कुलबीर सिंह मलिक – कब्रिस्तान की बेरियां

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कहानी


मुल्क के बंटवारे के साथ हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो खून की होली खेली गई उसके कहर से उत्तर भारत का, विशेषत: पंजाब का, कोई गांव या शहर बच पाया था।

बात आठवें दशक के उत्तरार्ध की है।

पैंतीस-चालीस वर्ष की इमराना नाम की एक औरत अपने शौहर इस्माईल और बेटी राबिया के साथ हरियाणा के सोनीपत जिले के मिर्जापुर गांव में आ धमकी। इक्के में घर का सारा सामान लदा था। गांव की चौड़ी गली में एक किसान की कच्ची दहलीज, जो कभी ढोर-डंगर बांधने के काम आती थी, उन्होंने बीस रुपए महीने में किराए पर ली और मनियारी और घरेलू सामान की एक छोटी-सी दुकान अपने जीवनयापन के लिए खोल ली।

मिर्जापुर गांव जिले के उस भाग में था जहां गांवों में कोई भी मुस्लिम परिवार न बचा था। बंटवारे से पहले इस गांव  में कुछ मुस्लिम परिवार थे। मुख्यत: उनका पेशा जुलाहे, तेली या खेत-मजदूरी का था। बड़े बुजुर्ग बताते थे कि हिन्दू और मुस्लिम परिवारेां में बहुत ही सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते थे। पर बंटवारे के दौर में न जाने लोगों में क्या पागलपन का दौरा आया कि दोनों कौम एक-दूसरे के खून की प्यासी हो गई। कौमी और सियासी जुनून का खामियाजा उन बेकसूर लोगों को भुगतना पड़ा जो जहां कहीं अल्पसंख्या में थे।

मुल्क के बंटवारे को तीस साल के लगभग हो चुके हैं और हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो नफरत की दीवार थी, कुंद होने लगी थी। फिर भी इमराना का यूं हिन्दुओं के गांव में जवान बेटी और शौहर के साथ आना हिम्मत की बात थी। शुरू के कुछ दिन इस्माइल और राबिया कुछ सहमे-सहमे से रहे। पर इमराना का आत्मविश्वास और लोगों का दोस्ताना और प्रेमपूर्ण रवैया देखकर बेखौफ और शांति का जीवन बसर करने लगे।

गांव वालों के लिए ये परिवार जिज्ञासा एवं कुतुहल का विषय बन गया। हम बच्चों के दिमागों में मुसलमानों के बारे में एक अजीब-सा चित्र था जिससे हम लोग उनका मिलान करने लगे। मुझे अब भी याद है कि बचपन के वो दिन जब गांव की फिरनी के एक भाग में हमें खेलने से रोक दिया जाता था। बताया जाता कि यहां भूतों का डेरा है और इस तरफ भूल कर भी न जाना। हम बड़े-बूढ़ों की इस प्रकार की चेतावनी से सिहर जाते थे पर कुतूहलवश मौका लगने पर उसी तरफ खेलने जाते थे। वहां कुछ बेरियों के पेड़ थे और खेलते-खेलते एक बार हम बच्चों को एक बेरी की जड़ में मिट्टी की एक छोटी-सी मटकी मिली थी, जिसमें अंग्रेजों के टाइम के पांच-पांच रुपए के तीन नोट रखे थे। नोटों पर जार्ज पंचम का चित्र छपा था। नोटों का पूरी तरह मुआयना कर बड़े बुजुर्गों ने बताया कि शायद ये नोट किसी मुसलमान ने दंगे के समय यहां पर छुपा कर रख दिए होंगे। पर अब वो कागज के टुकड़़े से ज्यादा कुछ नहीं थे। यूं बेरी की जड़ में मटकी मिलने के बाद हमारी उत्सुकता फिरनी के उस हिस्से में और ज्यादा बढ़ गई थी। आज मैं जान चुका हूं कि जमीन का वो टुकड़ा मुसलमानों का कब्रिस्तान था, जहां कुछ मुसलमान जिंदा ही मौत की नींद सुला दिए गए थे।

