डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल – साहित्य और राजनीति के अंत:सम्बन्ध

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आलेख


साहित्य और राजनिति में जो फर्क है, वह तो ई. एम. एस. ने स्पष्ट कर ही दिया है कि राजनीति में ”अपनी सत्ता को बनाये रखने अथवा सत्ता प्राप्त करने की लड़ाई’’ होती है, जबकि ”साहित्य में सत्ता के लिए कोई सीधा संघर्ष नहीं होता। साहित्यकार वास्तविक जीवन से कलात्मक बिंबों का सृजन करते हैं तथा जनता की खुशियों और तकलीफों को वाणी देते हैं।’’ जहां तक दोनों के अंत:संबंधों की बात है, दोनों में अनिवार्य संबंध यह है कि वर्ग-विभक्त समाज में साहित्य क्योंकि वर्ग-संघर्ष से निरपेक्ष नहीं रह सकता, इसलिए उसमें व्यक्त विचार, भावनाएं, सौंदर्याभिरूचियां आदि समाज में जारी वर्ग-संघर्ष के विशिष्ट रूप से प्रभावित होती हैं और उनसे युक्तसाहित्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में  कमोबेश वर्ग-संघर्ष के उस विशिष्ट रूप को प्रभावित भी करता है। अत: साहित्य और राजनीति के कार्यक्षेत्र यद्यपि भिन्न होते हैं, फिर भी उनकी भिन्न भूमिकाएं एक समान लक्ष्य की दिशा में समाज को प्रेरित करने वाली होती हैं। दोनों के इस अनिवार्य संबंध के आधार पर ही प्रगतिशील साहित्य सामाजिक परिवर्तन में सहायक होता है, जबकि प्रतिक्रियावादी उसमें बाधक बनता है साहित्य और राजनीति में फर्क उस समय ज्यादा दिखाई देता है जब समाज में वर्ग-संघर्ष की प्रक्रिया धीमी होती है, लेकिन ज्योंही वह प्रक्रिया तेज होती है, दोनों का संबंध परोक्ष संबंध न रहकर प्रत्यक्ष और अधिक स्पष्ट हो जाता है। यों भी कह सकते हैं कि जिस हद तक विचार एक भौतिक शक्ति बन सकते हैं, उस हद तक अच्छा साहित्य भी सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में एक अस्त्र बन सकता है। ऐसी स्थिति में साहित्य और राजनीति के अनिवार्य संबंध को रेखांकित करना एक तात्कालिक आवश्यकता बन जाता है।

            असल में साहित्य और राजनीति के अंत:संबंधों की बहस तभी अधिक सार्थक हो उठती है जब साहित्यकारों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास करना जरूरी हो जाये, अर्थात् उनको इस बात की ओर सचेत करना जरूरी हो जाये कि उनका साहित्य अनिवार्य रूप से या तो बहुसंख्यक मेहनतकश जनता के हितों का पोषक होगा या विरोधी और उन्हें जरूरी तौर पर यह निर्णय लेना होगा कि उनके साहित्य-कर्म की पक्षधरता किस ओर हो। भारत में आज के जनवादी उभार के साथ ही यह अहसास भी उभरा कि साहित्य राजनीति से कटकर नहीं, बल्कि दोनों के संबंध को सचेत रूप से समझकर ही सार्थक हो सकता है। आज बहुसंख्यक जनता के हितों को साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाने की बात सभी जनवादी लेखक महसूस करते हैं, बहस का मुद्दा केवल यह रहता है कि वे इस जिम्मेदारी को किस रूप में निभायें। एक रूप यह हो सकता है कि साहित्यकार सर्वहारा वर्ग की विचारधारा के साथ राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हो और राजनीतिक संगठन के अनुशासन में उसके कार्य को आगे बढ़ाने के लिए लेखन का उपयोग करे। दूसरा रूप यह हो सकता है कि वह उस विचारधारा के साथ साहित्य के क्षेत्र में ही सक्रिय रहे और राजनीतिक संगठन से जुड़कर सही समझ तथा जन-संघर्षों में शामिल होकर रचना के लिए आवश्यक अनुभव प्राप्त करके साहित्य को प्राणवान, सार्थक और समाज के लिए अधिक उपयोगी बनाये। साहित्यकार की जिम्मेदारी को निभाने के ये दोनों अलग-अलग ढंग हैं, किन्तु इन दोनों की अपनी सार्थकता है। विभिन्न जनवादी लेखकों को अपनी परिस्थितियों, रूझानों और कार्यक्षमताओं के अनुकूल यह निर्णय लेना होता है कि वे इनमें से कौन-सा ढंग अपनायें। एक जनवादी लेखक की राजनीतिक प्रतिबद्धता कितनी तीव्र हो चुकी है, इससे ही अंतत: यह तय होता है कि उसकी साहित्यिक गतिविधियों का राजनीतिक तेवर कितना प्रखर होकर सामने आये। जनवादी साहित्य के उभार के जिस दौर से हम आज गुजर रहे हैं, उसमें विभिन्न साहित्यकारों की राजनीतिक प्रतिबद्धताएं, जाहिर है, एक जैसी अथवा एक ही स्तर की नहीं हो सकतीं। अत: आज के दौर में राजनीति और साहित्य का अनिवार्य संबंध भी अलग-अलग लेखकों की साहित्यिक गतिविधियों में भिन्न रूपों में सामने आयेगा। सभी साहित्यकारों से यह अपेक्षा करना कि वे साहित्य और राजनीति के निकट संबंध को पहनचानते हुए लगभग एक जैसी भूमिका निभायें, उचित नहीं होगा, और न ही उन पर एक प्रकार की जिम्मेदारी थोंपी जा सकती है।

