वस्तु व रूप के संबंध – डा. ओम प्रकाश ग्रेवाल के साथ डा. कर्मजीत सिंह का  संवाद

डा. ओम प्रकाश ग्रेवाल के साथ डा. कर्मजीत सिंह का  संवाद


डा. कर्मजीत सिंह :  डा. साहिब पहला सवाल यह है कि साहित्य में वस्तु व रूप पर वाद-विवाद की शुरूआत किन परिस्थितियों में और किन कारणों से होती है।

डा. ग्रेवाल : वस्तु के रूप का विवाद काफी पुराना है। यह विवाद बार-बार थोड़े अंतराल के साथ उभरता रहा है। जब कभी यह जरूरत महसूस की जाती है कि लोगों का ध्यान इस प्रश्न से हटाया जाए कि साहित्य कहता क्या है, तो ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जाता है। साहित्य को जीवन के किसी न किसी रूप में काटने की कोशिश की जाती है और रूप की प्राथमिकता के प्रश्न को ज्यादा उछाला जाता है। ऐसा आम तौर पर तब होता है, जब साहित्य में प्रगतिशील रूझानों का प्रभाव बढऩे लगता है। प्रगतिशील लेखकों को बरगलाने के लिए साहित्य की साहित्यकता को उसके रूप में ही स्थित दर्शाया जाता है। रूप के महत्व को इस तरह पेश किया जाता है कि जैसे रचना में रूप ही सब कुछ हो।

डा. कर्मजीत सिंह : यह कहा जाता है कि यथार्थ साहित्य में मूल रूप में पेश नहीं होता, बल्कि साहित्य उसका अजनबीकरण करता है। ऐसी प्रक्रिया में रूप की पहल है। आप इस संबंध में क्या कहना चाहेंगे?

डा. ग्रेवाल : अगर यह बात स्वीकार कर ली जाए कि साहित्य में यथार्थ एक विशेष रूप अख्तियार करके पेश होता है, तो भी रूप और अंतर्वस्तु का आपसी गहरा संबंध कायम रहता ही है। यह बात तो माननी ही पड़ेगी। जो व्यक्ति इस धारणा को स्वीकार करे कि यथार्थ साहित्य में सीधा-सीधा नहीं आता, बल्कि कुछ परिवर्तित होकर आता है, वह जरूरी नहीं कि रूपवाद का पक्षधर हो। मैं तो मान कर चलता हूं कि चेतना में प्रतिबिम्बित होते समय ही यथार्थ कुछ-न-कुछ बदल जाता है। यथार्थ को ज्यों-का-त्यों चेतना में प्रतिबिम्बित होना असंभव तो नहीं, परन्तु आमतौर पर ऐसा होता नहीं। थोड़ा-बहुत अधूरापन रह ही जाता है या फिर कुछ न कुछ विकृति आ जाती है। अगर हमारी चेतना में  यथार्थ कुछ न कुछ हद तक बदलते रूप में आता है तो यह मानने में हमें कोई एतराज नहीं कि भाषा के माध्यम में ढल कर यथार्थ कुछ-न-कुछ बदल जाता है। इसी कारण उसमें अधूरापन ही रहेगा और अलगाव भी आएगा। साहित्य-कर्म स्वयं विशेष परिस्थितियों की उपज है। अगर हम यथार्थ को कच्ची सामग्री मानें तो स्पष्ट है कि कच्ची सामग्री साहित्य का रूप धारण करते समय कुछ न कुछ बदलेगी। इतनी बात मानने में मैं व्यक्तिगत रूप से कोई आपत्ति नहीं समझता।

डा. कर्मजीत सिंह :  ऐसा स्वीकार करना दूसरी तरफ  भी तो ले जा सकता है?

डा. ग्रेवाल : ऐसी फार्मूलेशन में दूसरी तरफ  जाने का खतरा तो रहता ही है। हो सकता है आप रूप को भी ज्यादा महत्व देने लग जाएं और इसके बाद आपका ध्यान बदलाव व अलगाव के ऊपर केंद्रित हो जाए, परन्तु ऊपरी स्वीकृति में मैं समझता हूं कि कोई रूपवादी स्थापना नहीं है।

डा. कर्मजीत सिंह : बात क्योंकि रूपवाद की शुरू हो गई तो इसलिए मैं चाहूंगा कि पहले इस पर ही विचार कर लिया जाए। रूपवादियों ने रूपांतरण के सिद्धांत के संबंध में चर्चा की है। उनके अनुसार यह सिद्धांत है क्या? इस बारे थोड़ा विस्तार से बताएं?

डा. ग्रेवाल : रूपांतरण के सिद्धांत के अनुसार सहज अनुभव की अपनी अलग श्रेणी है और इसका जिंदगी के दूसरे अनुभवों के साथ कोई तालमेल नहीं। जैसे ही जिंदगी का दूसरा अनुभव रचना के सहज अनुभव में बदलता है, वैसे ही एक नई चीज अस्तित्व में आ जाती है। नया सहज-रूप ही असली चीज है। रूपवादियों में सबसे ज्यादा खतरनाक वे रूपवादी हैं जो सहज अनुभव को एक अलग श्रेणी मानते हैं। वे कहते हैं कि आपने कमल की सुंदरता और उसकी खुशबू देखनी है, यह कमल जिसमें उगा है उस कीचड़ का आपको जितना मर्जी ज्ञान हो, जब तक कमल फूल के रूप, उसकी सुगंधी व उसकी सुंदरता की तरफ आप सहज प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त नहीं करते, तब तक तुम्हारे ज्ञान का कोई अर्थ नहीं। वैसे तो रूपवाद की कई किस्में हो सकती हैं, परन्तु व्यापक रूपवाद की श्रेणी वह है, जो यथार्थ को तर्कहीन समझती है। उनके अनुसार साहित्य को अर्थ रचनाकार ने दिए हैं। यह अर्थ यथार्थ में विद्यमान नहीं हैं। इन अर्थों का कोई बाहरी प्रमाण व वैधता नहीं। भाषा के नियमों और संरचनाओं के साथ ही रूपवादियों के लिए परम्पराएं भी आपहूदरी हैं। रूपवादी जिंदगी के वास्तविक व्यवहारों, नैतिक नियमों और सर्वप्रमाणित धारणाओं का ज्ञान रचना को समझने के लिए जरूरी नहीं मानते। वैसे तो यह सब चीजें भी मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधा के लिए आपहूदरे ढंग से रची हैं और बाहरी यथार्थ में इनका कोई स्थायी आधार नहीं है। संरचनावादी भी इन अर्थों में रूपवादियों के साथ मिलते-जुलते हैं, क्योंकि वह मानते हैं कि भाषा की संरचना का यथार्थ जीवन अथवा प्राकृतिक नियमों के साथ कोई संबंध नहीं है। संरचनाएं बनावटी हैं। आपहूदरी हैं। इस आपहूदरे ढंग के साथ व्यक्ति  सृजनात्मक शक्ति के साथ अपनी कला का सृजन करता है, जो उसको सुख देती है, परन्तु कला का युग के सामाजिक, राजनीतिक या नैतिक जीवन से कोई संबंध नहीं होता है। लगभग हर किस्म के रूपवाद के पीछे इस तरह की धारणाएं काम करती हैं।

