रविन्द्रनाथ टैगोरः विराट भारतीय आत्मा- डा. सुभाष चंद्र

रवीन्द्र नाथ मूलतः बंगला के कवि हैं, लेकिन वे भारत के और विश्व के कवि हैं। आधुनिक भारत के लिए बंगाल अनुकरणीय रहा है। समाज में परिवर्तन की लहर बंगाल से होकर पूरे देश में आई है। राजा राम मोहनराय के समय से ही यह शुरुआत हों गई थी। नवजागरण के सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों पर बंगाल में ही सबसे पहले चर्चा शुरु हुई थी। धार्मिक संकीर्णता के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन वहां शुरु हुए। ब्रह्म समाज की स्थापना ने समाज में नई बहस को जन्म दिया। ठाकुर देवेन्द्रनाथ ब्रह्म समाज के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्हीं के यहां रविन्द्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ। कलकत्ता में 7 मई, 1861 में हुआ।

रविन्द्रनाथ को एक समृद्ध विरासत मिली थी। रविन्द्रनाथ टैगोर के दादा द्वारकानाथ ने जहां उत्पादन को बढ़ावा देने में अपनी ऊर्जा लगाई, वहीं इनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने उद्योग धंधों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज में सक्रियता से कार्य किया। उनके समर्पण को देखते हुए उन्हें ब्रह्म समाज का दूसरा प्रवर्त्तक भी कहा जाता है। देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने परिवार में नए मूल्यों को स्थान देकर नया वातावरण बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। “घर के अन्दर के नारी जगत की शिक्षा की जिम्मेदारी वैष्णव ठकुरानी के हाथों से निकालकर ईसाई शिक्षिका को सौंपी गई। उन्होंने अपनी पुत्री को बेथुन कालेज में भर्ती कराया। अंग्रेजी में शिक्षित लड़की की शादी कर उसे अपने घर की बहु बनाया। देश और विदेश के सृजनशील प्रतिभा-पुरुषों का उनके घर केवल आना जाना ही नहीं था, बल्कि उनके प्रति ठाकुर परिवार की श्रद्धा थी। पूर्वी और पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति की सभी महत्त्वपूर्ण चर्चा के क्षेत्र का केन्द्र इस परिवार का प्रांगण बन गया। उसका प्रभाव और उसका प्रचार प्रसार उनके पुत्र रवीन्द्रनाथ को परम्परा से प्राप्त हुआ।”1 ऐसे वातावरण के कारण ही रविन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार को कट्टरपंथी लोग पराली ब्राह्मण कहते थे।

रविन्द्रनाथ का संबंध जमींदार घराने से था, उनके दादा द्वारकानाथ ठाकुर राजा कहलाते थे, लेकिन रविन्द्रनाथ का बचपन साधारण तरीके से ही बीता। “हमारे बचपन में भोग-विलास का सरंजाम नहीं था, इतना कहना काफी होगा। …हम लोग नौकरों के शासन में थे। अपने काम को आसान करने के लिए उन लोगों ने हमारा हिलना-डुलना एक तरह से बन्द कर दिया था। …हमारे खान-पान में शौकीनी की गंध भी न थी। कपड़े-लत्ते इतने साधारण थे कि आज के लड़कों के सामने उनकी फेहरिस्त रखने से इज्जत जाने का डर है। दस साल की उम्र होने से पहले कभी किसी दिन किसी कारण से मौजा मैने नहीं पहना। जाड़े के दिनों में एक सादे कपड़े के ऊपर और भी एक सादा कपड़ा ही काफी था। इसके लिए मैने किसी दिन भाग्य को बुरा-भला नहीं कहा। हां, हमारे घर का दर्जी नियामत खलीफा उपेक्षा के भाव से जब हमारे कुर्ते में जेब लगाना आवश्यक समझता तो इसका हमें दु:ख होता – क्योंकि ऐसा कोई लड़का तो किसी अंकिचन भिखारी के घर भी पैदा नहीं होता जिसके पास अपनी जेब में रखने के लिए कुछ-न-कुछ चल-अचल संपति न हो। … छोटी से छोटी चीजें भी हमारे लिए दुर्लभ थीं, बड़े होने पर कभी मिलेंगी इसी आशा में उन सबको दूर भविष्यत् के हाथों में समर्पित करके हम बैठे हुए थे। उसका फल यह हुआ था कि उन दिनों जो कुछ भी हमें मिल जाता उसका रस पूरा-पूरा गार लेते थे, छिलके से लेकर गुठली तक कुछ भी फेंका न जाता।”2

वे अपने पिता की तेहरवीं संतान थे। रविन्द्रनाथ के भाई और उम्र में बड़े भानजे को स्कूल में जाते देख स्कूल जाने की जिद्द की तो निरुत्साहित करने के लिए “हम लोगों के जो शिक्षक थे उन्होंने मेरा मोह भंग करने के लिए एक जोरदार तमाचे की तरह यह सारगर्भ बात कही थी, तुम अभी स्कूल जाने के लिए जिस तरह रो रहे हो, न जाने के लिए इससे कहीं ज्यादा तुम्हें रोना पड़ेगा।” असल में शिक्षा प्रणाली का यह सच ही था।

8 मार्च, 1874 को लगभग 12-13 साल की उम्र में उनकी मां का देहांत हो गया। रविन्द्रनाथ कवि तथा नाटक के अभिनेता के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे थे, लेकिन बड़े-बूढ़े कहते “इससे क्या होना जाना है? इसे तो कोई ऊंची परीक्षा पास करके किसी बड़े सरकारी पद पर जमना चाहिए।”3 सत्रह साल की उम्र में अंग्रेज़ी की पढ़ाई के लिए 1878 में इंगलैंड भेजे वे अपनी शिक्षा पूरी करने से पहले ही बुला लिये गए।

