डा. जोगिन्द्र सिंह मोर – बदलते हालात-पिछड़ती कृषि

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                धरती की सदियों से इकट्ठी की हुई उत्पादन शक्ति को आधी सदी से भी कम समय में हमने  उसे निचोड़ कर रख दिया है। हमने धरती से निकाला ज्यादा है और उसे दिया कम है। अपनी खर्च हो चुकी उत्पादन शक्ति को खुद नये सिरे से पैदा करने की शक्ति धरती में जरूर है, परन्तु इसके लिए हम उसे समय नहीं देते। इस क्षमता के लिए धरती को सूर्य तथा केंचुए जैसे कीड़े की जरूरत है। फसल के बाद तुरंत अगली फसल से धरती का सूर्य से रिश्ता दूर हो गया है। जौहल कमेटी ने खेत को खाली रखने के लिए किसान को भारी मुआवजा देने की सिफारिश की है।
रासायनिक खादों व कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने धरती की सतह इतनी जहरीली कर दी है कि उसको उपजाऊ बनाने वाले जीव खत्म होते जा रहे हैं और यह जहर अनाज व साग सब्जियों से होकर मानव को महाबीमारियों की तरफ धकेल रहा है।
कृषि क्षेत्र के लिए जल संकट बहुत बड़ी समस्या है। यदि प्रत्येक वर्ष ट्यूबवैल की पाईप एक-दो दो मीटर गहरी करते जाएंगे, तो कहां पहुंचेंगे। धरती से पानी निकालने के तो लाखों सुराख बना दिए हैं, परन्तु जिन सुराखों से धरती बारिश का पानी पीती है, वे सारे बंद किए जा रहे हैं।
बहुत प्रचार हुआ है कि किसान गेहूं व धान की फसली चक्र से बाहर निकले, परन्तु किसान की अपनी मजबूरी है। उसकी जमीन थोड़ी रह गई है। अभी धान व गेहूं की फसल की पैदावार अन्य फसलों के मुकाबले निश्चित है। यह थोड़ी बहुत खराब मौसम की मार झेल लेती है। इनकी मंडियां है और सरकार इनके भाव भी निर्धारित करती है। बेशक ये भाव किसान को कम लगते हों, परन्तु उसको तसल्ली होती है कि कम से कम इतना तो मिल जाएगा तथा समय पर मिल जाएगा। तिलहन व दलहन की फसलें एक भी फालतू बारिश सहन नहीं कर पाती।  इस सबके बावजूद यदि इनकी पैदावार किसी वर्ष अधिक हो जाए तो भाव इतने गिर जाते हैं कि अगले वर्ष तक किसान इनको बोने का विचार छोड़ देता है। सरकार के सक्रिय सहारे के बिना किसान के लिए फसली चक्र बदलना संभव नहीं।
भारतीय किसान की असली लड़ाई विश्व व्यापार संगठन से है, लेकिन विश्व व्यापार संगठन में रहते हुए भी हम अपनी कृषि व्यवस्था को चौपट करने वाली वस्तुओं की आयात पर प्रतिबंध लगा सकते हैं।
कृषि क्षेत्र की दशा सुधारने के लिए हमें ठोस निर्णय लेने होंगे, ताकि देश के आधार स्तम्भ किसान वर्ग को वर्तमान परिस्थितियों से उबारा जा सके। इसके लिए कुछ सुझावों पर गौर किया जा सकता है जैसे :-

  1. फसलों के लिए अच्छे किस्म के बीजों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
  2. सरकार को प्रत्येक पंचायत क्षेत्र में सहकारी गोदाम स्थापित करने को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  3. कानूनी न्यूनतम मजदूरी को प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए। कृषि पर आधारित मजदूरों के लिए पैंशन योजना लागू की जाए।
  4. चीनी उद्योग के लिए नियमों में ढील दी जाए, ताकि गन्ने का उपयोग बढ़ सके और गन्ना पैदा करने वालों को बेहतर मूल्य मिल सके।
  5. फलों, सब्जियों की पैदावार और मुर्गीपालन को बढ़ावा दिया जाए। डेयरी, मत्स्यपालन          और रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उपाय किए जाएं।
  6. जो रियायतें उद्योगों को उपलब्ध हैं वही कृषि को भी मिलनी चाहिएं।
  7. प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए अलग कोष स्थापित किया जाए।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 26

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