            एक बात तो हर किस्म के रूपवाद में सांझी है, वह यह कि रूप न केवल प्राथमिक ही है, बल्कि स्वायत भी है। रूप प्राथमिक भी इसीलिए है कि वह स्वतंत्र और स्वायत है। रूप की प्राथमिकता, स्वायतता और अंतरमुर्खता यह तीनों बातें हर तरह के रूपवाद में किसी-न-किसी शक्ल में सामने आती हैं रूपवाद की कमजोरियों को समझने के लिए रूप का वस्तु से सही-सही संबंध समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। रूपवाद का विरोधी चिंतन रूप व वस्तु  को जोड़कर देखते हुए रूप के नियमों को वस्तु के नियमों के साथ जोड़ता है। इस चिंतन के अनुसार जैसी वस्तु होगी, उसी तरह का ही रूप भी होगा। जो नियम वस्तु में काम कर रहे हैं, वही नियम रूप में भी काम करते हैं। इस चिंतन में न तो रूप की प्राथमिकता को माना जाता है और न ही इसके स्वायत अस्तित्व को मान्यता दी जाती है। हमें पहले ही स्पष्ट होना चाहिए कि वस्तु और रूप के संबंधों के बारे में दो तरह की सोच है। एक वस्तुवादी और दूसरी रूपवादी। वस्तुवादी वैज्ञानिक सोच को कई बार बिगाड़ कर ऐसे पेश किया जाता है कि यह तो रूप को नकारती है। रूप की सुंदरता, स्वायतता व प्राथमिकता के इन्कार को रूप के महत्व से ही इन्कार मान लिया जाता है। जो गलत है। वस्तुवादी सोच यह मानती है कि वस्तु की प्राथमिकता है और रूप वस्तु से जुड़ा है। वस्तु प्राथमिक भी है और इसी से रूप भी तय होता है। रूप सीधे ढंग से तय हो रहा है या जटिल ढंग से, यह प्रश्न अलग है। कला अर्थपूर्ण  व मूल्यवान है, परन्तु इसके अर्थ व मूल्य सृजन कहां से आते हैं? रूपवादी कहेंगे कि ये अर्थ और मूल्य कलाकार की सृजना है। वस्तुवादी कहेंगे कि कला के अर्थ व मूल्य यथार्थ को प्रतिबिम्बित करने में होते हैं। यथार्थ सिर्फ  पत्थरों-चट्टानों या प्रकृति का ही नहीं होता, बल्कि सामाजिक यथार्थ उससे ज्यादा महत्वपूर्ण भाग है। हम मानते हैं कि सामाजिक प्रक्रिया के अपने नियम हैं और इन नियमों को समझा भी जा सकता है। यह नियम और समझ रचना के रूप को समझने में सहायक होते हैं। सभी रूपवादी यथार्थ को पूरी तरह नहीं नकारते, परन्तु सभी-के-सभी रूप की ही शक्ति मानते है।

डा. कर्मजीत सिंह : वैसे तो आपने बात शुरू कर ही दी है कि साहित्य  में  रूप व वस्तु का सामाजिक यथार्थ से क्या संबंध है?  इस बात का उल्लेख तो आ गया है कि सामाजिक यथार्थ परिवर्तित होकर साहित्य में कैसे आता है। परन्तु क्या रूप भी यथार्थ के परिवर्तन के साथ परिवर्तित होता है। यथार्थ का रूप के साथ क्या संबंध है?

डा. ग्रेवाल : पहले तो यह जानना जरूरी है कि जब हम साहित्य में अंतर्वस्तु  या कथ्य की बात करते हैं, तो हमारे सामने सामाजिक यथार्थ ही होता है। मैं यह मान कर चलता हूं कि सृजनात्मक रचना का रूप तो सामाजिक यथार्थ से ली गई वस्तु से ही निश्चित होगा चाहे वह साहित्य का हो या किसी अन्य कला का हो या दर्शन का। यथार्थ रूप में ढलकर चाहे एक अलगाव या विशिष्टता ग्रहण कर ले, परन्तु रूप तो कथ्य के द्वारा ही तय होता है। एक तो सामाजिक यथार्थ का रूप के साथ अटूट संबंध इस शक्ल में है कि साहित्यिक रचना का रूप सामाजिक यथार्थ से तय होता है। इसलिए रूप को पहचानने के लिए भी सामाजिक यथार्थ को समझना जरूरी है।

            आमतौर पर यह मान कर चला जाता है कि रचनाकार की सामाजिक राजनीतिक विचारधारा से साहित्य का केवल विषय-वस्तु ही तय होता है।  रचनाकार की सोच के साथ, उसके दृष्टिकोण के साथ, उसके निजी रूझानों के साथ, उसकी प्राथमिकताओं के साथ उसकी पसंद-नापसंद के साथ  — साहित्य रूप व अंतर्वस्तु दोनों ही तय होते हैं। इसलिए सामाजिक यथार्थ को जाने बगैर व रचनाकार का इसमें जुड़ाव की शर्तों को समझे बगैर – वह किस तरह की रचना रचेगा या वह किस तरह का रूप घड़ेगा, इसको समझना कठिन है।

डा. कर्मजीत सिंह : मेरे प्रश्न का इशारा लुकाच के ‘द हिस्टोरीकल नावल’ में कही इस बात से था कि अगर नाटक में संघर्ष है तो यह संघर्ष जीवन-संघर्ष  से प्रभावित है। जीवन में संघर्ष होने के कारण ही रूप में आ सकता है। तनाव की बात है। जीवन में तनाव है तो यह तनाव, साहित्य रूप में आएगा ही। इस बात की आप कैसे व्याख्या करते हैं?