            मेरा विचार यह है कि मार्क्सवादी विचारधारा को यांत्रिक रूप में अपनाने, थोंपने या मात्र राजनीतिक अनुशासन स्वीाकर कर लेने से साहित्यकार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभा सकता। एक साहित्यकार के रूप में उसे एक अच्छा लेखक होना चाहिए। अच्छा लेखक होने के लिए यह जरूरी है कि वह जन-जीवन और जन-संघर्षों का सही और प्रभावशाली चित्रण करने में सक्षम हो, और इसके लिए जरूरी है कि उसकी राजनीति समझ साफ  और दृष्टि पैनी हो। लेकिन ऐसी समझ, दृष्टि और लेखन क्षमता-विकसित करने की प्रक्रिया बड़ी पेचीदा है। आज के जनवादी लेखन की समस्या नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी को सही ढंग से न निभा पाने की समस्या है। कुछ लेखक इस समस्या को केवल वैचारिक स्तर पर सुलझा लेने की कोशिश में मार्क्सवादी विचारधारा को कुछ जल्दबाजी में और यांत्रिक रूप से अपना लेते हैं। इस प्रकार के लेखकों की साहित्यिक भूमिका में और उसके माध्यम से वे जो राजनीतिक भूमिका निभाना चाहते हैं, उसमें एक अंतर्विरोध या टकराव-सा पैदा हो जाता है। वे संघर्षरत तबकों की जीवन-स्थितियों को केन्द्रीय विषय के रूप में चुनकर उनका कलात्मक चित्रण कर पाने में अक्षम होने पर भी उन्हीं को केन्द्रीय विषय के रूप में चुनने लगते हैं और इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन में अपनी भूमिका निभाने के लिए अपेक्षित तैयारी से कहीं ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी उठा लेते हैं। इससे उनका साहित्य-कर्म पुष्ट होने के बजाय कमजोर होता है। उनकी भावभूमि और संवेदना प्राय: मध्यवर्गीय होती है। सर्वहारा वर्ग की राजनीति से जुड़कर उनकी दृष्टि का विस्तार तो हो जाता है, लेकिन भावभूमि और संवेदना वही रहती है। फिर भी वे लेखन वैसा ही करना चाहते हैं जैसा सर्वहारा वर्ग के लेखक का होना चाहिए। इसलिए उनका लेखन हल्का और कई बार अप्रामाणिक लगता है। रचनाधर्मिता और राजनीतिक प्रतिबद्धता का यह ‘अनावश्यक अंतर्विरोध’ 70 के बाद की हिंदी कहानी और कविता दोनों में बहुत सारे रचनाकारों में देखा जा सकता है। कारण यह है कि ऐसे लेखन के लिए उनकी तैयारी अभी पूरी नहीं है।

