सहीराम – कुछ मुंबइया फिल्में और हरियाणवी जनजीवन का यथार्थ

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                सिनेमा


अभी तक यही माना जाता रहा है कि हरियाणवी जन जीवन खेती किसानी का बड़ा ही सादा और सरल सा जन जीवन है। इसमें न कोई छल-कपट है, ना कोई दिखावा है, ना कृत्रिमता, ना कोई बनावट है और ना ही कोई दोहरापन है। ना कोई जटिलता है, ना किसी तरह के अंतर्विरोध हैं, ना किसी तरह की विडंबनाएं हैं। दुराव-छिपाव और आधुनिकता की लानत से पूरी तरह दूर, यह एकदम देहाती, सरल और सपाट सा जन जीवन है। असल में हरियाणवी जन जीवन की यह छवि हम सबने मिलकर गढ़ी है। हमारे चतुर-चालाक नेताओं ने, घाघ नौकरशाहों ने, शहरों में बस गए और दोहरी जिदंगी जीते यहां के नए-नवेले मध्यवर्ग ने – क्लासिक अर्थ में जो अभी मध्यवर्ग बन भी नहीं पाया है, उथलेपन से ग्रस्त मीडिया ने, हमारे लोक जीवन को लोकप्रिय ढ़ंग से सामने लानेवाले गायकों, भजनियों और सांगियों ने और उन कलमकारों ने भी जिन्होंने गहरे पानी पैठने की कभी कोशिश नहीं की। वरना किसी भी क्षेत्र का जन जीवन इतना सरल और इतना सपाट होता नहीं है। यहां तक कि आदिवासी जन जीवन भी इतना सरल और सपाट नहीं होता।

                असल में अपनी इस पहचान को हमने लाडले बच्चे की तरह पाला है, जिसे हर बुरी नजर से बचाया जाता है। उसकी सारी कमियों और खामियों को बड़े जतन से छिपाया जाता है। इस पहचान को हमने घर की उस बहू की तरह से रखा है जिसका पर्दा हटने से घर की इज्जत जाने का डर रहता है। इस पहचान को हमने बड़े ही पवित्र ढंग की चीज माना है जिसकी तरफ ना उंगली उठायी जा सकती है और ना ही जिस पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं।

                वास्तव में देखा जाए तो इसकी जड़­ हमारे पिछड़ेपन में ही हैं। इसकी जड़­ उस राजनीतिक पिछड़ेपन में हैं जिसकी हकीकत यह है कि हम स्वतंत्रता आंदोलन की उस सारी उथल-पुथल तक से वंचित रहे जिसने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया था। भारतीय जन जीवन में उठी यह सबसे बड़ी राजनीतिक आंधी थी, जिसके झौंके से कोई नहीं बचा था। कैसे कोई भूल सकता है कि हमारा पड़ोसी पंजाब, जिसका तब हम एक हिस्सा ही थे, हमारे बस इसी हरियाणा वाले हिस्से को छोड़कर, वह उसमें गहरे तक मुब्तिला रहा। निश्चय ही हम इस पर गर्व कर सकते हैं कि यही हरियाणा वह क्षेत्र है जिसके हर गांव और हर बस्ती ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। उस वक्त इस क्षेत्र की शायद ही कोई रियासत ऐसी रही होगी, कोई राजा या नवाब ऐसा बचा रहा होगा, जो इस लड़ाई से दूर रहा हो, जबकि विडंबना देखिए कि पंजाब की रियासत­ तब अंग्रेजों का साथ दे रही थी।

                लेकिन उसके बाद एक खला पैदा हुई, एक ऐसा खालीपन, ऐसा शून्य पैदा हुआ, ऐसा अलगाव बना, ऐसा दुराव पैदा हुआ, ऐसा मानस बना कि राज के अगाड़ी ना आना हमारा सिद्धांत ही बन गया। इसकी वजह निश्चय ही वह दमन, वह जुल्म रहा होगा जो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने यहां की जनता पर ढाया था। उसे दंडित करने के लिए और जिससे शायद कोई नहीं बचा था।

                इसी जुल्म ने यह सबक दिया होगा कि हमें राज के अगाड़ी नहीं आना चाहिए। हालांकि जुल्म कभी कोई सबक देता नहीं है। वह सिर्फ जख्म देता है। कई बार जिन्हें भरने में सदियां भी लग जाती हैं। यह सिद्धांत भी निश्चयही इस जख्म की मलहम ही रहा होगा। या फिर हो सकता है उस दर्द को भुलाने के लिए किया गया कोई नाश। निश्चय ही अपवाद भी रहे। बल्कि सच्चाई तो यह है कि गदरियों में भी हरियाणवियों का हिस्सा बहुत बड़ा था। सो इस क्षेत्र के जो भी थोड़े-बहुत लोग स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल रहे, वे सम्माननीय हैं। पर यह भी सच है इस आंदोलन के मूल्य जनमानस के मूल्य नहीं बन पाए। अंतर्विरोध यही होते हैं, विडंबनाएं ऐसे ही सामने आती हैं।

                इसकी वजह उस सांस्कृतिक पिछड़ेपन में भी है जो शिक्षा से दूरी के चलते पैदा हुआ। आजादी के सत्तर साल बाद आज भी स्थिति यह है कि हमारे यहां ऐसे परिवारों की तादाद बहुत बड़ी है जहां सिर्फ पहली-दूसरी पीढ़ी ही शिक्षा से जुड़ पायी है। ऐसे में किसी सांस्कृतिक आंदोलन, किसी रेनेसां की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। बंगाल के जिस रेनेसां की बात होती है वहां पंद्रह-पंद्रह और इससे भी अधिक पीढिय़ों से आधुनिक शिक्षा है।