डा. ग्रेवाल : सौंदर्य शास्त्र के सिद्धांत सामाजिक यथार्थों के सिद्धांतों की ही विशेष अभिव्यक्ति होते हैं। सामाजिक  यथार्थ की जो धारा चल रही है, उसमें जो नियम हैं, उनका ही प्रतिबिम्ब सौंदर्य शास्त्र के सिद्धांतों में आता है। यह बिल्कुल सही है कि अगर नाटक में तीव्र संघर्ष है, तो यह संघर्ष  ऐतिहासिक परिवर्तन के बीच और व्यक्ति के जीवन के बीच उन क्षणों का प्रतिबिम्ब होता है, जहां संकट के तीव्र विरोध प्रस्तुत होते हैं। इसके अनुरूप जो रूप बनेगा, उसमें भी तीव्र विरोध संघर्ष का रूप ले लेंगे। सामाजिक जीवन में जो नियम लागू होते हैं, उनकी अभिव्यक्ति ही साहित्य में होती है।

डा. कर्मजीत सिंह : रूप की दूसरी विधियों में भी यह लागू होने चाहिएं, जैसे रूपवादी, संरचनावादी और नव-आलोचक व्यंग्य की बात करते हैं, तनाव की बात करते हैं या विरोधाभास आदि की बात करते हैं। इन सब को भी तो आप जीवन से अलग नहीं कर सकते?

डा. ग्रेवाल : नव-आलोचक भी इसको स्वीकार करेंगे, चाहे वह इसको व्यक्ति की चेतना तक ही सीमित कर देते हैं। रूप की विशेषताओं व्यंग्य, विरोधाभास आदि के बारे में सोचते हैं कि ये विशेषताएं किसी रचना में तब ही आएंगी, जब रचनाकार की चेतना में जटिलताओं पर अंतर्विरोध मौजूद होंगे।

डा. कर्मजीत सिंह : मेरे अनुसार वे इस तरह से नहीं सोचते?

डा. ग्रेवाल: नहीं वे इसी तरह देखते हैं। वे व्यक्ति के निजी अनुभव की जटिलताओं को तो जोड़ लेते हैं, परन्तु व्यक्ति के निज से अलग यथार्थ को वे बनावटी ख्याल करते हैं। इसीलिए उनकी धारणा के अनुसार सामाजिक यथार्थ सौंदर्य अनुभव का हिस्सा ही नहीं बन सकता। वे जीवन की धारा को व्यक्ति की निजी अनुभूति तक ही सीमित कर देते हैं। सौंदर्य रूप को समझने के लिए वे व्यक्ति की काव्य-अनुभूति की बनावट की बात करते हैं। व्यक्ति की अनुभूति को सामाजिक यथार्थ के साथ नहीं जोड़ा जाता। वह एक बात यह भी मानते हैं कि व्यक्ति की यह अनुभूति जब साहित्य रूप धारण करती है तो शब्दों व भाषा का आंतरिक गठजोड़ अपने-आप ही सम्पूर्णता ग्रहण कर लेता है।

डा. कर्मजीत सिंह : अब हम एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं कि साहित्य में वस्तु व रूप का परस्पर क्या संबंध है?

डा. ग्रेवाल : वस्तु और रूप एक-दूसरे के साथ अनिवार्य रूप से जुड़े हुए हैं। वस्तु के सार तत्व से यह तय होता है कि उसको क्या रूप दिया जा सकता है। रूपवादी साहित्य को सजीव वस्तु मानते हैं। जिस तरह एक सजीव का आकार और उसकी आत्मा है। दोनों एक-दूसरे से अलग हुए नहीं कि सब कुछ खत्म हो जाता है। वैसे ही वह साहित्य और असाहित्य में अंतर करते हुए इस बात पर बल देते हैं कि साहित्य वह है जहां कथ्य और रूप का मिलन सजीव के आकार और आत्मा के मिलन जैसा होता है। जिस तरह सजीव की आत्मा उसके शरीर में होती है और शरीर के बगैर उसका अस्तित्व नहीं है, वैसे ही उनके अनुसार वस्तु साहित्य के रूप में विद्यमान रहती है। अगर रूप नहीं है तो वस्तु या कथ्य समाप्त हो जाएगा। वस्तु व रूप के अनिवार्य रिश्ते को कई लोग इस तरह पेश करते हैं। इसी के अनुकूल ही वह उपमाएं भी देते हैं। जैसे फूल  की सुंदरता उसके रूप में  है उसमें चाहे कार्बन हो, पानी हो या कोई अन्य तत्व। परन्तु उसकी सुंदरता बनती रूप से ही है। ऐसी उपमाओं के माध्यम से रूप और कथ्य के अनिवार्य व गहरे संबंध को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है, जैसे रूप ही सब कुछ हो और रूप के बगैर वस्तु का कोई अस्तित्व ही न हो।

            मैं इससे हटकर यह कहना चाहता हूं कि वस्तु और रूप का गहरा और अटूट संबंध होते हुए भी वस्तु से ही रूप तय होता है। इस संबंध को व्यक्त करने के लिए प्राकृतिक वस्तुओं की उपमा एक सीमा के बाद भ्रम फैलाने वाली हो सकती है, क्योंकि साहित्य का रूप बनाया जाता है, निर्मित होता है। प्राकृतिक वस्तुओं की तरह यह अपने-आप अस्तित्व में नहीं आता। कुर्सी बनाई जाएगी, पौधा पैदा होगा। उगे हुए पौधे का रूप और वस्तु का परस्पर संबंध और लकड़ी से बनाई हुई कुर्सी के रूप और वस्तु का संबंध निश्चय ही अलग होगा। गढी या रची हुई चीज में रूप और वस्तु को कम-से-कम कल्पना के स्तर पर व्यक्त किया जा सकता है।

            एक साहित्यिक कार्य में जो रूप उभरता है, उसके कुछ तत्व आने वाली रचनाओं में भी प्रयोग किए जा सकते हैं। जो बाद में स्थिर भी हो जाते हैं। जिस तरह उपन्यास, महाकाव्य और प्रगीत में रूप का कुछ भाग ऐसा है, जिसको आप विधा कह सकते हैं। जिस तरह तकनीक किसी सामाजिक परिवेश में विकसित होकर दूसरे सामाजिक परिवेश में भी पहुंचाई जा सकती है। ऐसे ही रूप के कुछ तत्वों  को शिल्प के तौर पर सीखा जा सकता है और अन्य विषयों को रूप देने के लिए उनका प्रयोग किया जा सकता है। यह जानने की जरूरत नहीं है कि किसी भी बोतल में कोई भी तरल पदार्थ भरा जा सकता है। रूप कोई बर्तन नहीं है जिस में कोई भी वस्तु भरी जा सके।

