बाबाजी – धर्मेंद्र कंवारी

हरियाणवी लघुकथा

होटल बरगै कमरे म्ह एक बड्डे से सोफे पै बाबाजी बैठे थे। एसी फुल स्पीड म्हं हवा देण लागर्या था, मौसम कती चिल्ड। एक-एक करके लोग आवैं अर बाबा जी सबकी कड़पै हाथ धरदे। घंटी बजते ही बाबा जी ने एप्पल का फोन जेब तै काड्या अर बोल्लै
बाबा – हैलो
भक्त – जय हो बाबा जी, थोड़ी देर म्हं आपके डेरे पै कमिश्नर आशीर्वाद लेण नै आवै।
बाबा – मोस्ट वेलकम, पत्रकार बुला लिए कै।
भक्त – हां, आंदेए होंगे, मन्नै फोन कर दिया।
एक-एक करकै पत्रकार भीतर आण लाग्गै, गेल-गेल कमिश्नर भी आग्या। एक कुर्सी कमिश्नर खातर मंगवाई गई, पत्रकार नीचे एक शरण म्हं बैठे रहे।
बाबा जी –  मन्नै तो अचानक बेरा पाट्या आप आण लागरै सो।
कमिश्नर – मन्नै बी चाणचक एक बेरा पाट्या, मन्नै आड़ै आणा सै। (बिचौलिए पत्रकार कानी देखकै दोनूं मुस्कुराएं)
बाबाजी खड़े होए अर एक चादर कमिश्नर कै कंधा पै गेर दी, भक्त भी खड़े होगै अर एक फोटो खिंचवाया। कार्यक्रम खत्म होया।
आगलै दिन अखबार म्हं खबर छपरी थी, कमिश्नर अर पत्रकारां नै बाबै का आशीर्वाद लिया।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 120

 

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