9 दिसम्बर 1883 को बाईस साल की उम्र में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह कर दिया गया। उनके पांच संतानें हुईं। इनकी शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही की। इनकी पत्नी के देहांत के बाद बच्चों को पिता के साथ-साथ मां का प्यार भी दिया। बाल मनोविज्ञान को जानने का अवसर मिला और बेहतरीन बाल साहित्य की रचना की। इनकी बेटी तथा एक बेटे की मृत्यु ने गहरा आघात पहुंचा।

उन्होंने 1901 में विश्वभारती स्कूल की स्थापना की। जिसमें अंग्रेजी शिक्षा के विकल्प के तौर पर शुरु की थी। आज यह शान्तिनिकेतन विश्वविद्यालय के तौर पर फल-फूल रहा है। 1911 में भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मण’ लिखा और उसी साल उन्होंने ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोध प्रकाशिका’ में इसे ‘भारत विधाता’ शीर्षक से प्रकाशित किया था। इस पत्रिका का सम्पादन गुरुदेव ही करते थे। 1911 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 27 दिसंबर को इसे गाया गया। शुरु में इस पर आरोप लगाया जाता रहा कि यह जार्ज पंचम की अभ्यर्थना में लिखा गया है। कहा तो यहां तक गया कि गीत में जार्ज पंचम को ही भारत भाग्य विधाता कहा गया है। यह संयोग ही था कि जिस अधिवेशन में यह गाया गया उसी अधिवेशन में जार्ज पंचम का अभिनंदन करने का निर्णय लिया गया था। अभिनंदन करने का कारण था कि उन्होंने बंगभंग के फैसले को रद्द करने का ऐलान किया था।

गुरुदेव ने इन विवादों का ज़ोरदार विरोध किया और कहा कि ‘भारत भाग्य विधाता’ और ‘जय हे’ का भारत के जनगण के लिए ही व्यवहार किया गया है। यह गीत देश के जनगण के लिए समर्पित है। गुरुदेव ने स्वयं 1905 में बंगभंग के ख़िलाफ़ कलकत्ता में निकले ऐतिहासिक जुलूस का नेतृत्व किया था। उसी दौरान उन्होंने ‘बंग्लार माटि बंग्लार जल’ शीर्षक गीत लिखा था।

रविन्द्रनाथ टैगोर शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक, कवि, चित्रकार के तौर पर प्रसिद्ध हुए। 15 साल की उम्र में उन्होंने कविता पाठ किया। उनकी कविताएं उनके मित्र की मासिक पत्रिका में प्रकाशित होती थी और उनके नाटकों में मुख्य भूमिका निभाने के कारण कलकत्ता के आस पास के क्षेत्र में जाने जाने लगे थे। 51 साल तक उनका दायरा सीमित ही रहा। सन् 1912 में उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने अपनी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया। अपनी डायरी को भूल गए और वह चित्रकार रोथेन्स्टाइन के हाथ लग गई। इस चित्रकार ने अपने दोस्त प्रख्यात कवि डब्ल्यू बी यीट्स को दिखाया। उन्हें ये कविताएं बेहद पसन्द आईं और उसकी भूमिका लिख दी जो सन् 1912 में लंदन गीतांजलि नाम से प्रकाशित हुई। और एक साल के भीतर नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। और रविन्द्रनाथ पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गए। इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले गैर पश्चिमी व्यक्ति थे। रविन्द्रनाथ टैगोर मूलत: बंगला भाषा के कवि हैं, लेकिन गीतांजलि की सफलता के बाद उन्होंने अपनी रचनाओं को अंग्रेजी में अनुवाद किया।

सन् 1913 में गीतांजलि की कविताओं पर नोबेल पुरस्कार मिला और इससे एक लाख बीस हजार रुपए मिले जो शान्तिनिकेतन आश्रम के कामों में लगा दिए। सन् 1915 में अंग्रेजी सरकार ने सर की उपाधि दी। सन् 1919 में जलियांवाला बाग में दमन व बर्बर नरसंहार से दुखी होकर रोष स्वरूप इसे वापिस लौटा दिया। और बहुत ही तीखा पत्र लिखा जिसे साहसी कार्रवाई माना गया। “पंजाब में कुछ स्थानीय गड़बड़ियों को दबाने के लिए सरकार की कार्रवाई की विकरालता ने हमें झिंझोड़कर भारत में ब्रिटेन के पराधीन नागरिक होने की अपनी नियति की मजबूरी का अहसास हमारे मन में करा दिया है। अभागे लोगों पर कठोर दंड की विषमता और उसे अंजाम देने का तरीका हम मानते हैं कि सभ्य सरकारों के इतिहास में कभी नहीं हुआ, सिवाय हाल के दीर-दराज के कुछ अपवादों को छोड़कर। इस तरह का व्यवहार साधनहीन और निहत्थे लोगों के साथ किया गया है उस शक्ति द्वारा जिसके पास इंसानी जिंदगियों को नष्ट करने का भयानक रूप से निपुण संगठन है। हमें दृढ़तापूर्वक कड़े शब्दों में कहना चाहिए कि यह राजनैतिक औचित्य का दावा कदापि नहीं कर सकती, नैतिक रूप से न्यायसंगत तो कतई नहीं। … मैं आतंक की मूक व्यथा से चकित अपने देश के लाखओं लोगों के प्रतिरोध को वाणी देकर इसका परिणाम भुगतने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता हूं कम से कम इतना तो मैं अपने देश के लिए कर ही सकता हूं। अब समय आ गया है जब सम्मान के बिल्ले, अपमान के संदर्भ में अपनी असंगति से लज्जास्पद लगते हैं। मैं अपनी ओर से सभी विशिष्ट उपाधियों से विहीन होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूं जो अपनी तथाकथित तुच्छता के लिए अवमानना सहने को मजबूर हैं जो इंसानों के लिए उचित नहीं है। और यही कारण है जिन्होंने मुझे व्यथित करके मजबूर किया है कि मैं महामहिम से आदरपूर्वक और खेद के साथ नाइट की उपाधि से मुक्त करने का अनुरोध करूं जिसे आपके पूर्ववर्ती अधिकारी के हाथों से महामान्य महाराजा की ओर से स्वीकार करने का मुझे सम्मान मिला था।”4