            फिर भी किसी हद तक संक्षिप्त रूप से कल्पना की जा सकती है। कल्पना के धरातल पर चाहे आत्मा और शरीर को तो अलग नहीं किया जा साता, परन्तु रचना के रूप के कुछ हिस्सों को अलग करके किसी दूसरी रचना को रूप देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह अंतर पहले अंतर से जुड़ा हुआ है कि रूप गढ़ा जाता है। रूप उद्देश्य के नियंत्रण में रहता है। हमारे दिमाग में पहले यह बात आनी चाहिए कि सामाजिक-यथार्थ सारे भौतिक-यथार्थ का हिस्सा होते हुए भी प्राकृतिक-यथार्थ से अलग होता है। सामाजिक-यथार्थ में व्यक्तियों के और समुदाय के उद्देश्य महत्वपूर्ण होते हैं। सामाजिक-ढांचा निर्मित होने में मनुष्य की इच्छा शक्ति काम करती है। साहित्य का कथ्य क्योंकि सामाजिक यथार्थ से लिया जाता है। इसलिए यहां भी इच्छा और उद्देश्य शामिल होते हैं। साहित्य सृजन प्रक्रिया में यह इच्छा और उद्देश्य काम कर रहे होते हैं। इसलिए साहित्य में वस्तु और रूप का अंत:संबंध गहरा होते हुए भी एक-दूसरे को कुछ हद तक अलग किए जाने से संबंधित होते हैं। यह बात समझ आते ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि रचना में वस्तु और रूप के संबंध पूरी तरह प्राकृतिक जीव की तरह के संबंध नहीं हैं।

डा. कर्मजीत सिंह : यह तो ठीक है परन्तु हम मानते हैं कि वस्तु और रूप का संबंध द्वंद्ववादी है। इसका क्या मतलब है, थोड़ा सा विस्तार से समझाएं।

डा. ग्रेवाल : सम्पूर्ण वस्तु जगत — जिसमें मनुष्य की सोचने की शक्ति शामिल है — में द्वंद्ध है। प्रकृति का और सम्पूर्ण भौतिक जगत का व्यवहार द्वंद्ववादी है। द्वंद्व में दो वस्तुओं का रिश्ता केवल मेल का ही नहीं होता, बल्कि विरोध का भी हो सकता है। दोनों पक्ष विरोध द्वारा भी एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे होते हैं। चाहे सामाजिक-यथार्थ का धरातल हो या चेतना का, हर स्थान पर द्वंद्व मौजूद रहता है। कोई विशिष्ट रचना चाहे वह कला-कृति हो या चाहे व्यक्ति का व्यक्तित्व हो या फिर सामाजिक ढांचा हो, उसमें विरोध नहीं होगा ऐसी कल्पना ही नहीं की जा सकती, क्योंकि वस्तु में अंतर्विरोध है। इसलिए अलग-अलग तत्वों में भी अंतर्विरोध होंगे। अंतर्विरोधों का जो तर्क वस्तु में काम करेगा, उसकी अभिव्यक्ति रूप में भी होगी। वस्तु व रूप के बीच भी द्वंद्व कार्यशील होता है। इसलिए रूप को वस्तु के अनुसार यांत्रिक ढंग से या सरल ढंग से तय होते हुए नहीं देखा जा सकता। जैसे मैंने पहले भी कहा है कि पूर्व की रचना में जो रूप उभरता है, उसके कुछ तत्व लेकर नए कथ्य को रूप देने में उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। पहले रूप को कथ्य के अनुकूल ढालने और वस्तु को रूप के अनुसार बदलने की प्रक्रिया में कुछ न कुछ तो अंतरर्विरोध आएंगे ही। यही मुख्य रूप से वस्तु और रूप का द्वंद्ववादी संबंध है। वस्तु के थोड़ेे-थोड़े अंतर के साथ कई रूप हो सकते हैं या दूसरे शब्दों में वस्तु को कई रूपों में ढाला जा सकता है। ये ऐसा हो सकता है तो कथ्य को रूप के अनुकूल बनाने में कुछ-न-कुछ विरोधों को पार करना ही होगा।

            जब सामाजिक-यथार्थ बदलता है तो कई बार उत्पादन की शक्तियां और उत्पादन के रिश्ते एक-दूसरे के अनुकूल होते हैं, परन्तु कई बार उत्पादक-संबंध उत्पादक शक्तियों के लिए बंधन बन जाते हैं। इन बंधनों को तोड़ कर नए रूप ढूंढने पड़ते हैं। इसके समानांतर कथ्य और रूप की द्वद्वांत्मक अंतक्र्रिया की तुलना भी की जा सकती है। रूप बहुत हद तक साहित्य की परम्पराओं में होते हैं, जो संस्कारों की शक्ल में पहुंचे हैं। एक लेखक दूसरे लेखकों को पढ़कर या स्वरचित रचनाओं को ध्यान में रखकर अपने नए वस्तु को ढालने के लिए पहले के रूप के तत्वों का इस्तेमाल करता है। पहले वाले रूप में कुछ स्थिर जैसे होते हैैं। रूप इतना गतिशील नहीं होता, जितना गतिशील कथ्य हो सकता है। अक्सर होता यह है कि अक्सर कथ्य नया बनता है, रूप उसके अनुसार ढलता है। अगर पुराने रूप को ढाला न जा सके, तो नया रूप भी सृजना पड़ता है। कथ्य में गतिशीलता ज्यादा है, जबकि रूप में गतिशीलता कुछ कम है। इसके कारण भी रूप और कथ्य में द्वंद्व कार्यशील होता है। कई बार अंतर इतना ज्यादा हो जाता है कि लेखक अपने संस्कारों के अधीन जो रूप सृजना चाहता है, उसमें कथ्य समाहित नहीं हो सकता। ऐसी हालत में पुराने रूप को तोड़ कर नए रूप की सृजना करनी पड़ेगी। अगर तोड़ने की सीमा तक न भी जाएं, तो भी रूप में कुछ न कुछ फेर-बदल करना ही पड़ेगा।

डा. कर्मजीत सिंह : क्या आप कोई एक रचना को लेकर उसके ऊपर अपनी स्थापनाएं लागू करके थोड़ा सा विस्तार के साथ समझाएंगे?

