डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल – रचना के कलात्मक और ज्ञानात्मक मूल्यों का सहयोजन

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आलेख


इस प्रश्न पर विचार करते समय सबसे पहले हमें यह याद रखना होगा कि किसी भी रचना के कलात्मक और ज्ञानात्मक पक्षों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना हमारे साहित्य संबंधी चिंतन में भाववादी संस्कारों के बने रहने का द्योतक है। प्रगतिवादी साहित्यधारा से आम पाठक को विमुख करने तथा साहित्यकारों के मन में भ्रांतियां उत्पन्न करने के लिए ही आज से लगभग बीस-पच्चीस साल पहले अज्ञेय तथा उनके अनुयायियों ने इस धारणा का बड़ा जोर-शोर से प्रचार आरंभ किया कि प्रगतिवादी रचनाओं का ज्ञानात्मक पक्ष कितना ही सबल हो, कला की दृष्टि से वे अक्सर कमजोर बनी रहती है क्योंकि वहां रचनाकार के सैद्धांतिक दुराग्रह तथा सामाजिक राजनैतिक दायित्व आवश्यकता से अधिक छाये रहते हैं। इन चिन्तकों के अनुसार किसी रचना का कलात्मक मूल्य उसके ज्ञानात्मक मूल्य से बिल्कुल अलग होता है। यदि हम रचना के कलात्मक मूल्य को उसके ज्ञानात्मक मूल्य पर आधारित मानने लगें तो फिर धर्मग्रंथ और आचार-संहिताएं, समाजविज्ञान के शोध-ग्रंथ अथवा विभिन्न राजनैतिक दलों के घोषणा-पत्र ‘शुद्ध’ साहित्यिक रचनाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण नजर आने लगेंगे। इन चिंतकों की राय में किसी रचना का कलात्मक मूल्य इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वहां क्या कुछ कहा जा रहा है अथवा आसपास के जीवन के बारे में हमें कितने तथ्यों से अवगत कराया जा रहा है, बल्कि हमें देखना यह होता है कि वहां रचनाकार ने अपनी संवेदना पर बाहरी जीवन से पड़ने वाले आघातों को कितनी पा्रमाणिकता के साथ शब्दबद्ध किया है। कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ रचना हम उसे कहेंगे जहां रचनाकार अपने ‘भोगे हुए यथार्थ’ को बिना किसी व्यवधान के पाठक तक सम्प्रेषित कर देता है। यदि रचनाकार सायास अर्जित जानकारी अथवा आंकड़ों का सहारा लेने लगता है तो इसका सीधा मतलब इन चिंतकों की नजरों में यही होगा कि या तो उसके पास किसी जीवंत अनुभव का आधार ही नहीं है या फिर उसे अपने अनुभव की सच्चाई में विश्वास नहीं है। इस मत के अनुसार वास्तव में एक शुद्ध साहित्यिक रचना में कोरी जानकारी की मात्रा शून्य के बराबर होनी चाहिए और उसकी कलात्मकता उस अनुभव की गहराई और जीवन्तता के अनुसार आंकी जानी चाहिए, जिनमें रचनाकार हमें शब्दों के माध्यम से भागीदार बनाना चाहता है। रचना के ज्ञानात्मक और कलात्मक मूल्यों के अलगाव और अन्तर्विरोध के इस प्रतिक्रियावादी सिद्धांत के विभिन्न पहलुओं को अच्छी तरह समझ लेने के पश्चात ही हम उनके ‘सहयोजन’ की समस्या पर ठीक-ठीक विचार कर सकते हैं।

