ऐकला चाल – रवीन्द्रनाथ टैगोर

ऐकला चाल

जे तेरा रुक्का सुणकै,कोए भी  ना आवै
तो तूं कल्ला चाल
कल्ला चाल , कल्ला चाल ,कल्ला चाल तूं ।
जे कोए बी ना बोलै, ओ अभागे,
ओ अभागे सबके मुंह में दही जमगी हो
सारे मुंह मोड़ लें, सारे डररे हों
तो भी तूं निडर हो कै
कल्लाए आपणी बात बोल।
जे सारे उल्टे मुड़ लें, ओ अभागे,
ओ अभागेसारे पुट्ठे मुड़ लें
जंगळ की काळी घुप्प अंधेरी रात में कोई भी ना जावै
तो पैरों की लहुलुहाण तळियों से
रास्ते के कांटो को दरड़दा
कल्ला चाल
जे दीवा ना बळै, ओ अभागे
तूफानी रात में जे सारे किवाड़ भैड़ लें
तो बिजळी की आग तै
आपणी हृदय-पीड़ा जळा
कल्ला बळ

एकला चलो रे – रवींद्रनाथ टैगोर
(मूल बंगला )
यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!
यदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!
यदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!
यदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
यदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!

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