हां तो बात इमराना और उसके परिवार को लेकर शुरू हुई थी। कुछ ही दिनों में इमराना गांव की औरतों में बड़ी लोकप्रिय हो गई। इमराना ने अपने सौम्य व प्रेमपूर्ण व्यवहार से औरतों, बच्चोंं और बुजुर्गों-सभी में एक खास स्थान बना लिया। वह थी ही इतनी अच्छी। सुंदर नैन-नक्श, ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरा बदन, चेहरे पर इतनी ताज़गी व नूर-जैसे अभी बुरके से निकल कर आई हो। आवाज में मिठास और अपनापन उसकी सुंदरता में अलग ही निखार लाता था।

इमराना की बेटी राबिया भी जवानी की दहलीज पर पहुंच गई थी। कई बार औरतों ने बात-बात में उसे टोका भी कि अब बेटी  के हाथ पीले कर दे। इमराना यह कहकर बात टाल देती कि गरीब की बेटी से कौन निकाह करेगा और फिर शादी के लिए बहुत गहने, कपड़े व पैसों  की जरूरत होती है जो हमारे पास नहीं है।

इमराना को धागों, सितारों, चोटियों व मनियारी के अन्य सामान जैसे चूड़ी, गोटे, फूल-सितारों के बारे में गज़ब का ज्ञान था। औरतों की कलाई देखकर बता देती कि उन पर कौन-सी चूडिय़ां सजेंगी। किस घाघरे या सूट के साथ कौन सी चूंदड़ी पहनी जाती है या कौन-सी रंग की चोटी किस जंफर के साथ जचेगी।

उसको गांव की औरतों द्वारा पहने जाने वाले गहनों के बारे में भी बड़ा ज्ञान था। इमराना की छोटी-सी दुकान गांव के लिए चमेली मार्किट-सी हो गई और इमराना गांव की औरतों के लिए शहनाज़ हुसैन सी हो गई।

कब्रिस्तान गांव की फिरनी के अंदर खाई के हिस्से में पड़ता है। मकानों की कतारें खाई से लगते पठार वाले भाग से शुरू होती थीं। कब्रिस्तान के साथ नेकी नंबरदार का घर था। घर का पिछला हिस्सा कब्रिस्तान की ओर खुलता था। जिन तीन-चार बेरियों के पेड़ों का मैंने जिक्र किया है, वो नेकी नंबरदार के घर के पिछवाड़े में थे। फुर्सत के वक्त इमराना आसपास के घरों में आ-जा लेती थी। बड़े बुजुर्गों, औरत-मर्दों से एक रिश्ता उसने कायम कर लिया था और उनसे मुखातिब भी सही नेग से होती थी।

सर्दियों के दिन थे। नेकी नंबरदार घर के पिछवाड़े धूप में बैठा हुक्का गुडग़ुड़ा रहा था। इनकी बूढ़ी पत्नी सिमरन  अंदर चरखा कातने में मगन थी। बेटे-बहू खेत-खलिहान में काम से निकले हुए थे कि इमराना आ धमकी।

‘बेटी, अंदर बैठी है। चरखे के पीछे पड़ी है।’ नेकी नंबरदार ने जवाब दिया।

इसी संवाद के बीच इमराना घर के अंदर पहुंच गई। साथ में नेकी नंबरदार भी थे।

‘ताई राम राम। और कितना कातोगी?’ इमराना ने सवाल किया।

‘बेटी, न तो खुद दम लेती है। न कभी बूढ़े चरखे को दम लेने देती है।’ नेकी नंबरदार ने साथ  दिया।

‘तू तो हुक्के को बहुत दम लेने देता है ना जो मेरे को टोक रहा है। तेरे वाले से तो अच्छा काम है। सारा दिन खुर-खुर तो नहीं करती।’ ताई ने पलटवार किया।

इस बीच इमराना ने ताई के साथ राम-रमी कर बूढ़े दम्पति को बातों में लगा दिया। इमराना ने घर के चारों और नज़र दौड़ाई और टिप्पणी की कि ताऊ हवेली तो काफी पुरानी है।

‘बेटा, पुरखों की निशानी है। छेड़-छाड़ करना ठीक नहीं समझा। फिर पुरखों ने चीज़ भी तो काफी मजबूत बनाई थी।’

इमराना ने बातों-बातों में घर का मुआयना किया। ऐसा लगता था जैसे इमराना घर के कोने-कोने से वाकिफ थी। चौकबंदी की हवेली थी। चौक की एक तरफ एक अंधेरा कमरा था, जिसमें अनाज का भंडारण किया जाता था। इमराना वहां पहुंच कर एकबारगी ठिठक कर कुछ कहते-कहते रुक गई।