रविन्द्रनाथ ने 11 बार विदेश की यात्राएं कीं। पूरा यूरोप, रूस, अमेरिका के दोनों महाद्वीप, चीन, जापान, मलाया, जावा, ईरान आदि देशों की यात्रा की। कई विद्वानों से परिचय हुआ। विलियम रोथेन्स्टाइन, कवि यीट्स, एच जी वेल्स, आईंस्टाइन से मुलाकात हुई। प्रसिद्ध वैज्ञानिक बोस से उनकी गहरी मित्रता थी। अपने जमाने के हर क्षेत्र के यशस्वी लोगों से टैगोर के संबंध थे। 7 अगस्त 1941 को रविन्द्रनाथ की मृत्यु हो गई।

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प्रमुख रचनाएं :

उन्होंने एक हजार से अधिक कविताएं, आठ कहानी संग्रह, दो दर्जन नाटक, आठ उपन्यासों के अलावा धर्म, दर्शन, संस्कृति, शिक्षा आदि विषयों पर सैंकड़ों निबन्धों उनके विचार हैं। साहित्य लेखन के अलावा वे संगीतकार थे। उन्होंने लगभग दो हजार गीतों को संगीत दिया। सन् 1929 में उन्होंने चित्रकारी शुरु की। प्रख्यात विद्वान के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय चिन्तन परम्परा’ में टैगोर के बारे में लिखा है कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार यद्यपि आदर्शवाद में लिपटे हुए थे, तो भी वे न तो अमूर्त थे और न ही निरुद्देश्य। उनके नाटक, उपन्यास और कहानियां विगत युग के अंधे मताग्रहों और अंधविश्वासों तथा विदेशी शासन के आतंक और अन्याय के विरुद्ध एक देशभक्त और सुधारक के आक्रोश से भरपूर हैं। वह उन लोगों के ढोंग भरे पूजा-पाठ, प्रार्थनाओं और भक्ति का मजाक उड़ाते थे, जो निर्धन तथा गरीबों से घृणा करते थे।”5

कहानी संग्रह : छोटा गल्प, कल्पचारिती, गल्पदशक, गल्पगुच्छ (5 भागों में) और गल्पसप्तक। ‘घाटेर कथा’, ‘पोस्टमास्टर’, ‘पत्नी का पत्र’ ‘एक रात्रि’, ‘खाता’, ‘त्याग’, ‘छुट्टी’, ‘काबुलीवाला’, ‘सुभा’, ‘दुराशा’, ‘नामंज़ूर गल्प’, ‘प्रगति-संहार’(अंतिम कहानी) आदि उनकी महत्वपूर्ण कहानियां हैं।

गीत-संग्रह / काव्य-संग्रह : भानुसिंह ठाकुर की पदावली (छद्मनाम भानुसिंह से 16 वर्ष की अवस्था में लिखा) , वनफूल, कविकाहिनी, रुद्रचंड, भग्नहृदय, शैशवसंगीत, `संध्या संगीत’, ‘कालमृगया’, ‘प्रभातसंगीत’, ‘छवि ओ गान (1884), ‘कड़ि ओ कोमल’ (1886), ‘मानसी’ (1890), ‘सोनारतरी’, ‘चित्रा’(1896), ‘चैताली’(1896), ‘कथा’ (1900), ‘काहिनी’, ‘कणिका’, ‘शक्तेर क्षमा’, ‘आकांक्षा’, ‘क्षणिका’, ‘कल्पना’, ‘स्वप्न’, ‘नैवेद्य’ (1901), ‘स्मरण’ (1902), ‘शिशु’ (1902), ‘खेया’ (1905), ‘गीतांजलि (1910), ‘गीतिमाल्य’(1914), ‘गीतालि’ (1914), ‘वलाका’ (1916), ‘पलातक (1918), ‘लिपिका’ (1919), `पूरबी’ (1924)

गीति-नाटिका / नाटक : वाल्मीकि प्रतिभा, प्रकृतिर प्रतिशोध (प्रथम नाट्य प्रयास), ‘मायार खेला’, ‘राजा ओ रानी’, ‘विसर्जन’ (1890), ‘चित्रांगदा’ (1891), ‘विदाय अभिशाप’(1894), `गांधारीर-आवेदन’, ‘नरकवास’, ‘कर्ण-कुन्ती संवाद’ (1897), `सती’, ‘चिरकुमार सभा’, ‘मालिनी’, ‘शरदोत्सव’ (1908), ‘प्रायश्चित’ (1909), ‘राजा’ (1910), अचलयातन (1911), ‘डाकघर’ (1912), ‘गुरु’ (1917), ‘फाल्गुनी’ (1915), ‘मुक्तधारा’ (1922), ‘वसन्तोत्सव’ (1922), ‘वर्षामंगल’ (1922), ‘शेषवर्षण’ (1925), ‘शोध-बोध’ (1925), ‘नटीर पूजा’ (1925), ‘रक्त-करवी’ (1926) ‘नटराज’ (1927), ‘नवीन’ (1927), ‘सुन्दर’ (1927)

उपन्यास : ‘बहू ठाकुरानीर हाट (1881, पहला उपन्यास), ‘राजर्षि’ (1887), ‘चोखेर बाली’, ‘नौका डूबी’ (1905), ‘गोरा’(1910), ‘चतुरंग’ (1915), ‘घरे-बाहिरे’ (1915), योगायोग (1927), `शेषेर कविता’ (1927) ।