वास्तव में ज्ञान को एक अतिसीमित अर्थ देकर ही रचना के कलात्मक और ज्ञानात्मक मूल्यों के अलगाव के सिद्धांत की स्थापना की जाती है। यदि ज्ञान को तथ्यों के संकलन अथवा सूत्रबद्ध जानकारी का पर्याय मान लिया जाए तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना बहुत आसान हो जाता है कि रचना के कुल प्रभाव में अथवा उसकी वास्तविक अर्थवत्ता में इसका केवल गौण स्थान होगा। हमें बताया जाता है कि शब्दों के माध्यम से प्रेषित होने वाले भावपुंज और उन्हें अन्तग्र्रथित करने वाले मानसिक आवेगों में ही एक रचना की प्राण शक्ति मौजूद होती है। यदि रचना में विद्यमान तथ्यों और विवरणों के पीछे यह रागात्मक ऊर्जा कम है तो रचना का कलात्मक मूल्य भी उसी अनुपात में सीमित बना रहता है। जब रचना में अनुबद्ध होने वाले भावपुंज औरर संवेदन स्थूल अथवा कृत्रिम हों तो कोरे तथ्यों के संयोजन के बल पर अथवा सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों के विवरणों के आधारपर उसे कलात्मक दृष्टि से मूल्यवान नहीं बताया जा सकता। यदि रचना के अंदर पायी जाने वाली जानकारी स्वयं रचनाकार अथवा हमारे समक्ष उभरकर आने आने वाले किसी अन्य पात्र की मानसिकता का अंग बनकर प्रस्तुत नहीं होती और उसके माध्यम से रचनाकार अथवा पात्र के भाव एवं  संवेदन सक्रिय होते हुए नज़र नहीं आते वहां उसकी उपस्थिति अखरने लगती है और वह रचना के लिए एक अनावश्यक भार बनकर उसके प्रभाव को कुन्द कर देती है। इस प्रकार के साहित्यिक चितन की एक परिणति कि यह स्थापना भी हो सकती है कि रचना में किसी प्रकार की जानकारी अथवा ज्ञान का समावेश होना अपने-आप में कोई महत्व नहीं रखता और वहां दृष्टिगोचर होने वाला समूचा ज्ञान वास्तव में मिथ्या ज्ञान अथवा आडम्बर मात्र होता है। किसी साहित्यिक रचना में ज्ञान का आभास हमें केवल इसलिए होने लगता है कि साहित्य का कला माध्यम भाषा है, जोकि हमारे निजी और सामूहिक ज्ञान के कोष का काम भी करती है। किन्तु हमें आगाह किया जाता है कि एक साहित्यिक रचना का अंग बनने के बाद शब्द अपना साधारण अर्थ खो देते हैं और जो नई अर्थवत्ता वे प्राप्त कर लेते हैं वह केवल उस विशिष्ट अनुभव के वाहक बनने से उत्पन्न होती है जो कि रचना का वास्तविक प्रमाण है।

‘ज्ञान’ और ‘अनुभव’ के इस पृथकीकरण में ज्ञान की परिभाषा तो सीमित होती ही है, ‘अनुभव’ की परिकल्पना भी दोषपूर्ण बनी रहती है। जाहिर है कि यहां व्यक्ति को बाह्य संसार से कटी हुई इकाई मान लिया जाता है, जिसका उसके साथ व्यापार उसके विभिन्न आघातों को सहते हुए कुछ भावतरंगों से उद्वेलित होते रहने तक सीमित रहता है। बाह्य जगत को समझने का प्रयास करना, उसके साथ संघर्ष करना उसे बदलना, उसके अंदर अपने जैसे व्यक्तियों की पहचान बनाकर उनके साथ तादात्मय स्थापित करना तथा अपने और उनके विरुद्ध पड़ने वाले व्यक्तियों से सामूहिक रूप में टक्कर लेता व्यक्ति अनुभव के इन सब आयामों को काटकर साहित्येतर ज्ञान की कोटि में रख दिया जाता है और यह घोषित कर दिया जाता है कि ये सब मुद्दे इन समाजशाियों अथवा वैज्ञानिकों के अध्ययन के विषय हैं जो मानव समाज और प्राकृतिक जगत के बारे में जानकारी अर्जित करने में लगे हैं।

