किसानी जीवन का ऋण

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अमृतलाल मदान

अधखुली नींद में
अधखुली खिड़की से
दिखने लगा था
धीरे धीरे सरकता
पूरा खिला चांद
लुक्का-छिप्पी खेलता
छोटी-छोटी बदलियों के संग
आधी रात के आकाश में।

सोचा, उठकर
कोई प्रेम कविता लिखूं
यादों की बदलियों में भूले-बिसरे चांद की
और स्वयं अपनी लेखनी पर
आत्ममुग्ध हो चूमने लगूं  उसे।

तभी मैंने देखा
एक धब्बा चांद का
कुछ ज्यादा ही गहरा गया है सहसा
पहले सोचा कोई बूढ़ा बादल होगा यह
सिरफिरा सा नटखट बदलियों पर रोक लगाता

फिर देखा एक और धब्बा भी
गहराने लगा है तेजी से मैला-कुचैला सा
चांदनी की छटा को कालिख पोतता
किसी बेबस घटा को दबोच धरता
देखते ही देखते
एक तीसरा धब्बा भी विकराल बन
छाने लगा
पूरे कारपोरेटी परिदृश्य पर
मैं घबराया सा उठ बैठा सिलवटों पर गद्दे की
पानी के दो-चार घूंट भी पीये
माथे का पसीना व शर्म पोंछते-पोंछते।

…..अरे यह क्या हुआ….
चौथा व पांचवां धब्बा भी फूलता गया
काले गुब्बारे सा।

चांद पर अब एक खाप पंचायत थी काबिज
या कोई काला माफिया
मूछों पर ताव देते हुए।

बदलियां लापता हो गयी थी
या कर दी गई थी
या धर दी गई थी।

फिर क्या देखा मैंने
खिड़की से अब चांद नहीं
इक घोर घना पेड़ दिखने लगा था
आकाश से उल्टा लटका
जड़ें लापता थीं जिसकी
या कर दी गई थी
या गिरवी धर दी गई थी
और शाखाओं से लटक रहे थे
पांच साये
उलटे नहीं, सीधे, अकड़े-अकड़े से
रोते कुत्तों की मनहूस आवाजों के बीच।

सुबह की अखबार में
एक छोटी सी खबर दुबकी थी कोने में
पांच धरती पुत्रों ने

आकाश चुन लिया था रहने को
गांव के बरगद से लटक
तालाब किनारे पूनम के पागलपन में।

….ओह…मुक्त हो गए वे
किसानी जीवन के ऋण से
उगे थे तृण से
उखड़े भी तृण से
पूंजी की आंधी में
सोचा मैंने और….
चाय की चुस्की ली और…
पलट दिया पन्ना
बेखबर अखबार का
गुणगान करती सरकार का।

‘गुलाम’ टी.वी. पर भी यह मुद्दा
दरकिनार था।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 47

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