निबन्ध व विचार, संस्मरण : 1883 से 1887 के बीच विविध प्रसंग, आलोचना, समालोचना, चिट्ठी-पत्री, ‘योरोप-यात्रीरयरी’(1891), ‘छिन्नपत्र’(1912), ‘जीवनस्मृति’(1911), ‘साधना’(1914), ‘नेशनलिज़्म’(1917), ‘परसनालिटी’(1917),  ‘क्रियेटिव यूनिटी’ (1922)

संस्कृत-साहित्य की समृद्ध परम्परा को आत्मसात किया। महाभारत, रामायण के अलावा कालिदास को समझा। बुद्ध, जैन, लोकायतों के चिन्तन-दर्शन को समझा। भक्तिकाव्य की संत व सूफी काव्य का गहराई से अध्ययन किया। भारतीय इतिहास की विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं को समझा। इस सबके तार्किक दृष्टि अपनाने से उदार मानवीय दृष्टि विकसित हुई, जिससे वे भारतीय साहित्य व इतिहास का अद्भुत विश्लेषण कर पाए। गांधारी, कर्ण, जैसे चरित्रों पर कलम चलाकर उन्हें युगानुरूप व्याख्यायित किया। कबीर से वे अत्यधिक प्रभावित थे, कबीर को उन्होंने जिस तरह से समझा, पूरे विमर्श को ही बदल दिया। उनका यह प्रभाव हिन्दी में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से पड़ा।

भारत के भविष्य का स्पष्ट नक्शा उनके जेहन में था, जो उनके साहित्यिक-रचनाओं में परिलक्षित होता है।’प्रार्थना’ और ’त्राण’ कविता में जो संकल्प है, वह रवीन्द्रनाथ के जीवन और साहित्य के लक्ष्यों व प्रतिबद्धताओं के साथ भारतीय समाज में व्याप्त समस्याओं की ओर भी संकेत करती है।

चित्त जहाँ शून्य, शीश जहाँ उच्च है
ज्ञान जहाँ मुक्त है, जहाँ गृह-प्राचीरों ने
वसुधा को आठों पहर अपने आँगन में
छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर बन्दी नहीं किया है …
भारत को उसी स्वर्ग में जागृत करो!6

रवीन्द्र नाथ टैगोर ’त्राण’ कविता में व्यक्त चरित्र के नैतिक-उत्थान, आत्मिक-विकास की बात करते हैं, वही बार-बार उनकी रचनाओं का विषय बना है।

हे मंगलमय, इस अभागे देश से
सर्व तुच्छ भय दूर कर दो।
लोक-भय, राज-भय और मृत्यु भय
प्राण से दीन और बल से हीन का यह असभ्य भार
यह नित्य पिसते रहने की यन्त्रणा
नित्य धूलि-तल में पतन
पल-पल पर आत्मा का अपमान
भीतर-बाहर दासत्व के बन्धन
हजारों के पैरों के नीचे बार-बार त्रस्त और नतशिर होकर
मनुष्य की मर्यादा गौरव का अपहरण परिहरण
मंगलमय अपने चरण के आघात से
इस विपुल लज्जा-राशि को
चूर्ण करके दूर कर दो
अनन्त आकाश उदार आलोक
उन्मुक्त वातास से भरे हुए मंगल प्रभात में
सिर ऊँचा करने दो।7

रविन्द्रनाथ टैगोर ने भारत की बहु-संस्कृति, बहुधर्मी की शक्ति को पहचाना और विभिन्न क्षेत्रों से आए विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के परस्पर आदान-प्रदान से जिस सांझी संस्कृति का निर्माण हुआ, उसे रेखांकित किया। वे भारत को संस्कृतियों का महा-समुद्र कहते थे। भारत-तीर्थ कविता में इस विचार को अभिव्यक्ति दी। कई लेख इस संबंध में लिखे। उनके इन विचारों का प्रभाव जवाहर लाल नेहरु पर, रामधारी सिंह दिनकर आदि पर दिखाई देता है, जिन्होंने इस विषय पर विस्तृत शोध किया।

कोई नहीं जानता, किसके आह्वान पर
कितने लोगों की दुर्वार धारा कहाँ से आई, और
इस सागर में खो गई।
आर्य, अनार्य, द्रविड़, चीनी, शक, हूण, पठान, मुगल
सब यहाँ एक देह में लीन हो गए।
आज पश्चिम ने द्वार खोला है, वहाँ से सब भेंट ला रहे हैं
ये देंगे और लेंगे, मिलाएँगे और मिलेंगे, लौटकर नहीं जाएँगे –
लड़ाई के स्रोत में विजय के उन्मत गीत गाते हुए
मरुभूमि और पहाड़-पर्वतों को पार करके जो लोग आए थे
वे सब-के-सब मुझमें विराज रहे हैं, कोई भी दूर नहीं है
मेरे लहू में उनका विचित्र सुर ध्वनित है
आर्य रुद्रवीणा, बजो, बजो, बजो
घृणा से आज भी दूर खड़े हैं जो
बन्धन तोड़ेंगे – वे भी आएँगे, घेरकर खड़े होंगे
इस भारत के महामानव के सागर के सागर-तट पर।8

स्वतंत्रता-आन्दोलन के प्रखर होने के साथ भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता का विष का प्रभाव भी भारतीय राजनीति और समाज में घुलता चला गया। साम्प्रदायिकता की राजनीति संस्कृति, धर्म और राष्ट्र की अवधारणाओं के संकीर्ण प्रयोग के साथ अपना प्रभाव बढ़ाती है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संकीर्णता के हर पक्ष पर प्रहार किया। सन् 1926 में कलकत्ता में उसी बस्ती में दंगे हुए जिसमें टैगोर रहते थे। दंगों के दौरान अमानवीयता को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने ‘धर्ममोह’ कविता लिखी

वे करते हैं धर्म की वेदी को रक्त रंजित
तोड़ो, तोड़ो इसे शून्य में बदल दो
धर्म की कारा की दीवारों पर वज्रपात करो
इस तमसपूर्ण धरती पर ज्ञान का प्रकाश फैला दो।9

