मदन भारती – यकीन

कविता


बस अब शांत हो जाइए
आप भी
और आप भी और आप भी।
एक आश्वासन है
सबको मिलेगा
आपको भी और आपको भी
मुझे क्या मिलेगा?
मैं खो चुका हूं
17 साल का नितिन
सेना और पुलिस के
सशस्त्र पहरे में।
अभी बैठक होगी
मन्थन होगा,
और वैसे भी
तुम भीड़ के पास गए क्यूं।
और मुझे क्या मिलेगा?
तुम कौन?
देखो सत्ता को जूता मत दिखाओ
अपने माल की लिस्ट बनाओ
फिर बात होगी।
और मैं….मुझे….?
अब तुम कौन?
मैं रेहड़ी वाला
मैं आरक्षण वाला
मैं ठेले वाला
मैं दुकान वाला
मैं मॉल वाला
मैं इज्जत वाला
मैं मकान वाला
मैं वो जिसका टूटा हर ताला।
हां-हां, सबको मिलेगा
कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।
और मुझे?
अबे अब तुम कौन
मैं इन्साफ का फरियादी
अमन का वारिस
रिश्तों की माला
भविष्य की चिंता
लहूलुहान यकीन।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 45

 

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