इसके बाद इमराना नेकी नंबरदार के घर कई बार आई। इधर-उधर की गपशप होती रहती। एक दिन बातों-बातों में इमराना ने दंगों के दौरान मारे गए या पलायन कर गए मुसलमानों के बारे में जिक्र कर दिया। नेकी नंबरदार बेचारा मन मसोस कर रह गया। सिर्फ इतना कह पाया कि बेटी वो बहुत माड़ा वक्त था। भगवान ऐसा वक्त किसी को न दिखाए।

इमराना ने उन मुलाकातों में बात और कुरेदनी  चाही। नेकी नंबरदार को लगा कि इमराना है जो या तो कुछ जानती है या फिर कुछ जानना चाहती है। वह अतीत को टटोलने लगा।

पर उसे इमराना की गुत्थी सुलझाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। जाड़ों की एक शाम। कोई 10 बजे का समय था। चारों और सन्नाटा था। नेकी नंबरदार घर के पिछवाड़े बैठा हुक्का गुडग़ुड़ा रहा था कि उसे कब्रिस्तान की बेरियों की तरफ एक औरत की परछाई-सी नज़र आई। नेकी ने चुपके से उस परछाई का पीछा किया। अक्सर उधर टोने-टोटके या बेरियों पर तागा पूरने के लिए औरतें आ जाती थीं। पर इतनी घनी रात में नहीं। औरत के हाथ में कुदाल थी और वह बहुत ही नीरवता से बेरी की जड़ों को खोदे जा रही थी। काफी गहरी खोदने के बाद वह थक कर बैठ गई। मिट्टी को बेरी की जड़ों में पूर कर वह दूसरी बेरी की ओर बढ़ी। उस बीच नेकी उस परछाई के करीब आ चुका था। उसने आवाज लगाई-‘कौन?’

औरत वहीं बैठी रही। भागने की भी कोशिश नहीं की। मुड़ कर जवाब दिया-

‘ताऊ मैं हूं इमराना। आपके पड़ौसी अखतर जुलाहे की बेटी इमराना जिसे तीन दिन से आपने अपनी चने की बुखारी में छुपा कर रखा था।’

नेकी स्तब्ध था। अतीत की सारी यादें उसके मानसपटल पर एक फिल्म की तरह घूम गई। दंगों की उस शाम दंगाइयों ने चुन-चुन कर गांव के मुस्लिम परिवारों को मौत  के घाट उतार दिया था। इमराना के मां-बाप उस दंगे में मारे गए थे। चार साल की इमराना को नेकी नंबरदार चुपके  से उठा अपनी हवेली में घुस गया था। तीन दिन तक उसने उस बच्ची को गांव वालों से छुपा कर रखा। इस बीच चौथी रात इमराना का एक चाचा जो  उस बदनसीब शाम को  किसी दूर के गांव में गया हुआ था, चुपके से गांव में आया था। रात को वह नेकी नंबरदार के घर पर ही रुका था और अगली सुबह मुंह-अंधेरे ही नेकी नंबरदार उन्हें गांव की सीमा से पार कर आया था।

इमराना ने आगे बताया था कि उसका चाचा उसे रिश्ते की मासी के घर जिला मुजफ्फरनगर के एक गांव में ले गया था। और वहीं उसका पालन पोषण हुआ और बाद में उसकी शादी कर दी गई।

इससे पहले कि इमराना कुछ और कह पाती, नेकी नंबरदार बोल पड़ा-

‘बेटी, बेरी की जड़ों में अपना गहनों का संदूक तलाश रही हो न! वह हमारे पास सलामत रखा है। उसकी चिंता मत करो। रात बहुत चढ़ गई है। चुपके से घर चली जा। कोई देख लेगा तो बवाल खड़ा कर देगा।’

