ग़ज़ल
जिंदगी की धूप में अब जल रहा है आदमी
शूल हैं राहों में लेकिन चल रहा है आदमी
भीड़, हिंसा, कर्फ्यू लाशें और निरन्तर बेबसी
अब तो बस, इस दौर में, यूं जल रहा है आदमी
अब दिलों की तो दिलों से बढ़ गई हैं दूरियां
पर जमीं से आसमां तक चल रहा है आदमी
हर बशर बेचैन है, गमगीन है इस दौर में
बर्फ़ की मानिंद अब तो गल रहा है आदमी
जानकर भी सब खबर, रहता है फिर भी बेखबर
खुद से खुद को इस तरह अब छल रहा है आदमी
आदमी की दास्तां को देखकर लगता है अब
आज भी वैसा है जैसा कल रहा है आदमी
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर 2016 से फरवरी 2017, अंक-8-9), पेज- 68