एक सांड और गधे की मौत -सुरेन्द्र पाल सिंह

लघु कथा

बचपन में हमारे घर के बगल में एक रेलवे लाइन पर फाटक था जिसके पास एक जोहड़ था। शहर भर की गायें दिन भर उस जोहड़ पर कुछ पालियों के द्वारा आराम करने के लिए लायी जाती थी और स्वभाविक है कि उन गायों के झुण्ड में एक सांड भी होता था। एक बार ना जाने कहां से एक दूसरा सांड भी वहां पहुंच गया। स्वभाववश दोनों सांडों में वर्चस्व का महाभारत शुरू हो गया और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि उस खूनी लड़ाई मेंं एक सांड बुरी तरह लहू -लुहान था और दूसरा पूरी तरह धराशायी। फिर एक सिलसिला शुरू हुआ कुछ संभ्रांत दिखने वाली महिलाओं के आने, विलाप करने और पूरे कर्मकांड के साथ उस मृत सांड के अंतिम संस्कार का। जिसके लिये एक गहरा गड्ढा खोदा गया और कई बोरी नमक का उपयोग किया गया।

अब थोड़े दिनों के बाद, वहीं नजदीक की रेलवे लाइन से एक महिला के एकल विलाप की आवाज आ रही थी। उत्सुक्तावश वहां जाकर देखा तो पाया कि एक खानाबदोश महिला का गधा रेल के नीचे कट कर मर गया था।  वो गधा उस महिला और उसके परिवार की रोजी रोटी का मुख्य साधन था। महिला रो पीट रही थी और इस काम में नितांत अकेली थी। वहां न कोई कर्मकांड था और न ही कोई रोने में साथ देने वाला।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 106

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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