                खुद हमारा पड़ोसी पंजाब उस तरह से आधुनिक शिक्षा से वंचित नहीं रहा, जितना पंजाब का हमारा यह हिस्सा रहा। इसकी वजह शायद यह रही कि तब भी लाहौर एक बहुत ही विकसित शहरी केंद्र था। शायद दिल्ली से भी ज्यादा। हमारे पड़ोस में दिल्ली जरूर थी, पर वह वैसे हमारी नहीं थी जैसे लाहौर पंजाबियों का था या कलकत्ता बंगालियों का था। दिल्ली हमारे लिए एक अजनबी शहर था, बल्कि उसके मुकाबले आगरा कहीं ज्यादा अपना था।

                इसकी वजह उस सामाजिक पिछड़ेपन में है, जिसे आर्य समाज जैसा समाज सुधार आंदोलन भी दूर नहीं कर पाया। अगर समाज सुधार आंदोलनों के लिहाज से देखा जाए तो आर्य समाज एक मात्र ऐसा समाज सुधार आंदोलन रहा, जिसका कुछ असर हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में रहा है। जबकि बंगाल में ब्रह्म समाज, सती प्रथा विरोध आदि अनेक समाज सुधार आंदोलन चले। खुद हमारे पड़ोसी पंजाब में आर्यसमाज के अलावा सिख समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ अकाली आंदोलन चला। आर्य समाज आंदोलन का असर हरियाणा में रहा तो जरूर, लेकिन वह बहुत ही सीमित था। अलबत्ता आर्य समाज ने इस क्षेत्र की जनता को आधुनिक शिक्षा से जरूर परिचित कराया, पर वह उसे वह आधुनिक भावबोध नहीं दे पाया, जिसकी खुद उसमें भी कमी थी। वह समाज सुधार की बजाय एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन बन कर रह गया और यहां के जन जीवन ने उसके उन्हीं तत्वों को ज्यादा ग्रहण किया, जो प्रतिगामी थे।

                आधुनिक राजनीति मंथन से दूरी, जिससे आधुनिक सामाजिक मूल्य भी बने, आधुनिक शिक्षा से दूरी, जो आधुनिक सांस्कृतिक संस्कार देती है और समाज सुधार आंदोलनों से दूरी, जो समाज को आधुनिकता की दिशा में आगे बढ़ाते हैं, इन तमाम बातों ने ही यह स्थिति पैदा की कि हम अपने पिछड़ेपन को ही महिमामंडित करते रहे, उसका गुणगान करते रहे, उसे ही आदर्श मानते रहे।

                इसके चलते हम सिंधु घाटी सभ्यता, महाभारत और गीता, वेदों और पुराणों से तो जुड़ते रहे, उन्हें तो अपना मानते रहे, उन पर तो गौरवान्वित होते रहे, पर आधुनिकता से हमने एक ऐसी सुरक्षित दूरी बनाए रखी कि वह बस हमें रोजगार तो दे दे, पर हमारे लोकजीवन को ना छुए। उन मूल्यों को ना छुए जिनमें काफी कुछ आदिमपन है और जिस पर सामंतवाद की चाशनी चढ़ी है जिसकी वजह से वह अपने भोलेपन की सीमाओं को लांघकर काफी सांघातिक हो जाता है।

                हरियाणवी जन जीवन की यह जो छवि हमने गढ़ी थी, यह कुछ दिन और चलती रह सकती थी। लेकिन इसे पहले तो तोड़ा हरित क्रांति ने। पर हरित क्रांति से भी पहले फौज की नौकरी और आधुनिक शिक्षा इसमें थोड़ी सेंध जरूर लगा चुकी थी। लेकिन आधुनिकता से फौजियों का परिचय स्वाभाविक नहीं था। वह कुछ-कुछ थोपा हुआ और कृत्रिम था। मन और सोच से वे अभी भी किसानों के वे बेटे ही थे, जिन्हें उनकी गरीबी ने फौजी का बाना धारण करने पर मजबूर किया था। और वैसे भी रिटायर होकर वे गांव ही लौट रहे थे, उसी माहौल जो उनके मन से कभी जुदा हुआ ही नहीं था। और गांव भी उन्हें वैसे ही अपनी बाहों में समेट रहे थे जैसे बिछड़े हुए बच्चे को कुछ और अधिक लाड़ से मां समेट लिया करती है।

                इसी तरह आधुनिक शिक्षा के संपर्क में आयी पहली एक-दो पीढिय़ां भी, जिनके ऊपर के स्तर में ज्यादातर वकालत के पेशे से जुड़े लोग ही आते थे और निचले स्तर राजस्व विभाग के वे कारिंदे आते थे, जो पटवारियों आदि के रूप में सरकारी नौकरियां करने लगे थे। इन दोनों ही स्तरों के लोग पुरानी मनोदशा और मनोभाव में गर्क रहते थे। कुछ मजबूरन और कुछ रूमानियत के चलते।

                राजस्व विभाग के नौकरीशुदा और वकालत के पेशे से जुड़े लोग दोनों ही अपनी पेशागत मजबूरी के चलते भी और क्योंकि राजनीति में भी वकालत के पेशे से जुड़े हुए लोग ही ज्यादा सक्रिय थे, इसलिए अपनी राजनीतिक सक्रियता के चलते भी गांव से उनका प्रगाढ़ रिश्ता बना हुआ था। बेशक वे गांव और शहर के बीच पुल का काम भी कर रहे थे। पर वे सुकून ग्रामीण परिवेश में ही पाते थे।

