डगमगाती लोकतांत्रिक व्यवस्था -डा. सतीश त्यागी

सामयिकी


                हरियाणा को राज्य के रूप में अस्तित्व में आये पचास साल हो चुके हैं। आधी सदी की यात्रा पूर्ण होने पर उत्सवी माहौल स्वाभाविक है और एक मौका भी है कि पीछे मुड़ कर देख लिया जाए कि कितना कुछ बदलाव आया है और इस बदलाव के क्या मायने हैं ? मैं मूलत: हरियाणवी नहीं हूँ लेकिन पिछले चालीस साल से इस राज्य में हूं और यही कारण है कि काफी हद तक वस्तुनिष्ठ तरीके से सोचने का दावा कर सकता हूं।

                पहली बात तो यह है कि पिछले पचास वर्षों में जो बदलाव पूरी दुनिया और देश में आये हैं, उनसे हरियाणा भी प्रभावित हुआ है, हालांकि इन परिवर्तनों में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं है। विज्ञान और तकनीक ने समूची दुनिया को बदला है तो जाहिर है कि भारत और उसके लोगों को भी बदलना ही था। ये बदलाव मामूली नहीं बल्कि क्रांतिकारी रहे हैं ,जिन्होंने हरियाणवी समाज को भी बदला है लेकिन शेष भारत से तुलना की जाए तो हरियाणा के लोगों ने अपनी पुरानी परम्पराओं को न केवल सहेज कर रखने की कोशिशें की है बल्कि उन्हें बनाए रखने के लिए संघर्ष भी किया है,जो अभी भी जारी है। सोच के स्तर पर जो परिवर्तन अपेक्षित था, उसका अभाव साफ-साफ देखा जा सकता है।

                बेशक भौतिक रूप से समाज समृद्ध दीखता है लेकिन उसे प्रगतिशील समाज कहने में हिचक होती है । ऐसा नहीं है कि हरियाणवी समाज में प्रगतिशील तत्व नहीं हैं, बिल्कुल हैं लेकिन वे अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए हैं। शिक्षा के क्षेत्र को ही लें। प्रदेश में स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की भरमार है लेकिन समाज में उस अनुपात में बौद्धिकता का सर्वथा अभाव है। विगत चालीस वर्षों से मैं खुद रोहतक सरीखे शहर में देख रहा हूँ कि आज भी किताबों की दुकानों का स्तर वैसा ही है जैसा था। मुझे नहीं लगता कि इस दौरान एक भी स्तरीय बुक स्टोर शहर में खुला है। पाठ्यक्रम से इतर पुस्तकें शायद ही आपको किसी बुक स्टोर पर देखने को मिलें और जो मिलेंगी भी वे एक गंभीर पाठक को निराश ही करेंगी। यदि पिछले पचास वर्षों में हम हरियाणवी बौद्धिकता के क्षेत्र में बंगाल के बाजू में भी खड़े हो सकते तो,यह एक बड़ी उपलब्धि होती।

                आज भी हमारे युवा नौकरी, विशेषत: सरकारी नौकरी के उन्मादी आकर्षण से ग्रस्त हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमारी प्रगति उल्लेखनीय स्तर की नहीं है। लिंगानुपात और कुपोषण की समस्याएं हमारे मस्तक पर चस्पां हैं। हां , लोगों के पास पैसा बढ़ा है और उसके फलस्वरूप साधन भी बढे हैं। जिंदगी में मौज -मस्ती बढ़ी है। ढांचागत विकास भी कुछ हिस्सों में देखा जा सकता है लेकिन गांव आज भी ‘गांव’ ही हैं। मेरे कहने का आशय यह है कि जो भौतिक विकास दीखता है,वह तो दुनिया भर में हुआ है लेकिन हमारे समाज की अंतर्निहित शक्ति का सकारात्मक व सार्थक विकास कहां है?

                सूबे की नवजात अवस्था में ही हमारी राजनीति देश भर में ‘कुख्यात’ हो गयी थी। दल-बदल के कीर्तिमानों ने हमें ‘आयाराम-गयाराम प्रदेश’ के रूप में पहचान दे दी थी और आज आधी सदी बाद भी हमारे राज्य में राज्यसभा का चुनाव अनैतिक तरीकों से जीता जाता है। लोकतान्त्रिक संस्थाएं आखिरी सांसें ले रही हैंं। इसी साल फरवरी के महीने में समूचे विश्व ने हमारे सामाजिक सद्भाव की धज्जियां उड़ती हुई देखी हैं। यह कोई साधारण हादसा नहीं था बल्कि ‘केटास्ट्रोफ’ था लेकिन उसके बाद हमारा राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व ‘कोमा’ में है, पूर्णत: दिशाहीन। उत्सवी माहौल में मैंने निश्चित ही निराशाजनक तस्वीर उकेरी है लेकिन असल तस्वीर तो यही है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर 2016 से फरवरी 2017, अंक-8-9), पेज- 42
 
 

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