सवालों का जंगल -सुरेश बरनवाल

कविता


तुमने फिर वही किया
सवाल जो उठा था
उसे वहीं छोड़ दिया/अनुत्तरित
हालांकि वह पथरीली सड़क है
पर सवाल के बीज को उगना है
प्रश्न-प्रतिप्रश्न बनना है
उसे पथरीली सड़क का सीना फोड़ना है।
उसकी जड़ें भूमिगत यात्रा करेंगी
वहां-वहां जाएंगी
जहां-जहां तुम जाओगे
या तुम्हारी संतानें बसेंगी
वह तुम्हारे साथ रहेंगी हमेशा
यदि तुमने उनका उत्तर नहीं दिया।
संभव है
तुम और भी सवाल उठाओ
और उन्हें भी अनुत्तरित छोड़ दो
वही होगा
उनके बीज भी उगेगें
और भूमिगत उनकी जड़ें
आपस में उलझकर
सवालों का जंगल बनाएंगीं।
तुम अपने ही बनाए इन जंगलों से
नहीं बच सकोगे
एक दिन तो विद्रोह की कोई चिंगारी उठेगी
और तुम जल जाओगे।
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज-34

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