सब के अपने दर्द हैं दुश्वारियां हैं बेहिसाब – डा. सुभाष सैनी

ग़ज़ल


सब के अपने दर्द हैं दुश्वारियां हैं बेहिसाब
हर किसी से पूछते हो क्यों सवालों के जवाब

जि़ंदगी में ग़म मिले तो $गम न करना दोस्तो
मुस्कराना इस तरह कि जैसे कांटोंं में गुलाब

चाहते हो तुम कि तुम से फिर वही बातें कहूं
क्या करूं मैं खो गई है मेरी माज़ी की किताब

कोई सुनता ही नहीं है अब किसी की दास्तां
किस को दूं मैं जि़ंदगी के गुज़रे लम्हों का हिसाब

बेवफाई को बताया उसने अपनी बेबसी
इस कदर उसने दिया है मेरी उल्फ़त का जवाब

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर 2016 से फरवरी 2017, अंक-8-9), पेज- 68
 

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