                आधुनिक शिक्षा के संपर्क में आनेवालों की एक तीसरी श्रेणी भी थी और वह थी शिक्षण के पेशे से जुड़े लोगों की, जिनका समाज को आधुनिक भावबोध देने में तो चाहे उतना बड़ा योगदान ना रहा हो, जैसा कि बंगाल जैसे प्रांतों में रहा-याद कीजिए चटगांव विद्रोह के नायक सूर्य सेन शिक्षक ही थे। पर समाज के नए तबकों को शिक्षा से जोडऩे में उन्होंने अहम भूमिका अदा की, जिसको कम करके नहीं आंका जा सकता।

                जो काम न फौज की नौकरी कर पायी और न ही आधुनिक शिक्षा से रोजगार पाए हुए लोग, वह काम हरित क्रांति ने किया। हरित क्रांति ने इस छवि को पहली बार काफी शिद्दत से झकझोरा। हरित क्रांति जमीन से अतिरिक्त उत्पादन के जरिए पैसा तो लेकर आयी ही थी और मशीनरी से तो परिचय करा ही रही थी, शहरी जन जीवन से भी वाकफियत बढ़ा रही थी।

                हरियाणवी जन बाजरे और ज्वार जैसा मोटा खाना छोड़ रहा था और गेहूं को बड़े पैमाने पर अपना रहा था। वह मोटा-झोंटा पहनना छोड़ रहा था और पॉपलीन, टैरालीन को अपना रहा था। चमड़े की गांव के कारीगर का बनायी हुई जूतियां पहनना छोड़, वह चप्पल­ और स­डिल पहन रहा था। हाथ की चक्की का पिसा आटा खाना छोड़ बिजली की चक्की से पिसा आटा खाने लगा था। इसलिए शहरी जन जीवन से वाकफियत का यह काम हरित क्रांति काफी उथले ढ़ंग से कर रही थी। और असल में तो हरित क्रांति से समृद्ध और संपन्न हो रहा तबका शहरी मध्यवर्गीय जन जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं से अभी भी दूर था और अगर कोई नजदीकी बन भी रही थी तो उसका भी दिखावा यही था कि वह उनसे दूर है और अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक पिछड़ेपन को वह अभी भी महिमामंडित करने में ही लगा था।

                इसलिए आश्चर्य नहीं कि जब पूरा हरियाणा देश में सबसे पहले सड़क संपर्क से जुड़ रहा था, जब पूरे हरियाणा का देश में सबसे पहले विद्युतिकरण हो रहा था, तब भी उसकी छवि ‘‘देसां में देस हरियाणा, जित दूध दही खाणा’’ वाली ही बनायी जा रही थी और बड़े ही सचेत ढ़ंग से बनायी जा रही थी। पूरा राजनीतिक संस्थान यही छवि गढ़ रहा था क्योंकि इस छवि के जरिए वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि हरियाणा को उनकी राजनीति संपन्न तो बना ही रही है, साथ ही संपन्नता से आनेवाली बीमारियों से भी बचाए हुए है। जबकि खुद उन्हें उनके कुकृत्यों की खुली छूट मिली रह सकती है। प्रशासन भी राजनीति का ही अनुसरण कर रहा था। क्योंकि इसी में उसकी भलाई थी।

                मीडिया की भी ऐसे जन जीवन और ऐसे समाज में कोई दिलचस्पी नहीं थी जिससे कोई खबर ही नहीं निकल सकती थी। उस जमाने में मीडिया में खबर­ बनती थी – भूख और गरीबी से। यह सच है कि हरियाणा में भुखमरी जैसी कोई स्थिति नहीं थी,जो बिहार, बंगाल, उड़ीसा जैसे राज्यों में दिखाई देती थी। यहां न जमींदारों और मुजारों के बीच का टकराव था जैसा कि बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में दिखाई देता था और जिसकी वजह यह थी कि जमींदारी प्रथा यहां थी ही नहीं, रवैतवाड़ी प्रथा थी। यहां औद्योगिक असंतोष भी नहीं था क्योंकि उद्योग थे ही नहीं। बेरोजगारी की समस्या भी उतनी सघन नहीं थी, जो बाद के वर्षों में हुयी। तब तक फौज और पुलिस की नौकरियां इस सघन बनती समस्या के सेफ्टी वॉल्व की तरह काम कर रही थी और इसे विस्फोटक नहीं बनने देती थी। फिर भ्रष्ट और घूसखोर नेता सरकारी क्षेत्र में भी अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते कुछ नौकरियां तो दे ही रहे थे। इसलिए एक आदर्श शांत, सपाट सा जीवन था। हालांकि निचली स्तर पर असंतोष और आंदोलन खदबदा रहे थे, जिसका उदाहरण सत्तर के दशक के आरंभ में हुआ शिक्षकों का आंदोलन था।

                पर क्योंकि निचले स्तर पर खदबदा रहे आंदोलन को देखने में शासक वर्ग की कोई रुचि नहीं थी, सो एक सीधे, सरल और सपाट जीवन की छवि बनाए रखी गयी। हालांकि हरित क्रांति के जमाने में आंख­ खोलने वाली पीढ़ी से निकल रहे नए लेखक जन जीवन की इन सारी विडंबनाओं और अंतर्विरोधों को पहचानने लगे थे और उस ढोंग को समझने लगे थे। अभी यह दृष्टि हासिल की ही जा रही थी कि वैश्वीकरण ने धावा बोल दिया।

