धर्मेंद्र कंवारी – बंडवारा

हरियाणवी  लघुकथा

पहला – मैं तो यो घर लेऊंगा, मैं छोटा सूं
दूसरा – मैं तो इसमैं घणेए साल तै रहूं सूं, तूं प्लाट ले ले
तीसरा – रै मन्नै भी किम्मे देवोगे, मेरे हाड टूट लिए कमा-कमा कै, सबतै बड्ड़ा सूं।
पहला – भाई मैं यो घर ताम्मैं ले ल्यो, मां-बाप भी ताहरै गेलै रवैंगे
दूसरा-तीसरा – रै भाई क्यूं छोह ठाण लागर्या, तूं छोटा सै यो घर तो तेराए सै, मां-बाप का जी भी तो तैरे धौरे लागै सै, हाम्म तो बाहर प्लाट म्हं ए बणा लेवांगे।
होग्या बंडवारा।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 120

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