रवीन्द्र नाथ की कविता में काम करते हुए साधारण जन की मेहनत को रेखांकित करते हैं। आम किसानों-मजदूरों को वे वास्तविक देवता के मानते हैं। साहित्य में आमजन को इससे पहले ऐसी प्रतिष्ठा शायद ही मिली हो। रवीन्द्र नाथ के साहित्य में आम जन के विश्वसनीय चित्रों के पीछे उनका लगाव है। “ अपने जीवन के अन्तिम काल में उनका मनुष्य दरिद्र और वंचित मनुष्य था। यह उनके स्वर में स्पष्ट था।”10 आमजन से सच्ची सहानुभूति के बिना ऐसा लेखन संभव नहीं है। ”धुलि-मंदिर” कविता इसका अद्भुत उदाहरण है।

देवता तो वहाँ गए हैं,
जहाँ माटी गोड़कर खेतिहर खेती करते हैं –
पत्थर काटकर राह बना रहे हैं,
बारहों महीने खट रहे हैं।
क्या धूप, क्या वर्षा, हर हालत में सबके साथ हैं
उनके दोनों हाथों में धूल लगी हुई है
अरे, तू भी उन्हीं के समान स्वच्छ कपड़े बदलकर धूल पर जा।11

साधारण जन के दयनीय हाल रवीन्द्रनाथ से छुपे हुए नहीं थे। भंयकर शोषण और अत्याचार से उसकी कारुणिक दशा का बहुत विश्वसनीय चित्रण ही नहीं करते, बल्कि उसके कारणों तक भी जाते हैं। ईश्वर को रोषमयी शिकायत में उनके दिल का दर्द छुपा हुआ है। बार-बार वे इस पक्ष को विभिन्न तरीकों से लेकर आते हैं। ‘प्रश्र’ कविता इसे बाखूबी व्यक्त करती है।

मैने देखा है – गोपन हिंसा ने
कपट-रात्रि की छाया में निस्सहाय को
चोट पहुँचाई है।
मैंने देखा है – प्रतिकार-विहिन ज़बर्दस्त के
अत्याचार से, विचार की वाणी चुपचाप
रो रही है,
मैंने देखा है – तरुण बालक उन्मत होकर
दौड़ पड़ा है,
बेकार ही पत्थर पर सिर पटक-पटककर मर गया है,
कैसी घोर यन्त्रणा है उसकी?
अमावस्या की कारा ने मेरे संसार को
दु:स्वप्नों के नीचे लुप्त कर दिया है,
इसीलिए तो आँसू-भरी आँखों से तुमसे पूछ रहा हूँ –
जो लोग तुम्हारी हवा को विषाक्त बना रहे हैं,
उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है?
उन्हें क्या तुमने प्यार किया है?12

रवीन्द्र नाथ की कविताओं में ब्राह्मणवाद के शिकार दलितों की पीड़ा को समझा और सामाजिक-न्याय के प्रश्न को ”ब्राह्मण”13 व ”अपमानित” कविताओं में अभिव्यक्त किया।14 हिन्दू धर्म में मौजूद भेदभाव को उन्होंने कई जगह व्यक्त किया है। काफी संख्या में हिन्दुओं द्वारा सिक्ख धर्म अपनाने पर उन्होंने अपने विचार देते हुए लिखा “हमारे दैनिक व्यवहार में, हिंदू धर्म मात्र एक जीवन-पद्धति है, और चाहे इसका दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार कितना ही महान क्यों न हो, लेकिन इसके नाम पर जो सामाजिक अन्याय युगों से होते आए हैं उनकी क्षतिपूर्ति इससे नहीं हो पाएगी। हमारा धर्म समाज को छोटे-छोटे समूहों में बांटता है और जो सबसे निचले स्तर पर है उन्हें न केवल सामाजिक न्याय से वंचित किया जाता है, बल्कि उन्हें मनुष्य से बदतर होने का अहसास निरंतर कराया जाता है। सनातनी लोग कुछ हद तक गलत नहीं हैं जब वे यह दावा करते हैं कि समाज के एक बड़े समुदाय को दबा के रखने की वर्ण-व्यवस्था की भावना हमारे समाज का आधार है यह हमारे धर्म का स्थायी ढांचा है जिसका समर्थन प्राचीन स्मृतिकार मनु, पाराशर तथा अन्य मनीषियों के आदेशों से होता है। हममें से बहुत से लोग उनके ग्रंथों की सभ्यतापूर्ण व्याख्याएं करने का प्रयास करते हैं लेकिन इस प्रकार की व्याख्याएं उत्पीड़ित लोगों का भला नहीं कर पाती हैं और न तो सामाजिक तानाशाहों के व्यवहार को ही छू पाती हैं।”15

प्रेम रवीन्द्रनाथ की कविताओं का प्रमुख विषय है, जो प्रकृति, मानव से होता हुआ समस्त पृथ्वी तक जाता है। बांगला साहित्य का इतिहासकार सुकुमार सेन ने सही लिखा है कि ”जीवन के प्रति रवीन्द्र नाथ का दृष्टिकोण स्वीकृति, प्रशंसा और कृतज्ञता का था, क्षोभ और शिकायत का नहीं।”16

रवीन्द्रनाथ टैगोर हिन्दी के निराला व बांगला के नजरूल इस्लाम की तरह विद्रोही नहीं थे, लेकिन मुक्ति की चाह उनकी रचनाओं के केन्द्र में है। बार-बार विभिन्न विधाओं में इसे व्यक्त करते हैं। ”दो पंछी”17 कविता में पिंजरे में बंद पंछी और जंगल के पंछी के बीच संवादों के जरिये ऐश्वर्य़पूर्ण गुलामी के प्रति हेय तथा कष्टपूर्ण आजादी के प्रति मोह रवीन्द्रनाथ के मंतव्य को उद्घाटित करने के लिए काफी है। रवीन्द्रनाथ के जीवन-अनुभवों और अन्तर्दृष्टि ने पहचान लिया था कि आजादी प्राप्त करने के संघर्ष में सबसे पहले खुद से संघर्ष करना पड़ता है। आजादी कभी खैरात में नहीं मिलती, उसके लिए कीमत चुकानी पड़ती है। ऐश्वर्य और सुविधापरस्त समाज की आजादी की चाह आत्मछलना है।