                वैश्वीकरण ने पूरी निर्ममता के साथ इस गढ़ी हुयी छवि को ध्वस्त कर दिया। उसने सिर्फ अर्थव्यवस्था के नेहरूवादी मॉडल को ही नहीं उलटा बल्कि सामंतवाद ने ग्रामीण आदर्शवाद के जो परकोटे निर्मित कर रखे थे और जिसमें हरित क्रांति से पैदा हुआ पूंजीवादी रूप उसका साथ दे रहा था, उन पर भी जबरदस्त धावा बोला था। पैसा खुल कर खेलने लगा था। राजनीति कहीं सांप्रदायिकता तथा जातिवाद का, तो कहीं बाहुबल का सहारा तलाश रही थी, तो कहीं वह पूंजी की चेरी बन रही थी और कई जगहों पर तो खुद ही सबसे बड़ा व्यापार बन कर उभर रही थी।

                ग्रामीण भोलेपन का नकाब उतर रहा था और वह काफी बर्बर रूप में सामने आने लगा था। समाज की तलछट से निकला लंपट तबका खुलकर सरकार को भी और समाज के कायदे-कानूनों को भी चुनौती देने लगा था। बेरोजगार युवाओं के गिरोह बनने लगे थे। ग®गस्टर पैदा होने लगे थे। भ्रष्ट तरीकों से समृद्ध होनेवाले इज्जत पाने लगे थे। लेकिन वैश्वीकरण के इसी तांडव के बीच एक ऐसा नया तबका भी बन रहा था जो अपने लिए जीवन की एक नयी संहिता और आदर्शवाद गढ़ रहा था, उसका निर्माण कर रहा था। उसे ना भोलेपन की आड़ चाहिए थी और ना ही बुजुर्गों की सीख। वह सारे ढोंग और पाखंड को समझ रहा था और उनसे पार पाने की कोशिश में लगा हुआ था।

                यह एक नई सच्चाई थी, एक नया यथार्थ था जिसे हमारे रचनाकार पकड़ने की कोशिश तो जरूर कर रहे थे, लेकिन अक्सर ही वह उनके हाथ से फिसल जा रहा था। जिस तेजी से यह यथार्थ बदल रहा था, कवियों के लिए तो उतना नहीं लेकिन लेखकों के लिए उसे पकड़ना काफी मुश्किल हो रहा था। अब तक जन जीवन के यथार्थ को पकड़ने में लेखक आगे रहते थे। लेकिन इस बार फिल्मकार इस यथार्थ को पकड़ने में ज्यादा आगे लग रहे थे। वे इस यथार्थ को पकड़ने में ज्यादा सक्षम नजर आ रहे थे। नयी सदी की पहली दहाई बीतते-बीतते यह बात ज्यादा से ज्यादा सच होती दिख रही थी।

                यही वजह थी कि हरियाणवी जन जीवन की पुरानी गढ़ी हुयी छवि के विपरीत उसका नया यथार्थ मुंबइया फिल्मों में कहीं ज्यादा विश्वसनीय ढंग से सामने आने लगा था। यहां हम पांच मंबइया फिल्मों –  ‘मटरू की बिजली का मंडोला’, ‘हाई वे’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’, ‘गुड्डू रंगीला’ और ‘एन एच-टैन – की बात कर­गे। ये वे फिल्में हैं जिन्होंने हरियाणवी जन जीवन की खासतौर से उन कुछ प्रवृतियों को पकड़ने की कोशिश की है जो इन दिनों सबसे ज्यादा मुखर हैं बल्कि समाज को रूपाकार देने में अगुवा बनी हुयी हैं।

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                यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि ये समानांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा या कला फिल्मों जैसी कोई नयी जमीन तोड़नेवाली या कलात्मकता के नए आयाम गढ़नेवाली फिल्में नहीं हैं। साधारण मुंबइया फिल्में हैं। पूरी तरह व्यवसायिक। वे कुछ-कुछ मसाला फिल्में भी हैं। यथार्थ को लार्जर दैन लाइफ के रूप में दिखानेवाली। इसके बावजूद इनमें हरियाणवी जन जीवन की उन खास प्रवृतियों की एक झलक और एक खास सीमा तक यथार्थवादी झलक मिलती है।

                इनमें पहली फिल्म है ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ जो वैश्वीकरण की नीतियों के जरिए किसानों की जमीनें हड़पे जाने के इर्द-गिर्द बुनी कहानी है। नयी सदी के शुरूआती वर्ष बीतते-बीतते दरबारी पूंजीवाद का बदतरीन रूप दिखाई देने लगा था जहां सरकार औद्योगीकरण के नाम पर जमीन के बड़े-बड़े रकबों का अधिग्रहण कर अपने चहेते उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को तोहफे में देने में लग गयी थी। यह वह समय था जब सेज (एस ई जेड) के नाम पर सरकार ने एक अंबानी परिवार को ही मुंबई के करीब पच्चीस हजार एकड़ जमीन और दिल्ली के करीब हरियाणा के गुडग़ांव में पच्चीस हजार एकड़ जमीन के तोहफे दिए थे।

                यह वह समय था जब सरकार का करीबी शायद ही ऐसा कोई कार्पोरेट घराना बचा हो जिसने सेज के नाम पर और कई-कई सेज के नाम पर जमीन­ ना हथियाई हो। यहां तक कि अनेक मीडिया हाऊसों ने भी इस बहती गंगा में हाथ धो डाले थे। औद्योगिक जगत में यह एक फैशन सा ही चल पड़ा था कि जिसने सेज के लिए जमीन नहीं ली, उसे पिछड़ा हुआ समझ लिया जाएगा। यह मान लिया जाएगा कि सरकार में उसकी कोई पंहुच नहीं है यानी वह देश के विकास में हिस्सेदार नहीं है। यह वह दौर था जब पूरे देश में जमीनों की लूट मची हुई थी।

