दो पंछी – रवींद्रनाथ टैगोर

रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘दुई पाखी’ का हरियाणावी अनुवाद

अनुवाद – डा. सुभाष चंद्र

पिंजरे का पंछी था सोने के पिंजरे में अर बण का पंछी था बण म्हं
बेरा नी क्यूकर दोनूं मिलगे, पता नी के था ऊपर आळे के मन म्हं
बण का पंछी बोल्या, भाई पिंजरे के पंछी, चाल चाल्लें दोनों बण म्हं
पिंजरे का पंछी बोल्या, बण के पंछी, आजा मौज तै रवैं पिंजरे म्हं
बण का पंछी बोल्या, ना, मैं खुद  बांधण कोनी द्यूं
सोने का पंछी बोल्या, हाय, मैं बाहर बण कोनी क्यकर रहूं
बण का पंछी बाहर बैठ्या बण के गीत गार्या
पिंजरे का पंछी रटी-रटाई बातें दुहरार्या
दोनुवां में कोई मेळ नीं
बण का पंछी बोल्या, भाई पिंजरे के पंछी, गा बण का गीत
पिंजरे का पंछी बोल्या, भाई बण के पंछी, सीख ले पिंजरे का गीत
बण का पंछी बोल्या, ना, मैं सिखाए-रटाए गीत गाणा ना चाऊं
पिंजरे का पंछी बोल्या, हाय,  मैं क्यूकर बण का गीत गाऊं
बण का पंछी बोल्या, घणे नीले गगन में किते बाधा ना कोई
पिंजरे का पंछी बोल्या,पिंजरे की परिपाटी चारों कान्नें तै घिरी होई
बण का पंछी बोल्या, एक बर छोड़ दे खुद नै बादळां कै हवाले
पिंजरे का पंछी बोल्या, खुद को रखो सीमित सुख तै रहो अकेले
बण का पंछी बोल्या, ना उरै मैं उड़ ना पाऊं
पिंजरे का पंछी बोल्या, हाय बादळां म्हं बैठण की जगां ना थ्याऊं
इस तरां दोनूं पंछी एक दूसरे नै चावैं,पर पास ना आ पावैं
पिंजरे की तारें चोंच से छू छू कर,  टुकुर टुकुर देखे जावैं
दोनूं एक दूसरे को समझ ना पावैं, ना आपणे को समझा पावैं
दोनूं अपणे अपणे पंख फड़फड़ावैं, धौरे आ दुखी सुर में कहणा चावैं,
बण का पंछी बोल्या, ना के बेरा कद पिंजरा बंद हो जावै
पिंजरे का पंछी बोल्या, हाय मेरमें उड़ण की शक्ति ना आवै ।

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