कटते हुए दरख्त की चीखें -सुरेश बरनवाल

कविता


तुम्हें पूरा हक है
खुद के खिलाफ युद्ध छेड़ देने का
दरख्तों की हत्या करने का।
कटे हुए इन दरख्त की चीखें
अमानत होंगी तुम्हारे भविष्य की।
यह तमाम चीखें
तुम्हारी संतानों को विरासत में मिलेंगी
और वह भी चीखेंगे
उनकी चीख कराहों में भी बदलेगी
वह भी झेलेंगे विभीषिका युद्ध की।
वह चाहेंगे तो भी
उस दरख्त को नहीं ढूंढ सकेंगे
जिसने तुम्हारे हाथों कटते हुए
चीखों के बीज फैला दिए थे।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज-33
 

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