रविन्द्रनाथ के महात्मा गांधी जैसे राजनीतिक लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन वे राजनीति में कभी सक्रिय नहीं हुए। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रविन्द्रनाथ के राष्ट्रगान नामक निबंध में लिखा कि यह युग भारतवर्ष में राजनैतिक जागरण का युग है। रवीन्द्रनाथ ने किसी जमाने में राजनैतिक आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया था, परंतु बहुत शीघ्र ही उन्होंने देखा कि जिन लोगों के साथ उन्हें काम करना पड़ रहा है, उनकी प्रकृति के साथ उनका मेल नहीं है। रवीन्द्रनाथ अंतर्मुख-साधक थे। हल्ला-गुल्ला करके, ढोल पीट के, गला फाड़ के, लेक्चरबाजी करके जो आंदोलन किया जाता है, वह उचित नहीं जंचता था। देश में करोड़ों की संख्या में दलित, अपमानित, निरन्न, निर्वस्त्र लोग हैं, उनकी सेवा करने का रास्ता ठीक वही रास्ता नहीं है जिस पर वाग्वीर लोग शासक-वर्ग को धमकाकर चला करते हैं। शौकिया ग्रामोद्धार करने वालों के साथ उनकी प्रकृति का एकदम मेल नहीं था। जो लोग सेवा करना चाहते हैं उन्हें चुपचाप सेवा में लग जाना चाहिए। सेवा का विज्ञापन करना सेवा भावना का विरोधी है।18

राजनीतिक वैचारिक तौर पर वे सैन्यवाद और उग्र राष्ट्रवाद के खिलाफ थे।19 वे बहु-संस्कृति, विविधता और सहनशीलता के पक्षधर और विश्वबंधुत्व के समर्थक थे। संकीर्ण राष्ट्रवाद की उनके चिन्तन में कोई जगह नहीं थी। साम्राज्यवाद का सबसे क्रूर और स्पष्ट चेहरा युद्ध में नजर आता है। रवीन्द्र नाथ ने दो-दो विश्वयुद्धों से उत्पन्न त्रासदी को महसूस किया। युद्ध का दौर उनके लिए सर्वाधिक पीड़ादायी था। वे युद्ध के खिलाफ किसी राजनीतिक नफे-नुक्सान की गणना करके नहीं थे, बल्कि युद्ध को वे मानव-संस्कृति के विनाशक के तौर पर देखते थे। ‘जे युद्धे भाई के मारे भाई’ कविता जिसका मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद मोहनदास करमचंद गांधी ने किया है।

वह लड़ाई ईश्वर के खिलाफ लड़ाई है ,
जिसमें भाई भाई को मारता है ।
जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है ,
वह भगवान को अर्घ्य से वंचित करता है ।
जिस अंधेरे में भाई-भाई को नहीं देख सकता ,
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता ।
जिस उजाले में भाई भाई को देख सकता है ,
उसमें ही ईश्वर का हँसता हुआ
चेहरा दिखाई पड़ सकता है ।
जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है ,
तब अपने आप ईश्वर को
प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं) (हिन्दी अनुवाद मोहनदास करमचंद गांधी)

भारतीय नवजागरण के सवालों में स्त्री-मुक्ति का सवाल प्रमुख सवाल था। भारतीय रूढ़िवादी समाज में स्त्री की दशा दयनीय थी। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने घर में ही ऐसा देखा और उसे अपने साहित्य में स्थान दिया। परिवार नामक संस्था का जनतांत्रिकरण, स्त्री-पुरुष समानता, स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह आदि समस्याओं को संबोधित करता था। यद्यपि इसमें उत्तराधिकार व संपति के अधिकार शामिल नहीं थे, लेकिन तत्कालीन संदर्भ में यह काफी क्रांतिकारी था। इसका स्वरूप बेशक संरक्षणवादी था, लेकिन इससे जो चिंगारी निकली, उसी से स्त्री-मुक्ति के स्वतंत्र स्वर मुखरित हुए। रविन्द्र नाथ ने भारतीय समाज व परिवार में स्त्री की स्थिति का वर्णन करते हुए उसकी मुक्ति के लिए आवाज उठाई।

पश्चिम के आधुनिक ज्ञान और भारत की परम्पराओं के सांमजस्य बिठाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि “अन्य किसी भी भारतीय से अधिक उन्होंने पूर्व और पश्चिम के आदर्शों में सामंजस्य स्थापित करने में सहायता की है और भारतीय राष्ट्रीयता के आधार को व्यापक बनाया है। वह भारत के श्रेष्ठतम अन्तर्राष्ट्रीयतावादी रहे हैं, जिन्होंने अन्तर्राष्टीय सहयोग में न केवल विश्वास किया है, वरन् उसे बढ़ाने का प्रयत्न किया है, भारत के संदेश को दूसरे देशों में पहुंचाया है और इन देशों को हमारी जनता तक लाये हैं।”20 उनको पश्चिम के साहित्य और विज्ञान की गहरी समझ थी तथा भारतीय इतिहास और संस्कृति की नस नस से वे पूर्णत: वाकिफ थे। रविन्द्रनाथ ने अपनी परम्परा का मूल्यांकन तार्किक ढंग से किया। न तो उन्होंने परम्परा का अंधानुकरण किया और न ही आधुनिकता का। परम्परा के मामले में मालविकाग्निमित्रम् में कालिदास का कथन ही उनका आदर्श था।

