ओबरा -विपिन चौधरी

हरियाणवी कविता


जद ताती-ताती लू चालैं
नासां तैं चाली नकसीर
ओबरे म्हं जा शरण लेंदे
सिरहानै धरा कोरा घड़ा
ल्हासी-राबड़ी पी कीं
काळजे म्हं पड़दी ठंड
एक कानीं बुखारी म्हं बाळू रेत मिले चणे
अर दूसरे कानीं, गुड़ भरी ताकी
गुड़ नैं जी ललचाया करदा
अर दादी धोरै रहा करदी ताकी की चाबी
सारी दुपहरी ओबरे म्हं काट्या करदे
स्कूल का काम भी करा करदे ओड़ै
फेर सोंदे खरड़-खरड़
ओबरे की मोटी कांध
लिप्या-पोत्या फर्श
कांधां छपे मोर-मोरनी
छातां पड़ी कड़ी शहतीर
तपदी गर्मी चाल्या करदी लू
रोटियां का छींक्का भर्या
ल्हासी भरी बिलौणी
चण्यां की चटणी
ना कोए पंखा ना बीजळी का खर्चा
ऊकडू बैठ खांदे रोटी
मण आजकाल की बात न्यारी
ओबरा ढाह कीं बणाया घर
सबके कमरे न्यारे-न्यारे
बिजळी जावै घड़ी-घड़ी
पसीनां के पत्ल्हाणे छूट रहे
जक पड़ी पेडै ना मादी सी
ओबरा तूं याद आया घड़ी-घड़ी
ओबरा ढाह क गरम होया घर
गरम हुई सारयां की तासीर
ग्लोबल वार्मींग के झमेले म्हं
उळझे सारे गरीब-अमीर
पुराणी सोच पुराणी बात
घूम-फिर के फेर आणी
वास्तुकला का बहाना बण कै
ओबरे नैं दिन आवेंगे फेर

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर 2016 से फरवरी 2017, अंक-8-9), पेज- 109
 

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