डा. ग्रेवाल : शायद अब तक जो मैं बात नहीं की है, उसमें यह स्पष्ट है कि रूप के वे तत्व या वे पहलू जो थोड़े स्थिर हैं, उनके साथ ही वस्तु या द्वंद्ववादी रिश्ता ज्यादा बनता है। प्रेमचंद ने उपन्यास को बदल कर जिस तरह का नया रूप दिया, उसका कारण नवीन वस्तु का दबाव था। नए विषयवस्तु के दबाव के अधीन जो रूप बन कर सामने आया और उपन्यास का जो रूप प्रेमचंद को परम्परा से उपलब्ध था, इन दोनों के बीच द्वंद्ववादी रिश्ता साफ  दिखाई देता है।  उपन्यास का रूप भी बदला और उसका कथ्य भी रूप के अनुरूप ढलने में कुछ न कुछ बदल गया। जैसे-जैसे कथ्य बदलता है वैसे-वैसे प्रेमचंद के उपन्यासों का रूप भी बदलता है। प्रेमचंद के प्रारंभिक उपन्यासों के बीच और बाद के उपन्यासों के बीच अगर रूप के धरातल पर कोई अंतर आया है तो वह रूप और कथ्य के द्वंद्व के कारण ही आया है। कोई रचनाकार जब रचना आरंभ करता है, तो रचना का कुछ हिस्सा ऐसा होता है, जिसको वह अच्छी तरह समझता नहीं। हो सकता है कि वह उस बारे में स्पष्ट ही न हो। वह जितना समझता है उस अनुसार रूप सृजने लगता है, परन्तु कथ्य का कुछ भाग ऐसा है, जिसका रचनाकार के दिमाग के पर पूरा दबाव था। कुछ ऐसा था, जिसको वह सामने लाना चाहता है, परन्तु उसको वह पूरी तरह समझता नहीं। दबाव के अधीन उसने जो पहला रूप सोचा था, वह अवश्य ही बदल जाएगा। उसमें कुछ ऐसी नवीनता आ जाएगी, जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता। इस नए रूप के तहत कथ्य में भी और ज्यादा स्पष्टता आने की संभावना है। कई बार यह देखा जाता है कि उपन्यास में वक्ता कौन है। वक्ता प्रथम पुरुष भी हो सकता है या अन्य पुरुष भी। इस तरह से दो-तीन वाचक रचना में ले आने के साथ उसके रूप में अंतर आ जाएगा और कथ्य जिसने अधूरा प्रस्तुत होना था, रूप में जटिलताओं के आने से बदल जाता है।

डा. कर्मजीत सिंह : आपने जो मोटे तौर पर बात की है, मुझे ऐसे प्रतीत होता है कि यह ऐतिहासिक प्रसंग में रूप और सामाजिक-यथार्थ की बात तो है, परन्तु विशेष रचना की बात अभी रहती है। जैसे ‘गोदान’ की ही बात करें, इस उपन्यास में कौन से संबंध हैं, जिनको द्वंद्वात्मक कहा जा सके?

डा. ग्रेवाल : एक विशेष रचना का रूप जो अंतिम रूप बन गया है और उसकी वस्तु जो अंतिम रूप से ठोस रूप ग्रहण कर चुकी है, इस धरातल पर मैं वस्तु के रूप में द्वंद्व नहीं देखता। वस्तु और रूप एक-दूसरे से थोड़े अलग किए जा सकते हैं और एक-दूसरे से संघर्ष कर अंत में एक-दूसरे के अनुकूल ढल जाते हैं। जब यह एक-दूसरे के अनुरूप ढल ही चुके हैं तो मेरा ख्याल है कि उसमें कोई द्वंद्व नहीं रहता। इसलिए जिस धरातल पर आप ‘गोदान’ जैसी सफल रचना में द्वंद्व ढूंढना चाहते हो, उसको मैं नहीं समझ सकता। अगर ऐसी हालत में वस्तु और रूप का कोई द्वंद्व है, तो वह किस शक्ल में है, मैं उसकी साफ-साफ  परिकल्पना नहीं कर सकता। इसको आप मेरी सीमा ही समझ लें।

डा. कर्मजीत सिंह : आपने कहा है कि वस्तु और रूप एक-दूसरे से कुछ  अलग किए जा सकते हैं। जब आप यह कहते हैं कि किसी रचना का कथ्य तो बहुत बढिय़ा है, परन्तु इसका रूप अच्छा नहीं है या इसके विपरीत भी कहा जा सकता है। किसी रचना का रूप तो सुंदर है, परन्तु इसमें कथ्य कुछ भी नहीं है, इसको थोड़ा स्पष्ट करें?

डा. ग्रेवाल : जब हम इस तरह महसूस करते हैं तो हमारा मतलब होता है कि यह रचना अधूरी है। कथ्य को रूप के अनुकूल ढलने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई। जिस तरह सतर के दशक में एक खास किस्म का जनवादी साहित्य रचना गया, जिसमें कहानी का एक रूप यह था कि किसी मध्यम-वर्गीय पात्रों की सामाजिक परिस्थितियों के दबाव के तहत और आत्मसंघर्ष के बाद समझ साफ हो जाती है। वह समझने लगता है कि जब तक इस समाज को बदला न जाए या जब तक मेहनतकश लोगों का पक्ष न लिया जाए, उसको भी दूसरे लोगों की तरह ख्वार होते रहना पड़ेगा। इन रचनाओं में मध्यमवर्गीय चेतना में इस बिन्दू को प्रस्तुत करने की कोशिश होती है। मध्यमवर्गीय पात्रों के तेजतर्रार राजनीतिक रवैये को ही मुख्य रूप से इन जनवादी कहानियों में उल्लेख किया गया है। जागरूक हुए जनवादी रूझान वाले मध्यमवर्गीय चरित्रों में और जो अभी भी भ्रम का शिकार है और ऊपरी वर्ग का पिछलग्गू ही बना रहता चाहता है, में एक विशेष अंतर दिखाया जाता है। परन्तु कुछ समय बाद परिस्थितियां और चुनौतियां बदल जाती हैं, क्योंकि लेखक का व्यक्तित्व ऊपरी माहौल में विकसित हुआ है और जिस माहौल में वह अब रह रहा है, उसका मतलब बदल गया है। इस सूरत में भी अगर लेखक पुराने ढंग के शिल्प या रूप गढऩे की कोशिश करता है तो उसको अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इस स्थिति में हम कहेंगे कि रची गई रचना का रूप नए कथ्य के अनुरूप नहीं है। अगर वही लेखक रूप में भी परिवर्तन ला दे, तो जनवादी कहानी के बीच मध्यमवर्गीय पात्रों को प्रस्तुत करते हुए अब यह दिखाने लग जाएगा कि आज के समाज का ढांचा इन पात्रों के व्यक्तित्व को किस तरह ढाल रहा है। मध्यमवर्गीय व्यक्ति को यह पूरी छूट नहीं है कि वह अच्छा बने या बुरा। किसी व्यक्ति की चेतना विकसित है या अविकसित, यह केवल निजी या नैतिक प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ढांचे की बनावट के कारण भी है। अपनी सामाजिक परिस्थितियों में कोई मध्यवर्गीय पात्र किसी विशेष सामाजिक ढांचे की कार्यप्रणाली के तहत ही कार्यशील हो सकता है। यह कार्यप्रणाली ही यह तय कर सकती है कि ऐसे मध्यवर्गीय पात्र की विशेष भूमिका क्या होगी।