            सामाजिक परिवर्तन के मूल लक्ष्य के आधार पर राजनीति और साहित्य के निकट संबंध की दृष्टि से राजनीतिक कार्यकत्र्ता और साहित्यकार की भूमिकाएं तथा कार्य-क्षेत्र भिन्न हैं। मसलन, राजनीतिक कार्य में रणनीति के अलावा कार्यनीतियों पर खासा जोर रहता है। साहित्यिक कृति में राजनीतिक मसले और कार्यनीतिक प्रश्न विषयवस्तु के रूप में उठाये जायें, यह जरूरी नहीं है। अर्थात् प्रतिबद्ध साहित्य में यह जरूरी नहीं है कि राजनीतिक कथ्य सीधे रूप में और हमेशा आये। राजनीति के क्षेत्र में कार्यरत बौद्धिकों के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वे दैनंदिन घटनाओं पर रणनीति और कार्यनीति की दृष्टि से लगातार टिप्पणी करें और उन घटनाओं की सही व्याख्या करते हुए जन-आंदोलनों की तात्कालिक आवश्यकताओं से संबंधित व्यावहारिक निष्कर्षों पर पहुंचे। साहित्य में यह आवश्यक नहीं है। विशेष परिस्थितियों में तात्कालिक और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार प्रचार के लिए राजनीतिक कथ्य सीधे-सीधे रचना में लाया जा सकता है, लेकिन इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि सामाजिक परिवर्तन में साहित्य की यही भूमिका है या कि यही सबसे सही भूमिका है। ।

            आज की स्थितियों में एकांतिक रूप से संस्कृति के क्षेत्र में ही काम करने वाले या निरे साहित्यकार लोग कम ही होंगे। उनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो परिस्थितियों के प्रभाववश सांस्कृतिक कार्य से राजनीतिक कार्य को प्राथमिकता और वरीयता देने लगें।  यह भी हो सकता है कि वे धीरे-धीरे प्रमुख रूप से राजनीतिक कार्यकर्ता बन जायें और सांस्कृतिक या साहित्यिक क्षेत्र से जुड़ी जिम्मेदारियों को सीधे-सीधे न निभा पायें। पर ऐसे लोगों की भी संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में एक विशिष्ट भूमिका बनी रहती है। जनवादी लेखकों, कलाकारों की सांस्कृतिक गतिविधियों के राजनीतिक पहलू को सही ढंग से उभारने तथा उसकी संगठित अभिव्यक्ति को संभव बनाने अथवा पुष्ट करने में वे एक अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। इस लक्ष्य के तहत वे सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण, संगठन, निर्देशन और नेतृत्व करते हुए साहित्य और राजनीति के क्षेत्रों में एक जरूरी तालमेल पैदा कर सकते हैं। लेकिन यह तालमेल कैसा हो और किस तरह किया जाये, इस पर दोनों क्षेत्रों की भिन्नताओं और विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाना चाहिए।

            वे जनवादी साहित्यकार, जिनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता काफी तेज हो चुकी हो, सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दलों को सहयोग देने के लिए कोई मंच या संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस कर सकते हैं, लेकिन वह संगठन राजनीतिक संगठन जैसा नहीं हो सकता। चूंकि साहित्यकारों के संगठन में सत्ता का सवाल केन्द्रीय सवाल नहीं होता, इसलिए उसमें निर्देशन और अनुशासन की वैसी आवश्यकता नहीं होती जैसी कि राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओं के लिए अनिवार्य है। इस बात पर जोर देना आज की परिस्थितियों में इसलिए भी जरूरी है कि जनवादी साहित्यकारों का जो भी संगठन या मंच आज बनाया जा सकता है, उसमें बहुत-से ऐसे लेखकों और कलाकारों का सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक होगा जो किसी भी राजनीतिक समझ और राजनीतिक प्रतिबद्धता जनवादी अधिकारों और जनवादी मूल्यों की रक्षा करने के लक्ष्य से बहुत आगे न बढ़ पायी हो।

            इसका मतलब यह नहीं कि साहित्यकारों का कोई संगठन नहीं हो सकता या नहीं होना चाहिए, लेकिन साहित्यकारों का संगठन राजनीतिक संगठन से भिन्न होगा और होना चाहिए। संस्कृति के राजनीतिक पहलू का राजनीतिक गतिविधि से तालमेल बिठाने में साहित्यकारों को उस दल का निर्देशन प्राप्त करना उचित ही होगा, जिसे वे सही मानते हैं, लेकिन यह निर्देशन राजनीतिक गतिविधियों के निर्देशन से भिन्न होगा। साहित्यकारों के किसी भी संगठन पर हम ‘जनवादी केन्द्रीयतावाद’ के सिद्धांत को उस रूप में लागू नहीं कर सकते जिस रूप में इसे राजनीतिक क्षेत्र में लागू किया जाता है और न ही उस संगठन का स्वरूप ट्रेड-यूनियन जैसा हो सकता है।