एक रचनाकार तो अपनी संवेदना के धरातल पर ही स्पंदन महसूस कर सकता है और स्पंदनशीलता की अभिव्यक्ति ही उसकी रचना के कलात्मक मूल्य को निर्धारित करती है। व्यक्ति की वे प्रतिक्रियाएं जो उसे अन्य व्यक्तियों से जोड़ती हैं अथवा संघर्ष का रूप ले लेती हैं अनिवार्यत: इस प्रकार की स्पंदनशीलता की विकृति का सूचक मान ली जाती हैं। इसके अलावा इस प्रकार के चिंतकों द्वारा यह सवाल भी नहीं उठाया जाता कि रचनाकार की स्पंदनशीलता अथवा अनुभव क्षमता निर्मित कैसे होती है। आमतौर पर यही मान लिया जाता है कि यह प्रकृति की ऐसी देन है जो कुछ व्यक्तियों में मुखर रूप में विद्यमान रहती है और केवल ऐसे व्यक्ति ही कलाकृतियों की रचना कर सकते हैं। यहां यह समझने की कोशिश भी नहीं की जाती कि विभिन्न व्यक्तियों की संवेदनाओं और अनुभव क्षमताओं का रूप भिन्न-भिन्न कैसे हो जाता है। और वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग माध्यम क्यों चुनते हैं। विभिन्न रचनाकारों की काव्यानुभूति बुनावट को प्रकृति की उस रहस्यमय लीला का अंग मान लिया जाता है, जिसे हमें चकित-मुदित होकर देखते रह सकते हैं, समझ नहीं सकते। यदि कुछ अनुभववादी चिंतक यह स्वीकार भी कर लें कि सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ काव्यानुभूति की बुनावट में भी कुछ फेरबदल हो जाता है तो भी वे यह जानने का प्रयास नहीं करते कि सामाजिक परिवर्तनों की वास्तविक प्रक्रिया क्या है और काव्यानुभूति की बुनावट उन परिवर्तनों के साथ-साथ कैसे बदलती है। इन चिंतकों का आग्रह है कि इन सवालों को उठाते ही हम साहित्यिक चिंतन के क्षेत्र से बाहर कदम रख देते हैं। रचना के कलात्मक और ज्ञानात्मक मूल्यों को एक-दूसरे से अलग करके देखने के अधिकांश प्रयासों के मूल में इस प्रकार की रहस्यवादिता अवश्य छिपी रहती है।

व्यक्ति की प्रतिक्रियाओं की काट-छांट करके उन्हें व्यक्तिनिष्ट एवं निष्क्रिय (श्चड्डह्यह्यद्ब1द्ग) स्पन्दनों में परिवर्तन कर डालने के अलावा अनुभव की इस परिकल्पना के अंतर्गत हमारी सभी प्रतिक्रियाओं में बौद्धिक शक्तियों का जो योगदान होता है उसकी भी अवहेलना की जाती है। समाज में जीने वाले किसी भी प्रौढ़ व्यक्ति के अनुभव में उसकी बुद्धि और विश्लेषण शक्ति अनवार्य रूप में विद्यमान रहती है और उसकी भावनाओं को उभारने अथवा उन्हें दिशा प्रदान करने में उसकी बौद्धिक शक्ति की निर्णायक भूमिका होती है। हमारा अनुभव केवल शुद्ध ऐन्द्रिक भावानाओं और स्पन्दनों का पुंजमात्र नहीं होता। उसमें हमारे आसपास के संसार की सामाजिक जीवन को निर्धारित करने वाली मुख्य शक्तियों की कम-ज्यादा प्रखर पहचान हमेशा विद्यमान रहती है और इस पहचान के आधार पर हमारी भावनाओं का स्वरूप और उनकी दिशा बहुत हद तक तय होते हैं। भावनाओं और बुद्धि को एक-दूसरे से अलग करके हम भावनाओं को केवल उस स्थूल और यांत्रिक रूप में ही देख पाते हैं, जो समाज के प्रभुता-सम्पन्न तत्वों द्वारा संस्कारों के रूप में हम पर थोप दी जाती है और जिन्हें हम निश्चेष्ट रूप में आत्मसात कर लेते हैं या फिर उन्हें ऐसी मूलभूत जैविक प्रवृत्तियों के रूप में देखने लगते हैं जो किंचित सतही फेर-बदल के बावजूद सार रूप में आदिमकाल से मानव स्वभाव की कच्ची सामग्री बनी चली आ रही है। ऐतिहासिक विकास ने मानव अनुभव में जो आयाम जोड़े हैं, उन्हें इस प्रकार के चिंतन में लगभग पूरी तरह नकार दिया जाता है। सामाजिक जीवन में व्यक्ति को अपनी भूमिका के फलस्वरूप उसके व्यक्तित्व का कैसे निर्माण होता है, इसे भी समझ पाने की संभावना तब नहीं बची रहती। कोई भी व्यक्ति अपने विकास के प्रत्येक चरण में बुद्धि और भावना दोनों के माध्यम से अपने आसपास के जीवन के साथ उलझता रहता है और इस प्रकार अपनी क्रियाओं द्वारा ऐसी समझ उत्पन्न करता है जो  उसके तब तक के अनुभव के सारतत्व को लक्षित करती है। इसी समझ के आधार पर उसका व्यक्तित्व आगे विकास पाता है और इसी समझ के माध्यम से वह अपने नये-पुराने अनुभवों को एक-दूसरे से जोड़ता चलता है। ‘ज्ञान’ से हमारा तात्पर्य वास्तव में इसी ‘समझ’ अथवा पहचान से होना चाहिए जो व्यक्ति को अपने समूचे अनुभवों के फलस्वरूप प्राप्त होती है। इस समझ में बुद्धि और भावनाएं दोनों ही अभिन्न रूप से विद्यमान रहती हैं। एक व्यक्ति के अंतर-जगत और बाह्य-जगत में जितनी व्यापकता और तीव्रता होगी, उतनी ही प्रौढ़ता उसकी समझ में दृष्टिगोचर होगी। जब हम रचना के ज्ञानात्मक मूल्य को उसके अंदर पायी जाने वाली रचनाकार की व्यक्ति और समाज के बारे में इस प्रकार की समझ के रूप में देखने लगते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उसका कलात्मक मूल्य उसके ज्ञानात्मक मूल्य से भिन्न नहीं हो सकता।