            इस भूमिका के अनुसार ही उसका चरित्र निर्माण होगा। यह सब कुछ दर्शाने के लिए अब नए शिल्पगत या रूपगत पहलुओं को लाना पड़ेगा। अगर रचनाकार पुराने संस्कारों में ही चला हुआ है तो यह पात्रों के प्रति व्यंग्य में या तो ज्यादातर कड़वापन लेकर आएगा या फिर सावधान होकर मध्यवर्गीय व्यक्ति की सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करेगा या फिर उसके प्रति हमदर्दी दिखाएगा। ऐसे पात्रों का वस्तुगत चित्रण नहीं हो सकेगा। जैसे ही यह अहसास किया गया कि कोई मध्यवर्गीय व्यक्ति जो भूमिका निभा रहा है, उसका कारण सामाजिक दबाव हैं और इन दबावों के अंतर्गत ही हम मध्यवर्ग का चित्रण कर सकते है। तो इन दबावों के प्रभाव को चेतना के ऊपर दर्शाने के लिए नए रूप गढऩे पड़े। इस तरह करते समय कथ्य और रूप में अनुरूपता की कुछ कमी रह जानी बिल्कुल संभव है। जब तक रूप वस्तु के अनुकूल नहीं होगा, तो यह कथ्य की शक्ति को कमजोर करेगा। जब हम यह कहते हैं कि रूप कथ्य के मुकाबले का नहीं है या कथ्य के अनुरूप नहीं है तो यह पूरी तरह बेमानी बात नहीं है। बहुत सी रचनाएं ऐसी हो सकती हैं।

            इसका यह मतलब भी नहीं कि रूप कोई ऐसा सहज-जादू है, जिसके घटने-बढऩे के साथ रचना का स्वाद मारा जाएगा। ऐसा भी नहीं कि कथ्य जितना मर्जी शक्तिवान हो, जब तक उस रूप का पक्ष एक स्वतंत्र इकाई के तौर पर उसको ताकत नहीं देता, तो रचना सहज-दृष्टि से निरर्थक है। इस तरह की धारणा में रूप को कथ्य से अलग कर लिया जाता है। यह समझा जाता है कि रूप अपने-आप में समर्थ है और कथ्य अपने-आप में। अकेले कथ्य की शक्ति के साथ रचना अच्छी नहीं बन सकेगी। जब तक उस में रूप की शक्ति शामिल न हो। मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि वस्तु व रूप एक-दूसरे से अलग नहीं हैं और द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के तहत ही वह एक-दूसरे के अनुरूप चलते हैं। इसलिए एक-दूसरे के अनुरूप ढलने की प्रक्रिया अगर अधूरी है तो रूप कमजोर रह जाता है।

            दूसरी बात आपनेे यह की थी कि कुछ रचनाओं में ऐसे महसूस हो सकता है कि इनका रूप पक्ष तो बहुत बढिय़ा है, परन्तु कथ्य कमजोर है, इसको मैं ज्यादा नहीं समझ रहा। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसी धारणा के अनुसार रूप को कोई ऐसी जादूमयी वस्तु माना जा रहा है जो अलग शक्ति के रूप में विद्यमान है। मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी रूप को अपने-आप में समर्थ नहीं मानता। रूप का कथ्य के अनुरूप होना आवश्यक है, क्योंकि तभी कथ्य की शक्ति व्यक्त होती है। शक्ति होती कथ्य की ही है, रूप अनुकूल हो सकता है, अधूरा हो सकता है, परन्तु रूप समर्थ हो और कथ्य कमजोर हो, यह मेरी समझ में ज्यादा नहीं होता, सिर्फ  सीमित स्तर पर मैं इसको समझ सकता हूं, जैसे साहित्य में परम्पराएं होती हैं, परन्तु परम्पराओं का अर्थ केवल प्रतिभा ही नहीं होता। यह विशेष वस्तु की याद भी दिलाती है। इन परम्पराओं को सीखा भी जा सकता है। इनको सीख कर कथ्य के अनुसार ढालने से बढिय़ा रचनाएं भी रची जा सकती हैं। प्रतिभा से ऐसा प्रभाव पैदा किया जा सकता है कि रचना का रूप सतही तौर पर प्रभावशाली नजर आने लगे। मान लिया चेखव बहुत अच्छे कहानीकार हैं, उसकी कहानियों में अमूर्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ही नहीं होता, बल्कि वह एक खास बिन्दू पर तत्कालीन सामाजिक-यथार्थ को सही-सही समझने के लिए पात्रों का मनोविश्लेषण भी करते हैं। इस तरह पात्रों की मानसिक सतहों को उघाड़ते हैं। यह चेखव की विकसित की हुई शिल्प है, क्योंकि इसमें ताकत है, इसलिए अगर कोई इस शिल्प को सीख ले, परन्तु उसके पास कहने के लिए बहुत ज्यादा न हो, वह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के चमत्कार या इस तरह की अन्य लटकेबाजी दिखाने लग जाए, तो कुछ लोग कह सकते हैं कि उसका रूप बहुत शक्तिशाली है। कारण यह है कि जैसे ही किसी रचनाकार ने इस शिल्प का इस्तेमाल किया तो पाठकों को लेखक से चेखव जैसी उम्मीदें होने लगती हैं। लोग कहेंगे कि इस लेखक के पास शक्तिशाली शिल्प है, परन्तु रूप को शिल्प तक सीमित करके शिल्प में प्रवीणता पहचानना और वस्तु की ओर ध्यान न देना कोई महत्वपूर्ण कारनामा नहीं है। मैं ऐसा समझता हूं, अगर कोई रचनाकार सुंदर शिल्पकार हो, परन्तु वह सामाजिक यथार्थ में अंदर तक नहीं उतरता और सामाजिक-यथार्थ पर उसकी पकड़ मजबूत नही है, तो वस्तु का अस्तित्व में उसका कोरा शिल्प बेमानी होकर रह जाएगा। कथ्य समर्थ हो, रूप उसके अनुरूप समर्थ न हो, इसकी संभावनाएं तो बनी रह जाती हैं, परन्तु रूप वाकई में समर्थ हो और कथ्य कमजोर हो, इसकी संभावनाएं बहुत कम दिखाई देती हैं।

डा. कर्मजीत सिंह : क्या ऐसा होने पर कोई ऐतिहासिक कारण भी हो सकते हैं जैसे हमारे पंजाब में अंग्रेजों के आने के बाद एक काल को परिवर्तित काल कहा जाता है। पुरानी परम्पराएं टूट रही हैं। नई अभी बनी हैं। इस समय कई ऐसे कवि हैं, जो कविता को केवल छंदों या अलंकारों के चमत्कार दिखाने तक ही सीमित रखते हैं, परन्तु उनके पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। क्या बाकी कालों में भी ऐसा होता है?

