कितनी ही बार -सुरेश बरनवाल

कविता


कितनी ही बार
कोई पिघलती नदी
पहाड़ों से उतरती ठिठक जाती है
मैं किसी चट्टान पर
जब उसे उदास बैठा मिलता हूं।
कितनी ही बार
आसमां पर चढ़ता सूरज
बादल की ओट से
एक किरण मुझें फेंक मारता है
और छिप जाता है
मानो आंख मिचौली खेल रहा हो।
कितनी ही बार
तेजी से बहती हवा
मेरे पास आती है
मुझे छूती है, पुचकारती है
मेरा हाल पूछती है
और मेरे गालों पर थपकी देती है।
कितनी ही बार
अपनी मां की उंगली पकड़े
राह चलता कोई बच्चा
मुड़ कर मुझे देखता है
मुस्कराता है
और एक अनजान रिश्ता बांध जाता है।
कितनी ही बार
मैं खुद को
यूं कभी अकेला नहीं पाता।
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज-34
 

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