                हरियाणा तो एकदम इसका अगुवा बना हुआ था। यहां सिर्फ अंबानी को ही सेज के नाम पर पच्चीस हजार एकड़ जमीन नहीं दी गयी थी। बल्कि दूसरे औद्योगिक घरानों को भी दिल्ली की सीमाओं से लगते क्षेत्रों में जमीनें दी गयी। हरियाणा सरकार औद्योगिक जगत का आंख का तारा बनी हुई थी। लेकिन यही वह समय भी था जब जमीन के इस लूट के खिलाफ देशभर के किसान गोलबंद होने लगे थे।

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                ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ फिल्म को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस फिल्म में एक स्थानीय उद्योगपति-पूंजीपति है जिसका चरित्र दोहरा है। शराब के नशे में वह गांववासियों का हमदर्द है, उन्हें अपने द्वारा किए जानेवाले जुल्मों के खिलाफ उठ खड़े होने को उकसाता है। यह कुछ-कुछ उसी तरह से था जैसे यह कहा जाता है कि भोलेपन में, पागलपन में और शराब के नशे में आदमी ज्यादा सच्चा होता है। लेकिन शराब का नशा उतरते ही वह व्यक्ति उतना ही जालिम बन जाता है जो कोई भी पूंजीपति हो सकता है। वह ग्रामीणों को बुरी तरह उत्पीड़ित करता है।

                फिल्म में एक स्थानीय नेत्री है जो अपने बेटे की शादी इस पूंजीपति की बेटी के साथ करने की आड़ में वहां की सारी जमीन हथियाने का जाल बुनने में लगा हुआ है।

                अच्छी बात यह है कि यहां पंचायत का रूप खाप पंचायत वाला नहीं है और वह एक सामूहिक सोच, सामूहिक फैसले और सामूहिक कार्रवाई का रूप होती है। यहां इस पंचायत को दिशा दिखाने वाला ‘माओ’ भी है जो एक शिक्षित युवक है और इस पूंजीपति का नौकर है और साथ ही उसकी बेटी का प्रेमी भी, जो विदेश से पढ़कर आयी है। उसका पैगाम एक लाल कपड़े पर लिख कर ग्रामीणों के पास आता है।

                 छोटे-मोटे उद्योगपतियों और पैटी बुर्जुआजी को वैश्वीकरण जिस तरह के सपने दिखाता है उसके प्रतीक के रूप में, एक फैंटेसी के रूप में वहां एक गुलाबी भैंस भी है, जो भदेसपन को रंगरोगन के साथ पेश किए जाने को ही दिखाती है। जो यह दिखाती है कि देश ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नकली ढंग से औद्योगीकरण करोगे तो यही रूप बनेगा। यह भैंस इस पूंजीपति को तब दिखाई देती है जब वह शराब के नशे में नहीं होता यानी जब वह आदर्शों की चादर उतारकर अपने क्रूर रूप में होता है और भविष्य के बारे में सोच रहा होता है।

                फिल्म में स्थानीय नेता के खिलाफ ‘माओ’ की अगुवाई में गांववासी अपनी जमीन­ बचाने के लिए एकजुट होते हैं और आखिर वह स्थानीय उद्योगपति-पूंजीपति भी उनका साथ देता है और उस नेता की सारी साजिशें नाकाम हो जाती हैं। फिल्म में नाच गानों और सारे मुंबइया मसालों के बावजूद, यह कलात्मक रूप से एक अच्छी फिल्म थी जिसमें पंकज कपूर और शबाना आजमी जैसे कुछ बहुत मंजे हुए कलाकार काम कर रहे थे।

                हरियाणा के जन जीवन में जो एक और प्रमुख प्रवृति सामने आ रही है, वह है यहां के युवाओं का बढ़ता अपराधीकरण। जमीनों की जोत बिहार जैसे राज्यों की तरह बड़ी तो यहां पहले भी कभी नहीं थी। बिहार में आज भी हजारों एकड़ के जमींदार हैं। हरियाणा में रैयतवाड़ी प्रथा होने के कारण ऐसे बड़े जमींदार पहले भी नहीं थे। मध्यम आकार की जोत­ थीं जिनका आकार अब धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा है। सरकारी शिक्षा प्रणाली अब वह काम नहीं कर रही है जो उसने अपने आरंभिक वर्षों में किया था। वह बेकार होती जा रही है। और उससे निकलने वाले अर्द्ध शिक्षित बच्चे रोजगार की मंडी में कहीं नहीं खप रहे हैं। वे भूमिहीनों और छोटे किसानों के बच्चे हैं।

                वे छोटे-मोटे काम करते हुए धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं क्योंकि पैसा उन्हें वहां ख°चे लिए जा रहा है। वैश्वीकरण की चकाचौंध में वे अपने लिए कोई छोटी-मोटी जगह तलाश कर रहे हैं, जो उन्हें लगता है कि इस रास्ते पर गए बिना संभव नहीं। पर वह तबका उतना अमानवीय और बर्बर भी नहीं हुआ है कि इंसान की और इंसानी मूल्यों की कद्र ना करे।

                वैश्वीकरण से समृद्ध हुए तबके के खोखले जीवन मूल्यों और ग्रामीण समाज की तलछट से अपराध की दुनिया में गए युवक में बचे हुए इंसानी मूल्यों की कहानी कहती है फिल्म ‘हाई वे’।