डा. ग्रेवाल : ऐसे संधिकाल में जहां टूट रहा है और नया बनने की प्रक्रिया में है, हमें दोनों तरह की मिसालें मिल जाती हैं। किसी रचनाकार के पास नए कथ्य का दबाव है परन्तु उसके अनुरूप विकसित नहीं कर सका है। रूप को कोई एक रचनाकार तो गढ़ता नहीं, बेशक एक व्यक्ति का उसमें अपना प्रयास भी है। मोटे रूप से रूप सृजना अक्सर एक सामूहिक प्रयास ही होता है। हर रचनाकार अपनी योग्यता अनुसार रूप में कुछ न कुछ जोड़ता है। इस तरह एक कलाकृति के पीछे बहुत सारे रचनाकारों की कोशिशें शामिल होती हैं, क्योंकि जब अभी आवश्यक जमीन टूटी नहीं होती, कई बार रूप अधूरा रह जाता है। आरंभिक काल में आपको ऐसी रचनाएं मिलेंगी, जिनमें रूप अभी कथ्य के अनुरूप विकसित नहीं हो सका। दूसरी संभावनाएं भी एक तरह से दिखाई दे सकती हैं। शिल्प के तौर पर रूपगत प्रयोगों को सीखना या आत्मसात करना मुश्किल है। जैसे संगीत के शिल्प पक्ष को कुछ अभ्यास के बाद कोई भी सीख सकता है, वैसे ही साहित्य के शिल्प पहलुओं के बारे में भी कहा जा सकता है। अंग्रेजी साहित्य को सीखकर भारत में नई विधियां विकसित होने लगीं, परन्तु भारत में नई-अंतर्वस्तुएं अभी बन रही थी। यह संभव है कि कुछ समय के लिए शिल्प तो सीख लिया गया, परन्तु नई अंतर्वस्तु पूरी तरह उभर कर सामने नहीं आई, चाहे नई वस्तु का दबाव बन रहा था। ऐसी परिस्थिति में वस्तु का तीव्र रूप सामने नहीं आता, परन्तु शिल्प की महारत कुछ प्रतिभावानों के पास दिखाई देने लग जाती है। उदाहरण के लिए नवजागरण के मूल्यों में एक मूल्य जनतांत्रिक चेतना का है। इस काल में जनतांत्रिक चेतना जैसे मूल्य उभरने तो लगे, परन्तु तत्कालीन सामाजिक यथार्थ में शक्तिशाली रूप न मिल सका। अंग्रेजी साहित्य में जब ऐसे मूल्य उभरे थे तो उसके अनुरूप शिल्प भी सीखा गया था। वस्तु अगर प्रबल रूप में उभर कर सामने नहीं आया तो कई रचनाएं ऐसी सामने आ सकती हैं, जिनमें छंद नए हों, भाषा के प्रयोग भी नए हों, परन्तु ताकतवर रचनाएं भी न बन सकें।

            ऊपर हमने कहा है कि शिल्प सीखना आसान है, परन्तु यह इतना आसान भी नहीं है कि हर कोई सीख सके। परन्तु अंतर्वस्तु जो प्रबल रूप में उभर रही है, उसको तो और भी कोई विरला ही पकड़ में ला सकता है। ऐसा कोई रचनाकार वस्तु के अनुरूप शिल्प की सृजना भी करेगा। जिस रचनाकार के पास प्रतिभा नहीं है, शिल्प को तो वह ही सीख सकता है, जैसे जब कहानी लिखने का रिवाज चलता है तो कई रचनाकार कहानी लिखना शुरू कर देते हैं। आपने अच्छा मोड़ दिया है रूप और वस्तु को थोड़ा सा अलग करके उनके द्वंद्वात्मक पहलुओं  को समझने का। इस द्वंद्वात्मक को समझने का सबसे अच्छा समय वह है जहां समाज नए मोड़ ले रहा है। जैसे पुराने मूल्य ढेर हो रहे हैं पुराने ढांचे टूट रहे हैं और नया कुछ बनकर आ रहा है। इस नए निर्माण का प्रभाव साहित्य पर ही पड़ने लग जाता है। इसमें भी कुछ नया बनने लगता है। इस दौर में रूप व वस्तु को अलग करके देखना ज्यादा आसान होता है।

डा. कर्मजीत सिंह : आखिरी प्रश्न पूछने से पहले एक प्रश्न ओर। इतिहास प्रसंग में और निजी दृष्टिकोण को वस्तु के रूप संबंधी ऐसी बातचीत कर ली है, परन्तु क्या वस्तु के रूप परिवर्तन में पाठक की भी कोई भूमिका होती है?

डा. ग्रेवाल : मैं समझता हूं कि सवाल यह है कि साहित्य में नई प्रवृतियों के पीछे कौन-कौन से दबाव काम करते हैं। अगर यह समझ लिया जाए कि दबाव कौन से हैं, तो फिर यह भी समझना आसान हो जाएगा कि रूप और वस्तु इनसे कैसे प्रभावित होते हैं। हम साहित्य को एक विशिष्ट व्यवहार मानते हैं, चाहे यह विशिष्टता माध्यम की विशेषता के कारण हो या किसी और कारण, औजार पत्थर का हो या लोहे का, इससे अंतर तो आता ही है। इसी तरह साहित्य में भी माध्यम के द्वारा अंतर आता है। एक तो सोचने का तरीका यह हो सकता है कि साहित्य की विशेषता और इसके रूप की विशेषता सिर्फ माध्यम से ही तय होती है। बहरहाल हम विशिष्टता की बात कर रहे हैं। साहित्य की विशिष्टता उद्देश्यों की विशिष्टता भी तय होती है। साहित्य में माध्यम भाषा है, परन्तु भाषा सामाजिक यथार्थ से कटी हुई अपने-आप में कोई स्वायत चीज तो नहीं है। भाषा भी ऐतिहासिक विकास की पैदावार है। जब सामाजिक यथार्थ के बदलने के साथ ही वस्तु भी बदलती है और उसके अनुसार माध्यम से तय होने वाला  साहित्य का विशिष्ट रूप भी बदल गया है। माध्यम के अलावा साहित्य को विशिष्टता प्रदान करने वाले दूसरे तत्व उद्देश्य, परम्पराओं और संयुक्त रूचियों के संस्कार होते हैं। लेखक और पाठक-समूह दोनों ही लेखन की पुरानी परम्परा में रूप और कथ्य में परिवर्तन लाने में अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। व्यापारिक कला में तो यह स्पष्ट ही है कि पाठकों ने जो चीज मांगी, रचनाकार ने वह चीज दे दी। पर रचना के कथ्य और रूप के परिवर्तन की प्रक्रिया में पाठक की भूमिका केवल खरीददार की हैसियत में नहीं होती। साहित्यकार उन मुद्दों को उठाता है, जिनको वह महत्वपूर्ण समझता है और दूसरों को उनकी महत्वता समझाना चाहता है।

