सामण की रूत -विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

हरियाणवी कविता


मींह बरसै सामण की रूत मै
गात हंगाई कर रह्या री।
कद आवैगा भरतार बता दे
दिल कोनी डाटे डट रह्या री।

महीने भर का नाम लिया था
एक साल भी टप ग्या री।
कद लेगा सुध आण बता दे
बाट देख दिल थक ग्या री।

रोटी भी ना अच्छी लागैं
गाम हंसाई कर रह्या री।
पीला पड़ ग्या गात मेरा
के नाग बिरह का लड़ ग्या री।

ना देख्या मन्नै ब्याह का सुख
बणवास ज्यूं पल-पल कट रह्या री।
होली, दीवाली अर तीज त्योहार
बिना तेरे कुछ ना बणता री।

बागां म्हैं बोलैं मोर, पपीहा
काग भी कांव, कांव कर रह्या री।
रूक्खां पै नए-नए पत्ते आगे
आण देख, क्यूं हठ कर र्या री।

 तू बॉडर पै लड़ै लड़ाई
घर मेरा बॉडर बण रह्या री।
जै दस दिन भीतर ना आया
जी मेरा लिकड़ के पड़ ज्या री।

 – विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

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