लुटी ज्यब खेत्ती बाड़ी

सत्यवीर ‘नाहडिय़ा

रागनी

1
माट्टी म्हं माट्टी हुवै, जमींदार हालात।
करजा ले निपटांवता, ब्याह्-छूछक अर भात।
ब्याह्-छूछक अर भात, रात-दिन घणा कमावै।
मांह् -पौह् की बी रात, खेत म्हं खड़ा बितावै।
खाद-बीज का मोल, सदा हे ठावै टाट्टी।
अनदात्ता बेहाल, पिटै चोगरदे माट्टी।।

2
खरचा लग लिकड़ै नहीं, खेत्ती का यो हाल।
करजा बढ़ता हे रहै, चूंट बगावै खाल।
चूंट बगावै खाल, दाळ म्हं कोन्यी काळा।
काळी पूरी दाळ, हुया न्यूं मोट्टा चाळा।
बोट बैंक पै ध्यान, करैं ना असली चरचा।
समाधान की बात, घटाओ उसका खरचा।।

3
करजा भारी बोझ सै, के-के करूं बखान।
चोगरदे तै सै घिरा, करजे बीच किसान।
करजे बीच किसान, ध्यान ना कोये देत्ता।
बोट बैंक यो खास, पूजता न्यूं हर नेत्ता।
जै वो हो खुशहाल, हुवै खुश सारी परजा।
करो काम वै खास, चढ़ै ना उसकै करजा।।

4
सदा कमावै वो घणा, करै खेत अर क्यार।
सूक्खे-ओळे बाढ़ तै, मान्नै कोन्या हार।
मान्नै कोन्या हार, त्यार वो आग्गै पात्ता।
दाणे नै मोह्ताज, आज पावै अनदात्ता।
नाहडिय़ा कबिराय, रेत नै सोन बणावै।
हो माट्टी म्हं रेत, खेत म्हं सदा कमावै।।

5
खेत्ती ना आसान इब, खेत्ती टेढ़ी खीर।
खेत्ती काढ़ै ज्यान सै, खेत्ती इब सै पीर,
खेत्ती इब सै पीर, चीर कै धरती सीन्ना,
जमींदार का देख, सूकता नहीं पसीन्ना।
नाहडिय़ा कबिराय, गात नै करकै रेत्ती।
छह रुत बारा मास, खड़ी ड्यूटी सै खेत्ती।।

6

खेत्ती बाड़ी इब हुयी, घाट्टे आळी कार।
बीज खाद महँगे हुये, मौस्सम करता मार।
मौस्सम करता मार, तार ल्ये खाल कसूत्ती।
सूक्खा ओळा बाढ़, तोड़ द्ये बाक्की जूत्ती।
नाहडिय़ा कबिराय, किसानी हालत माड़ी।
देण लगे वै ज्यान, लुटी ज्यब खेत्तीबाड़ी।।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 26

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