अंजू – कृषि और महिलाएं

आलेख


हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कृषि के कार्य में संलग्न है। यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

कृषि के कार्य में औरत और पुरुष की दोनोंं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।  कृषि के बारे में हम जब विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं, तो हम पाते हैं कि प्राचीन काल में सबसे पहले किसी स्त्री द्वारा ही अपनी झोपड़ी के पास उगे हुए दानों को इकट्ठा किया गया होगा और यह अंदाजा लगाया जाता है कि सबसे पहले दानों की बिजाई का काम औरत द्वारा ही प्रारंभ किया गया। यही वजह है कि परम्परागत रूप से महिलाओं ने हमेशा ही कृषि के क्षेत्र में महत्ती व विविध भूमिकाएं निभाई हैं। फिर वो चाहे किसान, सम-किसान, पारिवारिक, मजदूर, दिहाड़ी मजदूर या फिर प्रबंध के रूप में।

हमारा समाज आज भी पुरुष प्रधान सोच का निर्वाह कर रहा है, जिसके चलते  पुरुष दोनों में पुरुष को सर्वोपरि माना गया है। पुरुष द्वारा किए जाने वाले छोटे से छोटे काम को महत्व दिया जाता है और महिला द्वारा किए जाने वाले कामों को सिर्फ उसके कत्र्तव्य के रूप में देखा जाता है। कृषि क्षेत्र में इसका प्रभाव साफ दिखाई देता है, क्योंंकि कृषि क्षेत्र में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले ज्यादातर काम अवैतनिक हैं या फिर काम के बदले बहुत कम मेहनताना मिलता है।

कृषि के कार्य मेें लगभग 78 प्रतिशत महिलाएं लगी हुई हैं, लेकिन पितृसत्तात्मक सोच के चलते कृषि क्षेत्र में महिलाओं और पुरुषों के कार्यों को लेकर प्रमुख रूप से शारीरिक श्रम संबंधी काम औरतों और मशीनों से संबंधित व भारवाही पशुओं की सहायता से किए जाने वाले काम सामान्यत: पुरुषों के द्वारा ही किए जाते हैं। कृषि से जुड़ी हुई गतिविधियां में पुरुषों द्वारा हल जोतना, सिंचाई, बोआई, समतलन और महिलाओं द्वारा निराई, ओसाई, प्रतिरोपित आदि काम किए जाते हैं। पुरुष द्वारा किए जाने वाले कृषि कार्य के बदले मजदूरी ज्यादा मिलती है और महिला द्वारा किए जाने वाले उसी काम के बदले मजदूरी कम मिलती है।

आधुनिकीकरण के कारण वर्तमान में कृषि कार्य ज्यादातर मशीनों द्वारा किए जाने लगे और मशीनों पर एक तरह से एकाधिकार पुरुषों का ही बना हुआ है। अपवाद के तौर पर शायद एकाध ही मशीन औरत द्वारा संचालित की जा रही होगी। एक तरह से इस मशीनी प्रक्रिया से कृषि कार्य में मशीनों के प्रयोग से महिलाओं को कोई सार्थक मदद नहीं हो पा रही है, क्योंकि महिलाओं द्वारा आज भी परम्परागत रूप से ही कार्य किए जा रहे हैं।

वर्तमान समय में कृषि के कार्य में पुरुष 32.47 प्रतिशत जबकि महिला 47.67 प्रतिशत संलग्न हैं और कृषक मजदूर के रूप में पुरुष 12.55 प्रतिशत और महिला 21.10 प्रतिशत संलग्न है। महिलाएं बड़े पैमाने पर खेत में काम कर रही हैं, परन्तु न जमीन पर उसका अधिकार होता है और न ही उसको अभी तक पूर्ण किसान का दर्जा मिल पाया है। औरत पुरुष के बराबर काम करती है, लेकिन पैदावार से संबंधित निर्णयों में भी उसको शामिल नहीं किया जाता है। महिला के नाम जमीन का मालिकाना हक न होने के कारण सरकार द्वारा कृषि से संबंधित ऋण, सुविधाएं आदि भी नहीं मिल पाती हैं।

महिलाओं द्वारा कृषि से जुड़े हुए कार्य एक खास शारीरिक मुद्रा में किए जाते हैं, जिससे उन्हें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कृषि मजदूर के रूप में महिलाओं को काम करते हुए कार्य स्थल पर कई बार मानसिक, शारीरिक और यौन-उत्पीडऩ का भी शिकार होना पड़ता है। इस उत्पीडऩ का शिकार ज्यादातर दलित महिलाएं होती हैं। आजीविका का कोई अन्य साधन न होने की वजह से उन्हें उत्पीडऩ को चुपचाप सहन करना पड़ता है।

महंगाई और बेरोजगारी के कारण गांव से शहर की तरफ पलायन हो रहा है। जब पुरुष काम की तलाश में शहर जाते हैं, तो वे अपने पीछे कृषि कार्य को महिलाओं के जिम्मे छोड़ देते हें, जिसे महिलाएं बड़े अच्छे ढंग से उस जिम्मेदारी को निभाती हैं। परन्तु  महिलाओं की मंडियों से दूरी बनी हुई है और फसल की खरीद-फरोख्त को उनके हिस्से का काम ही नहीं माना जाता है। यही वजह है कि सरकार द्वारा कृषि से संंबंधित कार्यक्रमों के केंद्र में भी पुरुष ही रहता है जैसे शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर, सूचनाएं, कार्यशालाएं, सेमिनार, विचार गोष्ठियां आदि।

महिलाओं को कृषि के कार्य में पुरुष के बराबर का हिस्सा बनाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है काम है महिलाओं को किसान का दर्जा देना और उन्हें भी जमीन का मालिकाना हक प्रदान करना। कृषि कार्य से संबंधित तमाम कार्यक्रमों में उन्हें प्रमुख रूप से शामिल करने के लिए विशेष तरह की पहलकदमियां करनी होंगी।  सरकार द्वारा महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्यक्रम चलना और कृषि नीति में महिलाओं के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया है।       (सम्पर्क : शोधार्थी, इतिहास विभाग, आई.जी. यूनिवर्सिटी, मीरपुर, रेवाड़ी )

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 63

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