दरअसल जिस शाम को इमराना के मां-बाप की हत्या की गई थी, वह बेरियों की तरफ से ही आए थे। इमराना की मां के हाथ में कुदाल थी और दंगाइयों ने समझ लिया था कि वह कुदाल आत्मरक्षा के लिए  संभाले थी। किसी को ऐसा शक न गया कि वह बेरियों की जड़ में गहने गाड़ कर आई थी। गहने गाड़ते समय उसकी मां इमराना को साथ ले गई थी और उसे साफ मना किया था। किसी को भी इसके बारे में बताने को। जब हम बच्चों को एक दिन खेलते-खेलते एक बेरी की जड़ में मिट्टी की मटकी मिली तो नेकी ताऊ को शक हुआ और उन्होंने सारी बेरियों की जड़ें खुदवा डाली थी। एक बेरी की जड़ों में उन्हें गहनों का वो संदूक मिल गया था। पर नेकी ने गहनों के इस संदूक के बारे में अपने बेटों को भी नहीं बताया था। सिर्फ उसकी पत्नी सिमरन इस बारे में जानती थी।

इस बीच नेकी नंबरदार के घर में आर्थिक तंगी का दौर भी आया पर दोनों पति-पत्नी का पक्का हौसला था कि ये गहने किसी भी हालत में अपनी बहू-बेटियों पर नहीं चढ़ाएंगे। उनका फैसला था कि या तो ये गहने इनके असली वारिस के पास जाएं या फिर कहीं नेक उद्देश्य के लिए दान कर दिए जाएं। दोनों पति-पत्नी इसी उधेड़बुन में थे कि इमराना गहने संभालने के लिए आ पहुंची थी।

रात को ही नेकी नंबरदार ने सारे मामले के बारे में पत्नी से सलाह ली। दंगों को लगभग तीस साल बीत चुके थे और इस बीच लोगों की सोच में बहुत बदलाव आ गया था। गांव में जिन लोगों ने दंगों में बढ़चढ़ कर भाग लिया था या लूटपाट की थी उनका हश्र कोई अच्छा नहीं हुआ था। गांव का समाज स्थिर समाज होता है और सबके सामने एक-दूसरे के कर्मों  का लेखा-जोखा होता है। कुछ भी हो, वक्त के साथ मुस्लिम परिवारों के साथ जो कुछ हुआ था उसका लोगों को बड़ा मलाल था। जिन लोगों ने उस कुकर्म में हिस्सा लिया था, कुदरत ने भी उनके साथ कोई कसर न छोड़ी थी। यूं भी बुजुर्गों में दिल के किसी कोने में उस काली रात के बारे में बड़ा मलाल था।

खुद मेरे पिताजी ने इस बात को कबूला कि हालांकि वह उस कांड में शामिल नहीं थे, उस  शाम अगर वो उस बुराई के खिलाफ उठ खड़े होते तो शायद वो जघन्य कांड न हो पाता।

लोगों के विचारों में बदलाव आ चुका था और नेकी नंबरदार को गांव के मौजिज लोगों को बुला मामले को निपटाने में किसी प्रकार का कोई जोखिम नज़र नहीं आया। अगले दिन सुबह गांव के मौजिज लोग नेकी नंबरदार की हवेली में इकट्ठे  हुए। मामले की रोचकता को देखते हुए औरतें-बच्चे भी जमा थे। पंचायत के सामने नेकी नंबरदार ने सारी बात का खुलासा किया। लोग चकित थे। इमराना को बुलाया गया। वह अपने पति व बेटी के साथ हाजि़र हुई। सब लोगों के बीच में नेकी नंबरदार की पत्नी ने गहनों का संदूक इमराना की झोली में डाल दिया।

बड़ा नूर व सुकून था सिमरन ताई के चेहरे पर जब उसने इमराना को गहनों का संदूक दिया।

सब लोगों के सामने गहनों का संदूक खोला गया। संदूक सोने व चांदी के गहनों से भरा था। कंठी, गलसरी, मटरमाला, चूडिय़ां, टीका, अंगूठी आदि के कई सैट संदूक में भरे थे। अख्तर के परिवार की सारी औरतों के गहने इस संदूक में थे जो इमराना को सौंप दिए गए।

इमराना गांव के लोगों के प्यार और नेकनीयती देखकर भावुक  हो  गई। उसकी आंखों में अश्रुधारा बह निकली। वह सिमरन ताई से लिपट कर बेटी की तरह सुबक रही थी। इमराना की आंखों से निकलती वो अश्रुधारा गांव के चेहरे पर कहीं अतीत में पुती कालिख को धोने के लिए बेताब थी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2017, अंक 12), पेज – 5

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