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।।21

परम्परा के मूल्यांकन में उनका दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं था। वे गतिमान परम्परा में विश्वास करते थे। अपने विचारों को उन्होंने अपनी कविता में व्यक्त किया है।

जे नदी हाराए स्रोत चलिते ना पारे
सहस्त शैवाल-दाम बाँधे आति तारे
जे जाति जीवनहारा अचल असार
पदे-पदे बाँधे तारे जीर्ण लोकाचार
सर्वजन सर्वक्षम चले जेई पथे
तृण-गुल्म से था नाहि जन्मे को मते
जे जाति चलेनाकम् तारि पथ परे
तंत्र मंत्र संहितार चरण ना सरे।

(जिस नदी का प्रवाह रुक जाता है वह फिर बह नहीं सकती। फिर तो सेवार की हजारों जंजीरें उसे आकर जकड़ लेती हैं। जिस जाति की जीवंतता नष्ट हो गई है, जो जाति अविचल और जड़वत हो गई है, उसे भी पग-पग पर जीर्ण लोकाचार जकड़ लेते हैं। जो आम रास्ता है, जिस पर लोग चलते-फिरते हैं, उसमें कभी घास नहीं उग सकती। इसी तरह जो जाति कभी चलती नहीं है, उसके पथ पर तंत्र मंत्र और संहिताएं भी पंगु होकर रह जाती हैं।)

”वे हमेशा हर कोने से और हर स्रोत से ग्रहण करने के लिए तत्पर रहते थे – अंग्रेजी कविता से लेकर बांगला गीतों तक, और अत्यधिक जटिल शास्त्रीय सिम्फनी से लेकर सरलतम ग्रामीण धुनों तक। लेकिन जो कुछ भी ग्रहण करते थे उसे अपने रंग में रंग लेते थे, वे किसी भी प्रकार के अनुकरण में असमर्थ थे।”22

परम्परा के प्रति विवेकपूर्ण रवैया व निर्भीक आलोचना उनके चिन्तन को विश्वसनीयता प्रदान करता है। वर्तमान जीवन से परम्परा को तथा परम्परा से वर्तमान जीवन को समझने की अद्भुत टेक्नीक विकसित की। भारतीय दर्शन की अद्भुत कृति गीता पर टिप्पणी इसे समझा जा सकता है। सन् 1932 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ईरान के शाही निमन्त्रण पर वायुमार्ग से ईरान गए थे। इस हवाई यात्रा का वर्णन उन्होंने अपनी फारस में नामक छोटी सी पुस्तिका में किया है। उन्होंने लिखा कि वह पृथ्वी जिसे मैं उसकी विविधता और निश्चयात्मकता वाली वस्तुओं का संज्ञान कराने वाली के रूप में जानता हूँ, अस्पष्ट सी होने लगी और इसका त्रिआयामी स्वरूप सिमटकर द्विआयामी यानी चित्र की तरह प्रतीत होने लगा। …मुझे ऐसा लगने लगता है कि उस स्थिति में जब मनुष्य इतनी ऊंचाई से सैंकड़ों विनाशकारी शस्त्रों को बरसाता है वह कितना नृशंस हो सकता है। वह इस अपराध की भयानकता से किंचित भी विचलित नहीं होता जो उसके उठे हुए हाथ को संकोच से कंपा सकती और रोक सकती थी, अगर वह मारे जाने वालों की वास्तविक संख्या को जान सकता लेकिन वे तो उसके सामने आ ही नहीं पाते। लेकिन जब वह यथार्थ जिससे मनुष्य का घनिष्ठ संबंध रहता है, धुंधला हो जाता है तो उस घनिष्ठता का आधान भी तिरोहित हो जाता है। गीता में प्रस्तुत उपदेश और दर्शन इसी तरह का एक ऐरोप्लेन है – अर्जुन की चेतना को जो कि करुणा से पूर्ण थी उसे ऐसी ही ऊंचाई पर ले जाया गया, जहां कोई यह नहीं पहचान  सकता था कि कौन वधिक है और कौन वध्य। कौन सगा संबंधी है और कौन अजनबी। मनुष्य के आयुधागार में ऐसे कितने ही ऐरोप्लेन भरे पड़े हैं जो दर्शनों से निर्मित हैं जो सामाजिक धार्मिक सिद्धांतों के रूप में उस यथार्थ को ढँक लेते हैं जो साम्राज्यवाद या विस्तारवाद की नीतियों से पैदा होता है। इसमें उसके लिए केवल यही संतोष बचा रहता है, जब भी उस पर विनाश फट पड़ेगा – न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।23

रवीन्द्रनाथ की मृत्यु पर गांधी जी ने कहा था कि “गुरुदेव की देह खाक में मिल चुकी है, लेकिन उनके अंदर जो जोत थी, जो उजाला था, वह तो सूरज की तरह था, जो तब तक बना रहेगा, जब तक धरती पर जानदार रहेंगे। गुरुदेव ने जो रोशनी फैलाई वह आत्मा के लिए थी। सूरज की रोशनी जैसे हमारे शरीर को फायदा पँहुचाती है, वैसे गुरुदेव की दी हुई रोशनी ने हमारी आत्मा को ऊपर उठाया है।… वे तो बस गुरुदेव ही नहीं थे, वे तो ऋषि थे।”24 आज हमारा समाज साम्प्रदायिकता, धार्मिक पाखण्ड, जातिगत कट्टरता, साम्राज्यवादी शोषण, मानवीय मूल्यों के पतन, चारित्रिक पतन के संकटों से जूझ रहा है। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए रवीन्द्रनाथ के साहित्य में मौजूद चेतना को जन जीवन का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है।

संदर्भः

1.स्वाधीनता, (शारदीय विशोषांक 2007); सं.-राम आह्लाद चौधरी; (अनुनय चट्टोपाध्याय का लेख रवीन्द्रनाथ और मानवतावाद से);  31, अलीमुद्दीन स्ट्रीट, कोलकाता; पृ.-254