            तात्पर्य यह कि जहां तक सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से राजनीतिक सवालों और साहित्यकारों की गतिविधियों को ‘कोआर्डिनेट’ करने का कार्य है, वह तो आज के दौर में जरूरी-सा हो गया है। वर्ग-संघर्ष के तेज हो जाने पर सामाजिक परिस्थितियों की यह मांग हो जाती है कि सांस्कृतिक कार्यकर्ता जब-तब केवल व्यक्तिगत रूप में ही नहीं, अपितु सामूहिक रूप में भी राजनीतिक हस्तक्षेप करें। सांस्कृतिक गतिविधियों के राजनीतिक पक्ष की संगठित अभिव्यक्ति करते समय साहित्यकारों के विशिष्ट संगठन जिस दल को भी वे उचित समझते हैं, उसका निर्देशन ले सकते हैं’ लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक दल और सांस्कृतिक संगठन एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक तो हो सकते हैं, पर अभिन्न या एक जैसे नहीं हो सकते। अत: साहित्यकारों के संगठन का सवाल, न केवल सांस्कृतिक क्षेत्र का सवाल है, न केवल राजनीतिक क्षेत्र का, दरअसल यह दोनों के तालमेल का सवाल है और साहित्य और राजनीति के अनिवार्य अंत:संबंध के सवाल के केवल एक पक्ष को ही लक्षित करता है।

            इस प्रकार के तालमेल के अलावा भी साहित्य और राजनीति के अनवार्य अंत:संबंध के कुछ अन्य रूप हो सकते हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों के राजनीतिक आयाम को रचनाओं के माध्यम से ही उभारना और उसका विस्तार करना भी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। और इसमें राजनीति की भूमिका होती है लेखकों की समझ को निखारने की और व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उनके अनुभव और चिंतन को सही दिशा देने की। यह काम साहित्य की सही आलोचना, गोष्ठियों, सम्मेलनों, परिचर्चाओं, पत्रिकाओं आदि के माध्यम से सार्थक और महत्वपूर्ण रचना का वातावरण बनाकर किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि इससे साहित्य का विकास होता है और उससे सही राजनीति भी आगे बढ़ती है। आज की परिस्थितियों में, जबकि राजनीतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, साहित्यकारों को यह मानकर चलना चाहिए कि उन्हें अधिक-से-अधिक राजनीतिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ेंगी। इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए साहित्यकार को राजनीतिक दल से उपयुक्त शिक्षा और निर्देशन मिल सकता है, लेकिन राजनीतिक दल को यह ध्यान रखना होगा कि साहित्यकारों का मार्गदर्शन करने की उसकी भूमिका उनकी राजनीतिक समझ को विकसित, परिष्कृत करने तक ही मुख्यत: सीमित रहे। दूसरी तरफ  साहित्यकार को यह मुगालता नहीं पालना चाहिए कि वह साहित्य के माध्यम से राजनीति को दिशा या नेतृत्व प्रदान कर सकता है।

            हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें साहित्य और राजनीति दोनों के तालमेल की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, लेकिन इसके चलते दोनों क्षेत्रों की विशिष्टता को नहीं भूलना चाहिए। साहित्य के माध्यम से राजनीतिक कार्य कुछ हद तक तो किया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र की प्राथमिकताएं साहित्य के क्षेत्र की प्राथमिकताएं नहीं हो सकतीं। अत: आज जिस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है, वह यह है कि साहित्यकार साहित्य और राजनीति के अनिवार्य संबंध को समझें, सामाजिक परिवर्तन की राजनीति गतिविधियों से अपनी साहित्यिक गतिविधियों का तालमेल बढ़ायं, सही रजनीतिक दल से जुड़ने का प्रयास करें, जिससे सामाजिक यथार्थ की सही समझ विकसित करना उनके लिए अधिक संभव हो सके और वे जन-जीवन और जन-संघर्षों के अपने अनुभवों को समृद्ध और व्यापक बना सकें तथा उनका सही और प्रभावशाली चित्रण करने में सक्षम हों। जाहिर है कि साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण उनकी प्राथमिकताएं साहित्य के क्षेत्र की प्राथमिकताएं होंगी, लेकिन उन्हें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि लेखन आपकी प्रमुख भूमिका हो भी तो वह जीवन का व्युत्पन्न (बाइप्रोइक्ट) ही है, जीवन का स्थानापन्न (सब्सटीट्युट) नहीं। लेखन किसी उद्देश्य के लिए होता है, अपने आप मे वह कोई पर्याप्त उद्देश्य नहीं हो सकता। जो लेखक जीने के लिए, अर्थात एक बेहतर समाज में बेहतर ढंग से जीने के लिखता है, वही अच्छा लेखन कर सकता हैं इसके विपरीत जो लेखक लिखने के लिए जीता है, वह घटिया लेखन करता है।

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