राधेश्याम भारतीय – दु:ख

लोक कथा



गांव में कर्मवीर के पिता की मृत्यु के बाद मास्टर जी  उसके घर शोक प्रकट करने आए थे।
”बेटे! मुझे कल ही पता चला था कि तुम्हारे पिता जी इस दुनिया में …।’’
यह सुुनते ही कर्मवीर की आंखें नम हो गई और कहने लगा – मास्टर जी, पिता जी तो हमें मुसीबतों की दलदल में डाल गए।’’
”क्या!’’
‘हां मास्टर जी, आप तो जानते ही हैं,  शराब तो वे पीते ही थे। कई साल से तो दूसरे नशे भी करने लगे थे।’’
”हां, यह लत तो उन्हें शुरू से थी। फिर क्या हुआ?’’
”मास्टर जी, वे सारा दिन नशे में धूत रहते थे। मेरी मां से पैसे मांगते , मां कहांं से देती। मां को पीटते। कभी-कभी तो हम भाई- बहनों को पीट डालते।’’
”किसी ने समझाने का प्रयास नहीं किया?’’
”किया था एक बार फूफा जी ने।’’
”तो कोई असर पड़ा?’’
”कहां मास्टर जी, वे पहले से भी ज्यादा पीने लगे। पियक्कड़ों के साथ शहर के बड़े-बड़े होटलों में जाकर जुआ खेलने लगे। हमें तो तब पता चला जब  उन्होंने एक एकड़ जमीन ओने-पोने भाव में बेच डाली। मां ने पैसे बारे पूछा तो उसे ही खरी-खोटी सुनाने लगे। मां माथा पीटकर रह गई …। ‘‘
”तो मृत्यु कैसे हुई उनकी?’’
”दो चार महीने गुजरे कि एक रात लड़-झगड़कर घर से निकल गए। सुबह पता चला कि वे सड़क किनारे मरे पड़े हैं….।’’
”ओहो! भगवान उनकी आत्मा को शांति दे …।’’
”मास्टर जी, पिता जी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। अभी चार दिन पहले ही जमींदार का लड़का आया था, कहकर गया कि तुम्हारे  पिता जी ने पचास हजार रूपये  लेकर खेत गिरवी रखा था …।’’
”यह तो बड़े दुख की बात बताई।
”मास्टर जी, अब हमें दिहाड़ी करके घर का गुजारा करना पड़ रहा है।’’
”बेटा, इसमें दुखी होने की बात नहीं। कमा कर खाने में कैसा दुख?’’
”मास्टर जी, दु:ख कमाकर खाने में नहीं बल्कि दुख इस बात का है … कि आज हमें अपने ही खेतों पर दिहाड़ी करनी पड़ रही है …।’’ इतना कहते हुए उसकी आवाज भर्रा गई और वह आगे कुछ न कह सका।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देसहरियाणा (जुलाई-अगस्त, 2017, अंक-12), पेज – 47

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