यहां यह याद रखना भी उचित होगा कि एक रचनाकार अपने समय के जीवन के मर्म को कहां तक छू पाएगा, यह उसकी निजी क्षमताओं  के साथ-साथ उसके वर्ग-चरित्र पर भी निर्भर करता है। किसी भी वर्ग-विभाजित समाज में एक व्यक्ति की जीवन प्रतिक्रिया, जिसमें उसके राग-विरागात्मक आवेग उसकी चिंतन पद्धति तथा उसके कार्य सभी शामिल हैं, उसकी वर्गगत भूमिका से निर्धारित होती हैं, यदि वह शोषक वर्ग के साथ जुड़ा हुुआ है, तो उसका दृष्टिकोण, उसके भाव स्पन्दन, आवेग तथा उसके निर्णय एक विशेष स्वरूप अख्तियार करेंगे। वह केवल कुछ ही प्रश्नों को केंद्रीय महत्व देगा और उन्हीं के गिर्द उसकी सारी मानसिक ऊर्जा केंद्रित हो जाएगी। समकालीन जीवन के बहुत सारे प्रश्रों को वह एकदम अनदेखा कर देगा। वह या तो समाज की परिवर्तनगामी शक्तियों के अस्तित्व से ही अनभिज्ञ रहेगा या उनसे भयभीत होकर उन्हें लांछित करने लगेगा। इसके विपरीत यदि कोई रचनाकार अपने-आपको बहुसंख्यक मेहनतकश जनता का अंग मानकर चलता है तो उसकी भावनाओं की दिशा, उसका दृष्टिकोण तथा उसकी क्रियाएं अर्थात् वस्तुस्थिति की उसकी पूरी समझ भिन्न प्रकार की होगी। मेहनतकश जनता के संघर्षों से जुड़े हुए ज्वलंत प्रश्नों को वह अपनी रचनाओं के केंद्र में रखेगा और उन पर प्रखर रोशनी डाल कर ही अपनी रचनाओं के कलात्मक मूल्य को बढ़ाएगा। उन सभी लेखकों को हम प्रतिक्रियावादी कहेंगे, जिनकी चेतना (अर्थात् उनकी संवेदना और चिंतन पद्धति दोनों ही) ऐसे  वर्ग के जीवन मूल्यों और विशेष दृष्टिकोण से अनुशासित है, जो ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में पिछड़कर प्राकृतिक शक्तियों के विकास को अवरुद्ध करने लगा है। व्यक्तिगत रूप से ऐसा कोई लेखक अपने-आपको भले ही बड़ा ही स्पन्दनशील, ईमानदार और प्रखरबुद्धि वाला मानता हो, तत्कालीन जीवन की केंद्रीय सच्चाईयों की ठीक पहचान करना उसके लिए संभव नहीं होगा और उसकी यह कमजोरी भावनाओं की जड़ता और चिंतन की असंगतियों में समान रूप से एक साथ व्यक्तहोगी। धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा अथवा अशोक वाजपेयी आदि कवियों की रचनाएं यदि आज हमें कलात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण दिखाई नहीं देती तो इसीलिए कि उनकी रचनाओं में समकालीन वस्तुस्थिति की सही समझ उभर कर नहीं आती, गलत दृष्टिकोण अपना लेने के कारण ऐेसे सभी कवि आज के जीवन के केंद्रीय मसलों को या तो छू नहीं पाते या फिर उन्हें विकृत अथवा अमूर्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं। तत्कालीन जीवन के मार्मिक पक्षों से असम्बद्ध होने के कारण ऐसे कवियों की रचनाओं में व्यक्त होने वाली भावनाएं भी हमें जड़ और खोखली अथवा छिछली दिखाई देंगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जिन रचनाओं का ज्ञानात्मक मूल्य कम है वे कलात्मक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।