2.असित कुमार बंद्योपाध्याय (सं.); रवीन्द्र रचना संचयन (जीवन स्मृति); साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2009, पृ.-549

3.रविन्द्र रचना संचयन; कवि-कथा

  1. सव्यसाचि भट्टाचार्य(सं.); महात्मा और कवि; नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया; चौथी आवृति 2009; पृ.-185
  2. के. दामोगरन; भारतीय चिन्तन परम्परा(अनु.- जी. श्रीधरन); पीपुल्स पब्लिशिंग हाऊस (पआ.) लि., दिल्ली; चौथा सं. 2001; पृ.- 443
  3. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 194
  4. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 195
  5. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 217
  6. सव्यसाचि भट्टाचार्य(सं.); महात्मा और कवि; नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया; चौथी आवृति 2009; पृ.-15
  7. स्वाधीनता (शारदीय विशोषांक 2007); सं.-राम आह्लाद चौधरी (अनुनय चट्टोपाध्याय का लेख रवीन्द्रनाथ और मानवतावाद से); 31, अलीमुद्दीन स्ट्रीट, कोलकाता; पृ.-256
  8. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 221
  9. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 268
  10. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 106
  11. हजारीप्रसाद द्विवेदी व अन्य(अनु.); रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 195
  12. 15. सव्यसाचि भट्टाचार्य(सं.); महात्मा और कवि; नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया; चौथी आवृति 2009; पृ.-205
  13. सुकुमार सेन; बांगला साहित्य का इतिहास; साहित्य अकादमी,दिल्ली; 2004;पृ.-240
  14. रवीन्द्रनाथ की कविताएं; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2008; पृ.- 57
  15. हजारी प्रसाद द्विवेदी; अशोक के फूल; पृ.-125
  16. रवीन्द्रनाथ टैगोर; राष्ट्रवाद (अनु. सौमित्र मोहन); नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया; चौथी आवृति 2003; पृ.-पंद्रह
  17. जवाहरलाल नेहरू; भारतः एक खोज;
  18. डा. ब्रह्मानन्द त्रिपाठी(सं.); कालिदास ग्रंथावली; चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन,वाराणसी; 1996; पृ.-570
  19. सुकुमार सेन; बांगला साहित्य का इतिहास; साहित्य अकादमी,दिल्ली; 2004; पृ.-238
  20.  
  21. देवी प्रसाद; रवीन्द्र नाथ ठाकुरः शिक्षा और चित्रकला; पृ.-1

2 thoughts on “रविन्द्रनाथ टैगोरः विराट भारतीय आत्मा- डा. सुभाष चंद्र

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    Anonymous says:

    टैगोर के बारे में एक नजरिया यह भी है –
    न तो टैगोर बंगाल के सबसे महान लेखक थे और न बोस वहां के सबसे महान क्रांतिकारी
    जस्टिस मार्कंडेय काटजू ऐसा क्यों मानते हैं कि रबींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस बंगाल के सबसे महान लेखक और क्रांतिकारी नहीं थे
    https://satyagrah.scroll.in/article/17483/bengal-subhash-chandra-bose-rabindranath-tagore
    चूंकि अंग्रेज शरत चंद्र की लोकप्रियता से डर गए थे इसलिए उन्होंने यीट्स के माध्यम से टैगोर को स्थापित किया. उनका लक्ष्य था कि साहित्य को क्रांति की दिशा से मोड़कर – जो उसे शरत चंद्र दे रहे थे – हानिरहित दिशा में ले जाया जाए. टैगोर बंगाली साहित्य को अध्यात्म और रहस्यवाद की तरफ ले गए जबकि भारत जैसे गरीब देश के लिए यह बेमतलब हैं. ग्राहम ग्रीन (अंग्रेजी भाषा के साहित्यकार) का कहना था कि यीट्स के अलावा कोई भी टैगोर को गंभीरता से नहीं लेता, यहां तक कि बाद में यीट्स भी टैगोर के खिलाफ हो गए. उनका कहना था कि टैगोर ने भावुकताभरी कोरी बातें लिखी हैं.
    ग्राहम ग्रीन का कहना था कि यीट्स के अलावा कोई भी टैगोर को गंभीरता से नहीं लेता. बाद में यीट्स भी टैगोर के खिलाफ हो गए. उनका कहना था कि टैगोर ने भावुकताभरी कोरी बातें लिखी हैं.
    मुख्यरूप से कला और साहित्य के दो सिद्धांत हैं. कला, कला के लिए और कला समाज के लिए. जो पहली विचारधारा को मानते हैं उनके हिसाब से कला और साहित्य का मकसद सिर्फ खूबसूरत और मनोरंजक रचनाएं देना है. वहीं दूसरी विचारधारा के लोग इस बात में यकीन करते हैं कि कला और साहित्य को सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करना चाहिए. उन्हें दमनकारी रीतिरिवाजों और रूढ़ियों से लड़ने के लिए लोगों की मदद करनी चाहिए और लोगों को बेहतर जिंदगी के संघर्ष की प्रेरणा देनी चाहिए. शरत चन्द्र इसी दूसरी विचारधारा से आते थे. उनकी लेखनी ने बंगाल की कई शोषणकारी प्रथाओं और रीति-रिवाजों को काफी हद तक कमजोर कर दिया था.
    https://satyagrah.scroll.in/article/17483/bengal-subhash-chandra-bose-rabindranath-tagore

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      Prof. Subhash Chander says:

      रवींद्रनाथ टैगोर भी महान थे और शरत भी. एक को महान बनाने के लिए किसी दूसरे को लतियाने की कोई आवश्यकता नहीं. टैगोर की कविताएं और लेख रेडिकल हैं भावुकता तो छू भी नहीं गई. समाज का कडुवा यथार्थ ही उनकी रचनाओँ का आधार है.

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