटने वाले ही लुटने को तैयार है,
अब किसी का लुटेरों को डर भी नहीं।
अपनी गलियाँ कहाँ इतनी महफ़ूज़3 थी,
घर जो महफ़ूज़ थे अब वो घर भी नहीं।
सब दुआएँ तो किस की हुई है कुबूल,
हर दुआ अपनी यूँ बे असर भी नहीं।
कब के जा भी चुके हम से वो रूठ कर,
हम को इस बात की कुछ खबर भी नहीं।
अपनी राहों में सहरा है पसरा हुआ,
दूर तक जिसमें कोई शज़र4 भी नहीं।
तीरगी5 नूर6 को घेरती किस तरह,
रौशनी है जिधर वो उधर भी नहीं।
अब तो ‘राठी’ पे है क़ाफ़िले की नज़र,
उस से अच्छा कोई राहबर भी नहीं।
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  1. आम रास्ता 2. बातचीत 3. सुरक्षित 4. पेड़  5. अंधेरा  6. रोशनी

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