                यहां एक टैंपो ड्राइवर अपने साथियों के साथ रात को अपने बॉयफ्र­ड, जिसके साथ उसकी शादी होने वाली है, के साथ आऊटिंग पर निकली एक बड़े घर की लड़की का अपहरण कर लेता है। उस लड़की को अपने साथ रखते हुए वह निरंतर अपने ठिकाने बदलता रहता है और अक्सर ही सड़क पर रहता है। शुरू में महावीर नाम का यह ड्राइवर काफी हद तक एक छंटे हुए अपराधी के रूप में सामने आता है। वह गाली-गलौच करता है, जिस लड़की का अपहरण किया है, उसको वह किसी तरह की कोई छूट देने के लिए तैयार नहीं। वह इस पर बजिद्द नजर आता है कि जिस उद्देश्य के लिए यानी पैसे के लिए उसने यह अपहरण किया है, उसकी वह मांग पूरी होनी ही चाहिए। इसके लिए वह काफी क्रूर रूप में भी पेश आता है। लेकिन इसी रूप में वह खुद अपने ही साथी से इस लड़की का शारीरिक शोषण होने से भी उसे बचाता है।

                और इसके बाद ही धीरे-धीरे उसका मानवीय पक्ष सामने आने लगता है। गरीबी की मार ने प्रेम के जिस सोते को उसके दिल से सुखा दिया है, वह उसमें फिर से फूटता है। उधर लड़की भी अपनी अमीरी की खोखली दुनिया से दूर और एकदम अलग बसी इस दुनिया की जीवंतता से परिचित होती है। अमीरी की उसकी परिचित दुनिया में तो वह अपने ही परिचितों के हाथों शारीरिक शोषण का भी शिकार होती है। फिर जिस लड़के के साथ उसकी शादी होनेवाली है और जिसके साथ वह आऊटिंग पर निकलती है, उसकी कायरता भी उसके सामने आती है, जब उसके अपहरण के समय वह उसे निस्सहाय छोड़कर भाग जाता है। जबकि इस बेगानी दुनिया में उसे लगता है कि उसका अपना भी कोई अस्तित्व है। वह अपनी इंसानियत, अपने भेालेपन, इस अपरिचित दुनिया के प्रति आकर्षण और अपने प्रेम से एक पशुवत व्यक्ति को फिर इंसान के रूप में वापस लाने में मदद करती है।

                यह अमीर गरीब के प्रेम की परंपरागत कहानी नहीं है। यहां गरीब का अमीरी के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। अलबत्ता उस दुनिया का थोड़ा खौफ जरूर है, जिसे वह अक्खड़पन में छिपाता है। वह दुनिया उसके लिए मात्र इतना ही महत्व रखती है कि वहां से पैसा वसूल किया जा सकता है। अमीर का भी गरीबी के लिए कोई रोमांटिक आकर्षण नहीं है। अपनी दुनिया के खोखलेपन के बरक्स सिर्फ इंसानियत का एक संजीदा रूप उसे आकर्षित करता है और वहीं से प्रेम का अंकुर फूटता है।

                ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ जहां एक सुखांत फिल्म है, वहीं ‘हाई वे’ इस माने में एक दुखांत फिल्म है कि समाज की तलछट से आया अपराधी जो छल-कपट से दूर एक साफ दिल लड़की के संपर्क में आने से धीरे-धीरे इंसानी रूप में सामने आता है, वही तथाकथित सभ्य समाज के हाथों इसलिए मारा जाता है कि उस लड़की के सपने पूरे करने में वह उसका साथ देने लगता है। ‘हाई वे’ सांकेतिक रूप में एक ऐसे रास्ते की कहानी है जिसकी यात्रा अमानवीयता से शुरू होती है, लेकिन जिसका अंत प्रेम तथा मानवीयता से भरपूर उदात्त उत्सर्ग के रूप में होता है। अभिनय की दृष्टि से इस फिल्म के दोनों ही लीड एक्टरों – रणदीप हुड्डा और आलिया भट्ट ने आलोचकों की सराहना पाई है।

                ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ और ‘हाई वे’ दोनों ही फिल्में बॉलीवुड के दो नामी और युवा फिल्मकारों की बनाई हुई फिल्में हैं।

                ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के निर्देशक विशाल भारद्वाज की ख्याति शेक्सपियर के नाटकों का भारतीय संदर्भों में रूपांतरण और पेश करने के लिए रही है, फिर चाहे वह ‘ओमकारा’ हो, ‘मकबूल’ या ‘हैदर’ हो। लेकिन ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ इस माने में उनकी थोड़ी हटकर बनायी गयी फिल्म है कि इसमें उन्होंने शेक्सपियर की कहानी का सहारा नहीं लिया है। जबकि ‘हाई वे’ इम्तियाज अली की फिल्म है, जो अलग ढंग की फिल्में बनाते रहे हैं। उन्होंने ‘जब वी मेट’, ‘रॉकस्टार’ (यह जानना दिलचस्प होगा कि ‘रॉकस्टार’ का हीरो भी हरियाणा-दिल्ली की ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही आता है) और हाल ही में आयी ‘तमाशा’ जैसी फिल्म बनायी हैं। इन दोनों ही फिल्मकारों का कहानी कहने का अंदाज जरा अलग है और साधारण दर्शक के लिए थोड़ा जटिल भी हो सकता है। बावजूद इसके ये दोनों फिल्म काफी सफल रही हैं। इन दोनों फिल्मों को न तो चालू अर्थ में मुंबइया फिल्में ही कहा जा सकता है और न ही ये न्यू वेव सिनेमा की फिल्में हैं।