पिछले दशक में अकवितावादियों की रचनाओं में जो विध्वंसक और नकारवादी स्वर दिखाई देते हैं उसके सही स्वरूप को भी हम उसके पीछे छिपे तत्कालीन जीवन की प्रतिक्रियावादी समझ को ध्यान में रखते हुए पहचान सकते हैं। अधिकांश अकवितावादी कवियों ने पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत होने वाले मानव स्वभाव के प्रदूषण को ही अंतिम सत्य मान लिया और इस के आधार पर उन्होंने सभी मानवीय मूल्यों को मिथ्या घोषित कर दिया। इस प्रकार के अधिकांश कवियों के आक्रोश के पीछे जो नपुंसक समर्पण की भावना छिपी हुई थी वह धीरे-धीरे सामने लायी गई है और इस प्रकार उनकी संवेदना और चिंतन पद्धति का प्रतिक्रियावादी चरित्र स्पष्ट होता गया है। अकवितावादी रचनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि ऊपर से कोरे भावावेश को लेकर चलती हुई दिखायी देने वाली कविता में भी केवल भावावेश ही नहीं, तत्कालीन वस्तुस्थिति  की एक गलत समझ भी विद्यमान रहती है। ज्योंही अकवितावादी काव्यधार से प्रभावित कुछ रचनाकारोंं की वस्तुस्थिति की समझ में सुधार आने लगा और उनकी भावनाओं में भी निखार आनेे लगा और उनकी रचनाओं का काव्यात्मक मूल्य बढ़ गया। ज्यों-ज्यों धूमिल, लीलाधर जगूड़ी तथा कुमार विकल जैसे कवि अतिकवितावादी समझ के अति सरलीकरणों और विकृतियोंं से मुक्त होते गए, त्यों-त्यों उनकी रचनाओं की गंभीरता और सार्थकता बढ़ती चली गई। जहां कुमार विकल जैसे कवि अपने बदले हुए दृष्टिकोण और वस्तुस्थिति की सही समझ के बल पर सशक्त जनवादी कविता की रचना करने लगे वहां जगदीश चतुर्वेदी, कैलाश वाजपेयी, सोमित्रमोहन और मणिमधुकर जैसे कवि वस्तुस्थिति की गलत समझ को बनाए रखकर निरर्थक पैंतरेबाजी करते रहे और थोंथरे शून्यवाद तथा प्रशस्तिवाद के बीच झूलते रहे।

इधर लिखी जाने वाली जनवादी कविता के उस भाग पर यदि हम नजर डालें, जिसके पीछे निम्नपूंजीवादी की संवेदना और दृष्टिकोण विद्यमान हैं तो भी हम पाएंगे कि रचनाओं का कलात्मक मूल्य उनके ज्ञानात्मक मूल्य पर पूर्णतया आश्रित है। यदि वेणु गोपाल और पंकज सिंह जैसे कवि अपने वामपंथी मुहावरे और अंदाज के बावजूद बहुत प्रभावशाली रचनाएं नहीं लिख पाते तो उसका एक मुख्य कारण यही है कि वे अपनी मध्यम वर्गीय अहंवादिता के चंगुल से नहीं निकल सके हैं। अपनी इस निजबद्धता के कारण वे कई बार यह तय करने में चूक जाते हैं कि आज जीवन में कौन सा मसला कम महत्वपूर्ण है और कौन सा अधिक। अपने दृष्टिकोण को स्थिर बनाये रखने में भी ऐसे कवियों को काफी कठिनाई पेश आती है। एक ही रचना में हमें अतिशय आत्म-विश्वास और पराजय-भावना अतिवामपंथी दुस्साहस और निरीह भावुकता गड्ड-मड्ड रूप में दिखाई दे जाएंगी। इसके विपरीत जो कवि अपनी मध्यम वर्गीय निजबद्धता को त्यागकर संघर्षरत जन समूहों से भावनात्मक तादात्म्य स्थापित कर चुके हैं, उनकी रचनाएं अधिक सारगर्भित एवं प्रतिभाशाली नजर आती हैं। ऐसे कवियों की भावनाओं में स्थायीत्व और उनके चिंतन में कसाव एक साथ उभर कर आते हैं।