            शायद रचनाकार की तरह ही दूसरे लोग भी इन मुद्दों को महत्वपूर्ण समझते हैं। वह मुद्दे जो लेखक के लिए और दूसरे लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं, वही मुद्दे शक्तिशाली रचना में आते हैं। रचनाकार पर उसके समय के प्रबुद्ध लोगों की सांझेदारी से कई बार यह तय होता है कि क्या लिखा जाना चाहिए और किस तरह लिखा जाना चाहिए। सामाजिक परिवर्तन के अंतर्गत लोग सचेत या अचेत तौर पर कुछ नए की मांग कर सकते हैं। वह लेखक को ऐसा अहसास करवा सकते हैं कि क्या और किस तरह का साहित्य रचा जाए। इस तरह पाठक अपनी सामूहिक हिस्सेदारी होने के नाते लेखक पर दबाव बना सकते हैं। उनके दबाव के अधीन लेखक कई बार उन रूपों को भी बदल सकता है, जिनसे वह खुद बहुत प्यार करता है।

            मान लें कि कोई हड़ताल हो रही है, जिसकी जरूरत को पूरा करने के लिए एक समूहगान की आवश्यकता है। अगर जरूरत न होती तो शायद लोगों को प्रेरणा देने के लिए वह समूहगान न लिखा जाता। समय की मांग के अनुसार रचनाकार ऐसी रचना कर भी सकता है और ऐसी रचना शक्तिशाली भी हो सकती है। परिस्थितियोंं के दबाव, लोगों के दबाव और  उनकी जरूरतों के दबाव रचनाकार को नए ढंग के साथ रचना करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अगर फासिज्म पैदा होता है तो रचनाकार फाजिज्म के विरोध में विशेष रचनाएं रचेंगे। फाजिस्म के विरोध के आंदोलन ने युरोप में चित्रकारों और उपन्यासकारों के वस्तु और रूप में परिवर्तन लाया। मान लिया हिन्दुस्तान में एमरजेंसी लागू हुई। इस समय के दौरान आप कुछ कहना चाहते हो, परन्तु बदलती परिस्थितियों में शायद आप उस ढंग के साथ अपनी बात नहीं कह सकते, जिस ढंग से आप पहले कहना चाहते होंगे। ऐसे ही रूप में आ जाएगा। यह भी बाहरी प्रभावों का नतीजा है। यह मानकर चलना कि लेखक सिर्फ  अपनी आंतरिक जरूरतों के अनुसार ही वस्तु के रूप में परिवर्तन लाता है और आसपास के दूसरे लोगों का या पाठकों का उस पर कोई दबाव नहीं होता, सरासर गलत है। दबाव होता है, पर परिवर्तन की प्रक्रिया की जटिलता को ध्यान में रखते हुए ही नए कथ्य नए रूप में उभर कर और उनके आपसी रिश्तों को समझा जा सकता है।

डा. कर्मजीत सिंह : आखिरी प्रश्न जिसको हम महान रचना कहते हैं, उसमें रूप व वस्तु की स्थिति क्या होगी?

डा. ग्रेवाल : मैं महान रचना में और दोषरहित रचना में अंतर करता हूं। एक महान रचना ऐसी भी हो सकती है, जिसमें रूप और वस्तु का जिस तरह का अनूठा मेल होना चाहिए, उस तरह का उसमें न हो। महान कृति वस्तु की महानता से बनती है। जब तक महान वस्तु के अनुरूप रूप नहीं बनेगा, वस्तु का प्रभाव कुछ हद तक तो कमजोर रहेगा। अगर रचनाकार कथ्य के अनुसार शक्तिशाली रूप का निर्माण नहीं भी कर सका, तो भी अधूरे रूप के माध्यम से कथ्य कुछ-न-कुछ अभिव्यक्त हो ही जाएगा। अधूरापन ज्यादा न हो तो ऐसी हालत में महान परन्तु अपूर्ण रचना की कल्पना की जा सकती है। सक्षम रचनाकार वस्तु के धरातल पर जो कुछ भी जीवंत या शक्तिशाली है, उसको ग्रहण कर लेता है। अपनी सृजनात्मक शक्तियों को रचनाकार काफी हद तक जनता से ही लेता है। या फिर वह पूर्व के रचनाकारों के प्रयोगों को आत्मसात करता है। एक सक्षम रचनाकार रूप के धरातल से भी वह सारी शक्तियां समेट लेता है, जो उस समय परम्पराओं में और लोगों में विद्यमान हैं। जिस युग में उथल-पुथल हो रही है, परिवर्तन आ गया है या समाज जागृत हो रहा है तो एक शक्तिशाली कथ्य को साहित्य में लाने की संभावनाएं ज्यादा हो जाती हैं। इस समय कोई न कोई सक्षम रचनाकार उभर ही आता है, जो कथ्य और रूप की शक्ति को समेट कर कुछ अपनी मेहनत के साथ कुछ दूसरों से ग्रहण करके ऐसा रूप भी निर्मित कर लेता है, जो शक्तिशाली कथ्य के अनुरूप हो।

            मैं समझता हूं कि एक बढिय़ा और सम्पूर्ण अथवा दोषरहित रचना में कथ्य और रूप के अंतरविरोध लगभग न के बराबर होते हैं। एक दोषरहित रचना महान हो भी सकती है और नहीं भी। जिस तरह मैंने पहले भी कहा है कि एक सफल रचना में रूप और वस्तु में द्वंद्व कम से कम हो जाता है। कई साहित्यकार ऐसे हैं जो शक्तिशाली कथ्य को उसके अनुरूप रूप का निर्माण करके सम्पूर्ण रचनाएं भी दे सकते हैं। विश्व साहित्य के इतिहास में ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाऐंगे। सेक्सपीयर हो, चेखव हो या टालस्टाय, प्रेमचंद हो या पंजाबी साहित्य में पूर्णसिंह हों, इन सब में कथ्य की ताकत भी है और उस अनुसार रूप का अंतर-द्वंद्व लगभग समाप्त हो जाता है। इसका अर्थ सिर्फ  इतना है कि हमें विरोध का अहसास कम होता है और अनुरूपता का अहसास ज्यादा। पर इतना जरूर मानना पड़ेगा कि क्योंकि भौतिक जगत में अंतर्विरोध कभी भी पूरी तरह गायब नहीं होते और जैसे ही पुराने अंतर्विरोध समाप्त कर दिए जाते है, तो नए अंतर्विरोध पैदा हो जाते हैं। इसी तरह भौतिक संसार की गतिशीलता बनी रहती है। मुकम्मल रचना भी में बीज रूप में छुपे कुछ न कुछ अंतर्विरोध तो हर स्तर पर सोए रह सकते हैं कि उस हालत में वह हमारी पकड़ में न आते हों। इस अर्थ में मुझे मानना पड़ेगा कि सक्षम और सफल रचना में भी अंतर्विरोध पूरी तरह गायब नहीं हो सकते।

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