इधर के दिनों में हरियाणवी जन जीवन की जो एक तीसरी प्रवृति बड़ी शिद्दत के साथ सामने आयी है वह है युवाओं के प्रेम की अभिव्यक्ति। हरियाणवी जन जीवन की प्रचलित मान्यताओं के खिलाफ जाकर, खाप पंचायत जैसे प्रतिगामी और बर्बर संस्थानों का सामना करते हुए और सारे खतरे उठाकर तथा अपने जीवन को दाव पर लगाकर ये प्रेमी जोड़े अपने प्रेम को पाप मानने से इंकार करते हैं और पूरी शिद्दत के साथ अपने संबंधों को निभाने के लिए आगे आ रहे हैं। खास तौर पर लड़कियों की भूमिका इसमें बहुत ही बोल्ड रूप में सामने आती है।

                यह प्रवृति यूं तो ‘गुड्डू रंगीला’ और ‘एन एच टैन’ में भी सामने आती है। पर ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में दत्तो की भूमिका में वह खासतौर से रेखांकित होती है। दत्तो यानी कुसुम सांगवान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा है। उसका भाई जो कि पहलवान रहा है और जिसने अपनी पसंद से शादी की है और जो स्वाभाविक रूप से खाप का सताया हुआ है और अपनी छोटी बहन को साथ लेकर जो शहर में आकर बस गया है, वही भाई उसे एक खुले तथा स्वस्थ माहौल में पाल-पोसकर बड़ा करता है जिससे वह एक समर्थ व्यक्ति के रूप में समाज में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्षरत है।

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                वह एथलिट है और ऐसी बोल्ड है कि दिल्ली जैसे शहर, जो महिलाओं और लड़कियों से छेड़छाड़ तथा बलात्कार की घटनाओं के मामले में रेप कैपिटल होने का दाग ढो रहा है,अपनी हॉकी स्टिक से उस आदमी की खबर लेने में नहीं हिचकिचाती जिसके बारे में उसे लगता है कि वह उसका पीछा कर रहा है। यह वह व्यक्ति है जो इसलिए उसके आसपास मंडरा रहा है क्योंकि दत्तो की शक्ल-सूरत उसकी पत्नी से मिलती है, जो उसे छोड़ गयी है।

                हालांकि बाद में उसी व्यक्ति से उसे प्रेम हो जाता है और वह उससे शादी करने के लिए तैयार हो जाती है। उसका भाई उसे ना सिर्फ उसे प्रेम करने की छूट देता है बल्कि इस शादी के उसके फैसले में भी उसका साथ देता है। इस फिल्म में भी खाप का वही बर्बर रूप सामने आता है जहां लड़की को बांधकर जिंदा जलाने की कोशिश की जाती है। लेकिन समय पर उसका भाई पंहुच जाता है और उसे बचा लेता है। यह प्रसंग इस फिल्म में काफी छोटा है, लेकिन खाप पंचायत की बर्बरता को दिखाने के लिए काफी है।

                बाद में ऐन फेरों के वक्त वह इस शादी से इंकार कर देती है। न सिर्फ इसलिए कि लड़के की पूर्व पत्नी, जो कि शादी के वक्त वहां पंहुच जाती है, और अपने होने वाले पति के उसके प्रति प्रेम का वह पहचान लेती है बल्कि इसलिए भी कि उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व उसे यह निर्णय लेने को बाध्य करता है। यह फिल्म इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें लड़की के प्रेम करने के अधिकार और उसके स्वतंत्र तथा बोल्ड व्यक्तित्व को पूरी हरियाणवी छाप के साथ बड़े ही खूबसूरत ढ़ंग से चित्रित किया गया है। कंगना रनौत को इस भूमिका के लिए भारी सराहना मिली है।

                हरियाणवी जन जीवन की चौथी लेकिन सबसे प्रमुख,सबसे विजिबल तथा चर्चित प्रवृति है खाप पंचायतें, जो न सिर्फ सभ्य समाज में हरियाणा की बदनामी का सबब बनी हैं बल्कि जिन्होंने राजनीति तथा न्यायपालिका दोनों में ही हलचल भी पैदा की है। खाप पंचायतों की मनमानी, निर्ममता, उनकी फतवेबाजी, उनका तालीबानी रूप, शासक वर्गों का उनको संरक्षण और प्रेमी जोड़ों को दी जानीवाली उनकी सजाएं खासतौर से फिल्म जैसी विधा को काफी मसाला मुहैया कराती हैं। इसलिए खापों को लेकर फिल्में तो कई बनी जिसमें मिस टनकपुर जैसी चालू फिल्में भी हैं, लेकिन यहां हम दो ही फिल्मों पर अपना ध्यान क­द्रित कर रहे हैं – गुड्डू रंगीला’ और ‘एन एच-टैन’।

                ‘गुड्डू रंगीला’ सुभाष कपूर की फिल्म है, जिन्होंने ‘फंस गए रे ओबामा’ और ‘जौली एल एल बी’ जैसी चर्चित फिल्में बनायी हैं। ‘गुड्डू रंगीला’ उनकी उसी श्रृंखला की फिल्म तो नहीं कही जा सकती। क्योंकि ‘फंस गए रे ओबामा’ पूरी तरह से व्यंग्य फिल्म थी जो उन्होंने वैश्विक मंदी जैसे बड़े और गंभीर विषय को लेकर बनायी थी और जिसमें उनकी प्रतिभा पूरी तरह निखरकर सामने आयी है। ‘जौली एल एल बी’ भी उसी श्रृंखला की फिल्म थी जिसमें उनका व्यंग्यात्मक सुर अंत तक नहीं चल पाया और न्याय व्यवस्था पर वह काफी गंभीर फिल्म के रूप में सामने आयी।