ज्यों-ज्यों किसी समाज में वर्ग संघर्ष तीव्र होता है, वहां जनवादी कवियों के दृष्टिकोण का सुस्पष्ट होना और उनकी भावनाओं का प्रखर होना एक ही प्रक्रिया के विभिन्न पक्ष हैं। यदि किसी रचनाकार की दृष्टि साफ नहीं है तो उसकी भावनाओं में भी बिखराव अथवा शिथिलता होगी और यदि भावनाओं के स्तर पर वह चोट महसूस नहीं करता अथवा केवल सतही हलचल महसूस करता है तो इसका मतलब है कि उसकी चिंतन पद्धति में भी कुछ समझौतावादी भ्रांतियां अथवा विकृतियां विद्यमान हैं। ऐसे समय में यह विशेष रूप से स्पष्ट हो जाता है कि रचना में पायी जाने वाली ‘समझ’ की कमजोरी से उसका कलात्मक मूल्य एकदम घट जाएगा। आज के सही जनवाद लेखन में जो संघर्ष-धर्मिता है, उसमें न तो समझौतावादी समझ का और अविश्वसनीयता। उसका स्वर संयत होगा, उसमें बौद्धिक कसाव होगा, उसमें शोषक और शोषित वर्गों के हितों के टकराव की अनिवार्यता स्पष्ट दिखाई नहीं देगी, उसमें वस्तुपरक कठोरता होगी किन्तु अमानवीय कर्कशता नहीं और न ही छद्म भावुकता। वहां रचनाकार की अलग शख्सीयत भी लुप्त  होती नजर आएगी और वह एकदम हम-बद्ध व्यक्तित्व को प्राप्त कर चुका होगा। क्योंकि इस प्रकार की रचनाओं में भावना और चिंतन दोनों ही स्तरों पर एक प्रौढ़ समझ लक्षित होगी, इन रचनाओं का कलात्मक मूल्य भी उसी हिसाब से ऊंचा होगा।

जब ‘ज्ञान’ को हम समझ के रूप में रचना में देखने लगते हैं तो यह सवाल इतना महत्वपूर्ण नहीं रहता कि वह ज्ञान स्पष्ट विवेचन-विश्लेषण के रूप में रचना में विद्यमान है अथवा सूक्ष्म रूप में। जनवादी गीतों में तथा कुछ लघु कथाओं और आख्यानों से स्पष्ट रूप में वस्तुस्थिति के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण आमतौर पर नहीं मिलेगा और न ही वहां कोई राजनीतिक कार्यनीति दिखाई देगी, किंतु यहां भी वस्तुस्थिति की रचनाकार की समझ रचना के ढांचे और स्वरूप को निश्चित करेगी और उसी के आधार पर उसका कलात्मक मूल्य मापा जाएगा। किन्हीं अन्य रचनाओं में विषय वस्तु और विधा की आवश्यकताओं के अनुसार स्पष्ट विवरणों और विस्तृत विश्लेषण का भी सहारा लिया जा सकता है। अनिवार्य शर्त केवल समझ की प्रौढ़ता है न कि यह कि वह समझ रचना में किस विधि से प्रस्तुत की जा रही है। रचनाकार अपनी क्षमताओं और स्थिति की मांग के अनुसार वस्तुस्थिति की समूची समझ को पाठक प्रेषित करने की विधि का चुनाव स्वयं कर लेगा। इस संबंध में कोई अनिवार्य सिद्धांतों का प्रतिपादन नहीं हो सकता। मोटे सुझाव के तौर पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि रचनाकार अपनी समझ को संदिग्धता अथवा स्पष्टता का खतरा मोल लिए बिना जितने नाट्यात्मक, सूक्ष्म और सघन ढंग से पाठक तक प्रेषित कर सकेगा, उतना ही उसकी रचना प्रभाव अधिक होगा, यद्यपि उसका कलात्मक मूल्य ज्ञानात्मक मूल्य से ही मुख्यत: निर्धारित होगा।

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