                ‘गुड्डू रंगीला’ उनकी खाप पंचायतों की बर्बरता को लेकर बनायी गयी फिल्म है। हालांकि उनकी व्यंग्य प्रतिभा इस फिल्म में भी कुछ दृश्यों में दिखाई देती है, लेकिन शायद विषय ही ऐसा था और जो कहानी उन्होंने कहने की कोशिश है, उसने इसकी इजाजत नहीं दी। इस फिल्म का जो सबसे दमदार पहलू है, वह है खाप पंचायतों को मिल रहा राजनीतिक संरक्षण जहां विधायक बिüू खाप पंचायतों की प्रमुख हस्ती के रूप में अपनी तमाम काली करतूतों को अंजाम देता है।

                हालांकि अंत तक आते-आते यह फिल्म पूरी तरह मुंबइया फिल्म का रूप ले लेती है जहां रंगीला अपने इस पुराने शत्रु से अपना बदला लेता है। लेकिन फिल्म में खाप पंचायतों को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण को जिस तरह पेश किया गया है,वह निश्चय ही इस फिल्म का दमदार पहलू है।

                ‘एन एच-टैन’ भी खाप पंचायतों की अमानवीयता को ही दर्शाने वाली फिल्म है जिसकी शुरूआत आधुनिक प्रेमी जोड़े के खुले संबंधों को फिल्माने से होती है। यह महानगरीय जीवन में रचे-बसे और उसी के मूल्यों में ढला जोड़ा है। इसकी नायिका जहां एक कार्पोरेट एक्जिक्यूटिव है, बिजनेस लीडर है, वहीं नायक भी इसी वर्ग से आता है और उसके अफसरशाही तथा राजनीति से अच्छे ताल्लुकात हैं। यह जोड़ा नायिका का जन्मदिन सेलिब्रेट करने के लिए शहर से बाहर जाता है और यहीं उसका वास्ता उस बर्बर और जाहिल दुनिया से पड़ता है, जिसकी एक झलक फिल्म के आरंभ में ही मिल जाती है जब कार में जा रही एक अकेली लड़की, जो जाहिर है नायिका ही है, पर हमला होता है और जिसके बाद पुलिस अधिकारी उन्हें समझाने की कोशिश करता है कि यह शहर एक बढ़ता बच्चा है।

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                यहां कुछ शुरूआती दृश्यों से ही आगे की हैवानियत की कुछ झलक मिल जाती है। न सिर्फ नायिका पर होने वाले हमले से बल्कि शहर से बाहर जाते हुए एक जगह नायक जब कुछ ग्रामीणों से रास्ता पूछता है, वहां भी। बाद में वे एक ढाबे पर रुकते हैं जहां एक प्रेमी जोड़े को उसके परिवारीजन पकड़कर और जाहिर है सजा देने के लिए ले जा रहे होते हैं। यह जोड़ा पहले भागते हुए हड़बड़ी में उनकी गाड़ी के सामने आता है और फिर अपने प्रेमी संग घर से भागी हुयी लड़की टॉयलेट में नायिका से मदद की भीख मांगती है, जिससे नायिका इंकार कर देती है।

                लेकिन जब लड़की के परिजन उन्हें गाड़ी में डाल कर ले जा रहे होते हैं तो नायक से उनकी झड़प हो जाती है और लड़की का भाई उसे थप्पड़ मार देता है। इससे अपमानित महसूस कर नायक इस थप्पड़ का बदला लेने के लिए उनका पीछा करने की ठानता है और यह जोड़ा वहां पंहुच जाता है जहां इन परिजनों द्वारा इस प्रेमी जोड़े की हत्या की जा रही होती है। यहीं से घटनाओं की एक पूरी श्रृंखला शुरू होती है, जिनमें पुलिस की संदिग्ध तथा अपराधियों की मददगार भूमिका और स्वयं लड़की की मां की अपराधियों का साथ देनेवाली भूमिका सामने आती है, हालांकि वह उसे बहुत प्यार करती है। लेकिन यहीं लड़की की भाभी की भूमिका लड़की से सहानुभूति रखनेवाली महिला के रूप में सामने है, जो नई और पुरानी पीढियों के बीच सोच के अंतर को दिखाती है।

                यह फिल्म इस माने में महत्वपूर्ण है कि एक तरफ तो महानगर बनता आधुनिकता की चकाचौंध वाला गुड़गांव शहर है और दूसरी ओर मध्यकालीन मानसिकता से ग्रस्त हरियाणा के गांव। फिल्म का एक डायलॉग इस अंतर को बखूबी रेखांकित कर देता है ‘जहां गुड़गांव का आखिरी मॉल खत्म होता है, संविधान और स्वतंत्रता की बड़ी-बड़ी बात­ भी वहीं खत्म हो जाती हैं’।

                यह फिल्म हरियाणा में व्याप्त पुरूषवादी सोच के प्रभुत्व को भी दिखाती है जहां मां अपनी बेटी की हत्या में सहायक की भूमिका निभाती है। इस फिल्म का अंत भी एकदम फिल्मी है लेकिन सोच के पिछड़ेपन को, उसकी हैवानियत को यह फिल्म पूरी शिद्दत से रेखांकित करती है।

                आश्चर्य नहीं कि इन फिल्मकारों में से विशाल भारद्वाज और सुभाष कपूर हरियाणवी जन जीवन से काफी वाकफियत रखते हैं और इम्तियाज अली भी दिल्ली में ही पढ़े-लिखे हैं शायद इसीलिए इन फिल्मकारों ने इन प्रवृत्तियों को काफी प्रामाणिकता के साथ पकड़ा है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-फरवरी 2016, अंक-3), पेज – 45 से 52

 

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